Bihar Political Crisis: राजद नेता शिवानंद तिवारी बोले- जिसे देश की चिंता है, उसे बिहार की नई सरकार पसंद आएगी
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है और दोबारा सरकार बनाने के लिए राज्यपाल के पास दावा पेश कर आए हैं। इस बदलाव के बाद भाजपा खेमे में मातम सा माहौल है, जबकि महागठबंधन के नेताओं में गजब का उत्साह है। राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने अमर उजाला से कहा, सब भूल जाइए। बदलाव का स्वागत कीजिए। तिवारी ने कहा, जिसे देश की चिंता होगी, उसे बिहार की नई सरकार और यह बदलाव अच्छा लगेगा। यहां तक कि जदयू से बाहर हो चुके वरिष्ठ नेता शरद यादव को भी यह बदलाव अच्छा लग रहा है। हालांकि राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह को बिहार में बदलाव का यह दर्द भूल पाना मुश्किल होगा।
शरद यादव बहुत खुश हैं। वह कहते हैं कि आखिर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को महागठबंधन का महत्व समझ में तो आया। वह कहते हैं कि अब सब ठीक चलेगा। नीतीश कुमार ने भी पटना में राजभवन से बाहर आकर घोषणा कर दी है कि उन्होंने मुख्यमंत्री का पद छोड़ दिया है और एनडीए से बाहर आ गए हैं। एनडीए से बाहर आने का फैसला भी पार्टी का था।
कैसे अमित शाह भूल पाएंगे बिहार का दर्द?
गृह मंत्री अमित शाह राजनीति के चतुर खिलाड़ी माने जाते हैं। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का भी कहना है कि गृह मंत्री के सामने कोई उन्हें राजनीति का चाणक्य कहे तो चेहरे पर झीनी मुस्कान तैर जाती है। लेकिन अमित शाह के लिए बिहार में बदलाव का यह दर्द भूल पाना मुश्किल होगा। हालांकि गृह मंत्री के बारे में आम है कि वह प्रधानमंत्री के मन में चल रहे राजनीतिक डिजाइन को पहले ही भांपकर उस तरह का खाका तैयार कर देते हैं। बिहार के सूत्र बताते हैं कि पिछले 48 घंटे में भाजपा ने नीतीश को रोकने का हर दांव आजमाया, लेकिन सभी प्रयास खाली गए। राजनीति की भाषा में कहें तो यह भाजपा के लिए बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है।
जद(यू) के नेता भाजपा से बढ़ी दरार का बड़ा कारण 2020 के विधानसभा चुनाव की रणनीति को बताते हैं। इसके सूत्रधार अमित शाह थे। राज्य के प्रभारी भूपेंद्र यादव थे। इस चुनाव में भाजपा ने लोजपा (आर) के नेता चिराग पासवान को प्रधानमंत्री मोदी का हनुमान बना दिया था। चिराग ने अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा की थी और उनकी पार्टी से भाजपा के तमाम बागी नेताओं ने चुनाव लड़ा था। हालांकि चुनाव में लोजपा का खाता नहीं खुला, लेकिन बड़ी पार्टी में गिनी जाने वाली जदयू तीसरे नंबर पर आ गई। सबसे दिलचस्प रहा कि चुनाव आयोग की ओर से चुनाव की अधिसूचना जारी करने के बाद से अमित शाह विधानसभा चुनाव में प्रचार करने तक नहीं गए थे। इसलिए बिहार के इस घटना क्रम को अमित शाह बनाम नीतीश कुमार से जोड़कर अधिक देखा जा रहा है।
लालू यादव की कसक पूरी हो गई
बिहार में नई सरकार के शपथ ग्रहण तक राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी की मुस्कराते हुए तस्वीर देखने को मिल सकती है। राजद के नेता इसे बहुत अच्छा घटनाक्रम मान रहे हैं। एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि जब महागठबंधन को छोड़कर तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एनडीए का दामन थाम लिया था, तो उस दर्द को लालू के लिए भूलना मुश्किल था। भाजपा के लिए वह बड़ा जैकपॉट था। महागठबंधन के असली सूत्रधार शरद यादव ने इसे एक सदमे की तरह लिया था। शिवानंद तिवारी को नीतीश का एनडीए में जाना बहुत अखरा था। लालू प्रसाद ने नीतीश कुमार पर पलटूराम का ताना मारा था और यह बहुत चर्चित हुआ था। तब भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के चेहरे पर गजब की विजयी मुस्कान तैर रही थी। अब राजनीति के पंडित कहते हैं कि लालू प्रसाद यादव की आठ साल पुरानी कसक पूरी हो गई। नीतीश कुमार ने जिस अंदाज में महागठबंधन को छोड़ा था, उसी अंदाज में भाजपा और एनडीए से भी नाता तोड़ लिया।
अमित शाह ने बैरंग लौटाया था शाहनवाज हुसैन को
कुछ महीने पहले नीतीश कुमार की एनडीए के साझेवाली सरकार के भाजपा कोटे के मंत्री शाहनवाज हुसैन दिल्ली आए थे। उनके साथ कुछ और भाजपा नेता और मंत्री थे। शाहनवाज ने गृह मंत्री अमित शाह से भेंट की थी और उन्हें बिहार के ताजा हालात की जानकारी दी थी। नीतीश कुमार के रुख की भी। तब अमित शाह ने सभी को सुना था और एक सवाल से चुप करा दिया था। शाह का सवाल था कि क्या आज चुनाव हो जाएं तो आप में कोई अपने चेहरे पर बिहार में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार ला सकता है? सब मौन हो गए और लौट गए थे। हालांकि ऐसा नहीं है कि बिहार में भाजपा ने अपने हितों को रोक दिया था या फिर इससे कोई समझौता कर लिया था। जदयू के नेता कहते हैं कि कई महीने से टकराव चल रहा था। भाजपा अपनी चला रही थी। आरसीपी सिंह इसका माध्यम थे और इस गठबंधन को टूटना ही था।
क्या भाजपा के पास यह अल्टीमेटम आया था?
इसे भाजपा के अधिकारिक नेता अथवा नीतीश कुमार के सिवा कोई पुष्ट नहीं कर सकता है। लेकिन कुछ महीने पहले बिहार विधानसभा के अध्यक्ष विजय सिन्हा से पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सदन में ही टकराव सभी को याद होगा। बताते हैं इसके बाद जदयू के नेता नीतीश कुमार ने अपना संदेश भिजवा दिया था। नीतीश कुमार चाहते थे भाजपा बिहार में कामकाज का समन्वय बनाए। अपने प्रदेश अध्यक्ष को काबू में करे या उन्हें पद से हटाए। इसके अलावा विधानसभा अध्यक्ष विजय सिन्हा के स्थान पर नया विधानसभा अध्यक्ष बनाया जाए। बताते हैं कि नीतीश कुमार की इस इच्छा को भाजपा ने गंभीरता से नहीं लिया। भाजपा के नेताओं ने इसे अपनी पार्टी के हित, स्वतंत्रता और पार्टी के संप्रभुता से जोड़ लिया। एक तरह से कोशिश नीतीश कुमार को चोट पहुंचाने की थी। वह जारी रही। इसके सामानांतर नीतीश कुमार का राजनीतिक आत्मसम्मान भी अपने प्रतिमान पर टिका रहा।
आरसीपी सिंह ने नीतीश कुमार को इतना क्यों डरा दिया?
नीतीश कुमार के दाएं हाथ कहे जाने वाले आरसीपी सिंह का जदयू में जबरदस्त वर्चस्व था। 2016 से तो वह नीतीश कुमार के आंख, कान, नाक कहे जाते थे। शरद यादव कहते हैं कि जदयू में पिछले कुछ सालों में आरसीपी सिंह बड़ी गहराई तक फैल गए थे। राजद के नेता शिवानंद तिवारी का भी मानना है कि आरसीपी सिंह का मुद्दा सच में गंभीर था। बताते हैं कि आरसीपी सिंह से चुनाव प्रचार अभियान के रणनीतिकार प्रशांत किशोर और पूर्व राज्यसभा सांसद पवन वर्मा तक परेशान थे। जदयू के एक अन्य वरिष्ठ नेता ने बताया कि एनडीए में पार्टी के शामिल होने के बाद भी हमारा केंद्र में कोई मंत्री नहीं था। 2019 के चुनाव के बाद केवल आरसीपी सिंह ही केंद्रीय मंत्री की शपथ ले पाए थे। सूत्र का कहना है कि भाजपा ने कई राज्यों में ऑपरेशन लोटस चलाया है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भी उसका ऑपरेशन लोटस चला था और हमारी पार्टी 50 सीटों के नीचे आई थी। इसलिए 2022 में ऑपरेशन लोटस की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।