Bihar Political Crisis: भाजपा कब समझेगी? 'रबर स्टैंप' नेताओं के सहारे नहीं चलेगी बिहार की राजनीति
Bihar Political Crisis: बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के बाद नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी सरकार में भी तारकिशोर प्रसाद और रेनू देवी जैसे अनजान नेताओं को आगे बढ़ाया गया, इन नेताओं का नाम जनता के बीच तो दूर, पार्टी कार्यकर्ताओं तक के लिए अनजाना था...
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बिहार में जदयू-भाजपा गठबंधन टूट चुका है। लंबे समय से नीतीश कुमार के साथ बिहार की सत्ता में काबिज रही भाजपा सरकार से बाहर हो चुकी है और नीतीश कुमार एक बार फिर आरजेडी के साथ मिलकर सरकार बनाने की तैयारी कर रहे हैं। भाजपा के लिए यह करारा झटका है। केवल दस दिन पहले बिहार विधानसभा में पीएम नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में बड़ा कार्यक्रम कर प्रदेश की राजनीति में मजबूत तैयारी का संदेश देने वाली भाजपा को सत्ता से भी बाहर होना पड़ गया है। भाजपा नेतृत्व बिहार के बदले समीकरण का 2024 लोकसभा पर पड़ने वाले असर का आकलन करने में जुट गया है।
हालांकि, प्रदेश में ज्यादातर नेता-कार्यकर्ता मानते हैं कि पार्टी को सत्ता से भले ही बाहर होना पड़ गया है, लेकिन इससे पार्टी मजबूत होगी। इसके लिए उसे जनता के बीच सभी सामाजिक-जातीय समीकरणों को साध सकने वाले स्वीकार्य मजबूत नेतृत्व उभारने होंगे। पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच ही चर्चा है कि वर्तमान नेतृत्व दूसरे प्रदेशों की तरह रबर स्टैंप नेताओं के सहारे बिहार की राजनीति को हांकने की कोशिश कर रहा था, जिसके कारण प्रदेश में कोई बड़ा राजनैतिक नेतृत्व नहीं उभर पाया और इसी का नुकसान भाजपा को अब उठाना पड़ रहा है।
कई अनजान नेताओं को बढ़ाया आगे
बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के बाद नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी सरकार में भी तारकिशोर प्रसाद और रेनू देवी जैसे अनजान नेताओं को आगे बढ़ाया गया, इन नेताओं का नाम जनता के बीच तो दूर, पार्टी कार्यकर्ताओं तक के लिए अनजाना था। कार्यकर्ताओं के मुताबिक, पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व मानता है कि चुनाव में वोट केवल प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर मिलेगा, लेकिन यह रणनीति दूसरे प्रदेशों में तो सफल हो सकती है, राजनीतिक तौर पर बेहद जागरूक बिहार में इस तरह की राजनीति सफल नहीं हो सकती। विशेषकर यह बात ध्यान रखते हुए कि यहां की पूरी राजनीति एक-एक जाति के अलग-अलग नेताओं के कंधों पर टिकी रहती है। ऐसे में इन जातियों के बीच भाजपा के मजबूत कंधे के बिना बिहार में बड़ी मजबूती की कल्पना नहीं की जा सकती।
भाजपा के पास बिहार में ही राधामोहन सिंह, नागेंद्र कुमार, गिरिराज सिंह, सैयद शाहनवाज हुसैन और राजीव प्रताप रूडी के रूप में बड़े नेता मौजूद हैं, लेकिन इन नेताओं में कोई भी एक बड़े जननेता के रूप में नहीं उभर पाया। नित्यानंद राय को भी नेतृत्व के रूप में उभारने की कोशिश की गई, लेकिन वे भी प्रभाव छोड़ने में असफल रहे।
पार्टी ने प्रदेश में कोई बड़ा राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने पर विशेष ध्यान नहीं दिया। यही कारण है कि यूपी में अपराजेय राजनीतिक ताकत बन चुकी भाजपा बिहार में अकेले दम पर सत्ता तक पहुंचने में भी अब तक समर्थ नहीं हो पाई। इसमें नरेंद्र मोदी की प्रचंड लोकप्रियता के समय 2015 में लड़ा गया बिहार विधानसभा चुनाव भी शामिल है, जिसमें पार्टी 50 सीटों तक भी नहीं पहुंच सकी।
सुशील मोदी को मिला उभार
दरअसल, बिहार में भाजपा कभी एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पाई। इसके लिए संभवतया उसकी हिंदूवादी राजनीतिक विचारधारा को जिम्मेदार कहा जा सकता है, जो बिहार के मजबूत सेक्युलर नेताओं के करिश्मे के कारण कभी सफल नहीं हो पाई। कांग्रेसकाल से बाहर आने के बाद भी बिहार की राजनीति लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द घूमती रही। भाजपा को बिहार में सत्ता का स्वाद केवल नीतीश कुमार के साथ आने के बाद ही मिला। नीतीश के साथ आने के बाद लगभग दो दशक से (कुछ अंतराल को छोड़कर) भाजपा सत्ता में रही।
लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं का आरोप है कि नीतीश के साथ आने के कारण पार्टी सिमटकर रह गई। सुशील कुमार मोदी बिहार में भाजपा के एकमात्र बड़े नेता के रूप में उभरे। लेकिन प्रदेश में उन्हें भाजपा के बीच नीतीश कुमार के ‘एजेंट’ के तौर पर देखा जाता रहा। आरोप तो यहां तक लगाया जाता है कि उनके कहने पर विधानसभा चुनावों में टिकटों का वितरण भी इस प्रकार किया जाता था, जिससे भाजपा को ज्यादा मजबूत होने का अवसर न मिले। उनके साथ गिरिराज सिंह, राधामोहन सिंह जैसे नेता प्रदेश में बड़े कद के अवश्य रहे, लेकिन भाजपा की पहचान बनकर केवल सुशील मोदी ही उभरे।
नए विकल्प को उभारने की कोशिश
पार्टी कार्यकर्ताओं को लग रहा है कि शायद अब केंद्रीय नेतृत्व पूरी ताकत के साथ बिहार में जुटेगा और बिहार के सामाजिक-जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए नए विकल्प को उभारने की कोशिश करेगा। बिहार की वर्तमान परिस्थितियां नए नेतृत्व को उभारने में पूरा सहयोग दे सकती हैं। बिहार की राजनीति अब दो ध्रुवीय होती दिख रही है, जिसमें एक तरफ भाजपा होगी जो हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और इस्लामिक चरमपंथ के खिलाफ अपना जनाधार बढ़ाने का काम करेगी, तो दूसरी तरफ जातीय गठजोड़ और सेक्युलर राजनीति के नाम पर आरजेडी-जदयू राजनीति करेंगी। यदि भाजपा राष्ट्रवाद के सहारे बिहार का ‘जातीय तिलस्म’ तोड़ने में कामयाब रही तो उसकी किस्मत खुल सकती है।
लेकिन प्रदेश के नेता-कार्यकर्ता मानते हैं कि बिहार की राजनीति को साधने के लिए यहां सभी जातियों के बीच स्वीकार्य नेतृत्व उभारने होंगे। पार्टी को समझना पड़ेगा कि तारकिशोर प्रसाद या रेनू देवी जैसे रबर स्टैंप नेताओं के सहारे बिहार को नहीं जीता जा सकता।