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बिहार के महाकांड: घोटाला जिसमें मंगाया गया करोड़ों का 'चारा-दवा और सांड'; जानवर नहीं, नेताओं का था पूरा कांड
Fri, 18 Jul 2025 11:56 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Fri, 18 Jul 2025 11:56 AM IST
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सार
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लालू प्रसाद यादव।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
बिहार में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। राजनीतिक दलों ने इन चुनावों के मद्देनजर एक-दूसरे पर वार-पलटवार कर रहे हैं। विपक्ष चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण पर सवाल उठा रहा है। कानून व्यस्था को भी विपक्ष ने मुद्दा बना रखा है। वहीं, सत्ता पक्ष लालू सरकार के दौर को याद दिला रहा है। उस दौर को जंगलराज करार दे रहा है, लालू सरकार के दौरान हुए चारा घोटाले को भी उठाया जा रहा है।'बिहार के महाकांड' सीरीज के 13वें भाग में आज एनडीए की तरफ से बार-बार उठाए जाने वाले चारा घोटाले की बात। आखिर चारा घोटाला क्या था? कैसे यह एक-दो साल नहीं, बल्कि एक दशक तक चलता रहा? बिहार के दो पूर्व मुख्यमंत्री किन आरोपों के तहत इससे जुड़े मामलों में दोषी साबित हुए? इसके अलावा लालू प्रसाद यादव जिन पांच मामलों में दोषी करार दिए गए, वह सभी मामले क्या थे? इनका खुलासा कैसे हुआ? आइये जानते हैं...
क्या था बिहार का चारा घोटाला?
चारा घोटाला से जुड़ा अधिकतर फर्जीवाड़ा आज के समय में अलग राज्य बन चुके 'झारखंड' का है। यह पूरा घोटाला बिहार सरकार के पशुपालन विभाग के जरिए हुआ था। जिस चारा घोटाले का आरोप लालू प्रसाद यादव पर लगता है, वह उनके ही समय से शुरू नहीं हुआ था, बल्कि इसकी शुरुआत 1980 के दशक में ही हो चुकी थी। तब बिहार में कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे। भारत के तत्कालीन नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) टीएन चतुर्वेदी ने उस दौरान बिहार के खजाने से रकम निकासी और इसके लिए हर महीने लगाई जा रही रसीदों को दायर करने में देरी का मुद्दा उठाया था। सीएजी ने उस दौरान ही खजाने से गड़बड़ लेनदेन और धनशोधन की आशंका जताई थी। हालांकि, तत्कालीन सरकार ने सीएजी की रिपोर्ट पर ध्यान नहीं दिया और घोटाला जारी रहा। लालू के दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने तक बिहार का यह घोटाला 950 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था।
चारा घोटाला से जुड़ा अधिकतर फर्जीवाड़ा आज के समय में अलग राज्य बन चुके 'झारखंड' का है। यह पूरा घोटाला बिहार सरकार के पशुपालन विभाग के जरिए हुआ था। जिस चारा घोटाले का आरोप लालू प्रसाद यादव पर लगता है, वह उनके ही समय से शुरू नहीं हुआ था, बल्कि इसकी शुरुआत 1980 के दशक में ही हो चुकी थी। तब बिहार में कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे। भारत के तत्कालीन नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) टीएन चतुर्वेदी ने उस दौरान बिहार के खजाने से रकम निकासी और इसके लिए हर महीने लगाई जा रही रसीदों को दायर करने में देरी का मुद्दा उठाया था। सीएजी ने उस दौरान ही खजाने से गड़बड़ लेनदेन और धनशोधन की आशंका जताई थी। हालांकि, तत्कालीन सरकार ने सीएजी की रिपोर्ट पर ध्यान नहीं दिया और घोटाला जारी रहा। लालू के दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने तक बिहार का यह घोटाला 950 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था।
घोटाले का खुलासा कैसे हुआ?
सीएजी को जब 1985 में बिहार सरकार के खजाने में गड़बड़ लेनदेन का पता चला तो उन्होंने इस बारे में तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह को चिट्ठी लिखी। कैग ने इसके बाद भी बिहार के अलग-अलग सीएम से मामले की जांच कराने को कहा। हालांकि, उसकी इन चेतावनियों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा।
इसके बाद आया 1990 का दौर। लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बन चुके थे, लेकिन सीएजी की रिपोर्ट को उनकी सरकार में भी नजरअंदाज किया गया। 1992 में बिहार के राज्य सतर्कता विभाग में पुलिस इंस्पेक्टर पद पर तैनात बिधु भूषण द्विवेदी ने अपने विभाग के महानिदेशक जी. नारायणन को एक रिपोर्ट भेजी। इसमें उन्होंने जानवरों के चारे और दवाओं की खरीद में खर्चे जा रहे पैसे को लेकर शक जताया। साथ ही इस मामले में कई वर्षों से मुख्यमंत्री के स्तर तक के लोगों के जुड़े होने का संदेह जाहिर किया। बताया जाता है कि प्रशासन ने तब खुलकर इस मामले की जांच नहीं की।
सीएजी को जब 1985 में बिहार सरकार के खजाने में गड़बड़ लेनदेन का पता चला तो उन्होंने इस बारे में तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह को चिट्ठी लिखी। कैग ने इसके बाद भी बिहार के अलग-अलग सीएम से मामले की जांच कराने को कहा। हालांकि, उसकी इन चेतावनियों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा।
इसके बाद आया 1990 का दौर। लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बन चुके थे, लेकिन सीएजी की रिपोर्ट को उनकी सरकार में भी नजरअंदाज किया गया। 1992 में बिहार के राज्य सतर्कता विभाग में पुलिस इंस्पेक्टर पद पर तैनात बिधु भूषण द्विवेदी ने अपने विभाग के महानिदेशक जी. नारायणन को एक रिपोर्ट भेजी। इसमें उन्होंने जानवरों के चारे और दवाओं की खरीद में खर्चे जा रहे पैसे को लेकर शक जताया। साथ ही इस मामले में कई वर्षों से मुख्यमंत्री के स्तर तक के लोगों के जुड़े होने का संदेह जाहिर किया। बताया जाता है कि प्रशासन ने तब खुलकर इस मामले की जांच नहीं की।
1995 के अंत में बिहार में वित्त आयुक्त रहे एस. विजय राघवन ने सरकारी खजाने से पैसों के लेनदेन के मुद्दों पर सभी जिलों के जिलाधिकारियों को आगाह किया और कहा कि डीएम रकम निकासी से लेकर इसके खर्चों की जानकारी उन्हें मुहैया कराएं। राघवन ने जब यह आदेश दिया, तब चाइबासा में अमित खरे पशुपालन विभाग में डिप्टी कमिश्नर थे। 1985 बैच के आईएएस अधिकारी खरे ने जब अपने जिले में सरकारी खजाने की जांच की तो सामने आया कि जिले के पशुपालन विभाग से अलग-अलग मौकों पर करीब 20 करोड़ रुपये निकाले गए हैं, लेकिन इसके खर्चों से जुड़ी रसीद और दस्तावेज नहीं दिए गए हैं। इसके बाद उन्होंने विभाग से जानकारी देने को कहा। लेकिन जवाब नहीं आया। आखिरकार अमित खरे कुछ महीनों के इंतजार के बाद खुद पशुपालन विभाग के दफ्तर पहुंच गए। जांच की तो कई गड़बड़ियों का खुलासा हुआ।
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सीबीआई तक कैसे पहुंची मामले की जांच?
अमित खरे की छापेमारी के बाद राज्य सरकार ने जांच के लिए दो आयोग गठित किए। इनमें एक आयोग राज्य विकास आयुक्त फूलचंद सिंह की अध्यक्षता में गठित हुआ था, जिन्हें लेकर बाद में सामने आया था कि वह भी चारा घोटाले के खेल में शामिल थे। इसके चलते इस आयोग को खत्म कर दिया गया। हालांकि, बिहार पुलिस ने इस मामले में जांच जारी रखी और राज्य सरकार के निर्देशों के आधार पर 41 एफआईआर दर्ज कीं। इसके अलावा 23 केस पटना हाईकोर्ट के आदेश के बाद दर्ज हुए।
चारा घोटाले का खुलासा होने के बाद लालू प्रसाद यादव की मुश्किलें बढ़ गईं। लालू ने तब अपने बचाव के लिए कई तर्क दिए और इनका जिक्र उनकी किताब- गोपालगंज टू रायसीना में भी मिलता है, लेकिन विपक्ष में बैठी भाजपा, समता पार्टी लगातार लालू पर हमलावर रहीं। भाजपा नेता सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद, सरयू राय; जनता दल से नाराज हुए शिवानंद तिवारी और कांग्रेस नेता प्रेम चंद्र मिश्र ने तो इस दौरान तक पटना हाईकोर्ट में पांच जनहित याचिकाएं (पीआईएल) दाखिल कर दी। इन्हीं पर सुनवाई के बाद मार्च 1996 में पटना हाईकोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी। लालू प्रसाद यादव की सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका डालकर कहा था कि बिहार पुलिस मामले की जांच में सक्षम है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला कायम रखा।
अमित खरे की छापेमारी के बाद राज्य सरकार ने जांच के लिए दो आयोग गठित किए। इनमें एक आयोग राज्य विकास आयुक्त फूलचंद सिंह की अध्यक्षता में गठित हुआ था, जिन्हें लेकर बाद में सामने आया था कि वह भी चारा घोटाले के खेल में शामिल थे। इसके चलते इस आयोग को खत्म कर दिया गया। हालांकि, बिहार पुलिस ने इस मामले में जांच जारी रखी और राज्य सरकार के निर्देशों के आधार पर 41 एफआईआर दर्ज कीं। इसके अलावा 23 केस पटना हाईकोर्ट के आदेश के बाद दर्ज हुए।
चारा घोटाले का खुलासा होने के बाद लालू प्रसाद यादव की मुश्किलें बढ़ गईं। लालू ने तब अपने बचाव के लिए कई तर्क दिए और इनका जिक्र उनकी किताब- गोपालगंज टू रायसीना में भी मिलता है, लेकिन विपक्ष में बैठी भाजपा, समता पार्टी लगातार लालू पर हमलावर रहीं। भाजपा नेता सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद, सरयू राय; जनता दल से नाराज हुए शिवानंद तिवारी और कांग्रेस नेता प्रेम चंद्र मिश्र ने तो इस दौरान तक पटना हाईकोर्ट में पांच जनहित याचिकाएं (पीआईएल) दाखिल कर दी। इन्हीं पर सुनवाई के बाद मार्च 1996 में पटना हाईकोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी। लालू प्रसाद यादव की सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका डालकर कहा था कि बिहार पुलिस मामले की जांच में सक्षम है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला कायम रखा।
इस मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी गौर करने वाली है। आदेश में कहा गया कि पशुपालन विभाग में सरकारी खजाने के साथ हेरफेर 1977-78 से जारी है। कोर्ट को लगता है कि प्रस्तावित जांच 1977-78 से लेकर 1995-96 तक की पूरी अवधि के दौरान की जाए। कोर्ट ने आदेश दिया कि इस पूरी जांच को सही अंत तक पहुंचाया जाए।
सीबीआई की जांच में क्या-क्या सामने आया?
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने कुल 64 मामलों की जांच शुरू की। सबसे पहले चाईबासा के सरकारी खजाने से पैसों के हेरफेर की एफआईआर दर्ज की गई। इसी साल सीबीआई ने बिहार के राज्यपाल से मामले में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के खिलाफ केस चलाने की अनुमति की मांग की। राज्यपाल ने इजाजत दे दी और सीबीआई ने जून 1997 में लालू के साथ 55 अन्य को आरोपी बनाते हुए चार्जशीट भी दायर कर दी। इन लोगों पर आईपीसी के सेक्शन 420 (धोखाधड़ी), 120बी (आपराधिक षडयंत्र) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13बी के तहत मुकदमे दर्ज हुए। सीबीआई ने आरोपपत्र में कहा कि चारा घोटाले में बड़े लोगों का संबंध राजनीतिक दलों से मिला है। इन बड़े लोगों के पास घोटाले से अर्जित अवैध कमाई का हिस्सा गया।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने कुल 64 मामलों की जांच शुरू की। सबसे पहले चाईबासा के सरकारी खजाने से पैसों के हेरफेर की एफआईआर दर्ज की गई। इसी साल सीबीआई ने बिहार के राज्यपाल से मामले में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के खिलाफ केस चलाने की अनुमति की मांग की। राज्यपाल ने इजाजत दे दी और सीबीआई ने जून 1997 में लालू के साथ 55 अन्य को आरोपी बनाते हुए चार्जशीट भी दायर कर दी। इन लोगों पर आईपीसी के सेक्शन 420 (धोखाधड़ी), 120बी (आपराधिक षडयंत्र) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13बी के तहत मुकदमे दर्ज हुए। सीबीआई ने आरोपपत्र में कहा कि चारा घोटाले में बड़े लोगों का संबंध राजनीतिक दलों से मिला है। इन बड़े लोगों के पास घोटाले से अर्जित अवैध कमाई का हिस्सा गया।
सीबीआई ने यह भी कहा कि 1990 के बाद जब यह घोटाला जारी रहा, तब लालू प्रसाद यादव राज्य में वित्त मंत्रालय का प्रभार संभाल रहे थे और उन्हें पशुपालन विभाग से बड़ी और संदिग्ध निकासी की जानकारी थी। हालांकि, उन्होंने पशुपालन विभाग के तत्कालीन क्षेत्रीय निदेशक और घोटाले के मुख्य आरोपी बनाए गए श्याम बिहारी सिन्हा के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय दिसंबर 1993 में उनका कार्यकाल तक बढ़ा दिया। सीबीआई का कहना था कि श्याम बिहारी सिन्हा का कार्यकाल बढ़ाने का प्रस्ताव तब पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने दिया था, जिनके कार्यकाल में पहली बार चारा घोटाले से जुड़े मामले सामने आए थे।
इस चार्जशीट में लालू के खिलाफ यह भी आरोप था कि उन्होंने दिल्ली स्थित केंद्रीय सतर्कता आयोग के निदेशक के 27 जुलाई 1993 के उस पत्र का जवाब नहीं दिया था, जिसमें उनसे पशुपालन विभाग में हो रहे भ्रष्टाचार के जांच की मांग की गई थी।
इस चार्जशीट में लालू के खिलाफ यह भी आरोप था कि उन्होंने दिल्ली स्थित केंद्रीय सतर्कता आयोग के निदेशक के 27 जुलाई 1993 के उस पत्र का जवाब नहीं दिया था, जिसमें उनसे पशुपालन विभाग में हो रहे भ्रष्टाचार के जांच की मांग की गई थी।
किन-किन मामलों में दोषी पाए गए लालू?
लालू प्रसाद यादव के खिलाफ कुल छह मामले दर्ज हुए थे। साल 2000 में बिहार का बंटवारा होने के बाद चार मामले झारखंड ट्रांसफर हो गए, जबकि दो मामले बिहार में चलते रहे। आइये जानते हैं उन मामलों के बारे में।1. चाईबासा ट्रेजरी घोटाला
इस मामले में कोर्ट में सुनवाई फरवरी 2002 में शुरू हुई। केस में कुल 170 लोगों को आरोपी बनाया गया। इनमें से 55 लोग तब तक मर चुके थे। सात लोग सरकारी गवाह बन गए थे। वहीं छह लोग तब गायब थे और दो लोगों ने आरोप कबूल लिए थे। इस मामले का फैसला मार्च 2012 में आया। लालू और जगन्नाथ मिश्र पर बांका और भागलपुर जिले से बैंकों के जरिए धोखाधड़ी की रकम निकालने के आरोप थे। 37.7 करोड़ रुपये के चाईबासा घोटाले में लालू को पहली सजा हुई। उन्हें पांच साल जेल की सजा दी गई। हालांकि, दिसंबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी। तब तक सुप्रीम कोर्ट वह फैसला सुना चुकी थी, जिसके तहत दो साल से ज्यादा सजा पाए नेता चुनाव नहीं लड़ सकते थे। ऐसे में लालू पर भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंध लग गया।
2. देवघर ट्रेजरी घोटाला
राजद सुप्रीमो के खिलाफ दूसरा मामला देवघर पशुपालन विभाग के जरिए 89.27 लाख रुपये की अवैध निकासी से जुड़ा था। दिसंबर 2017 में कोर्ट ने उन्हें दोषी पाते हुए साढ़े तीन साल की जेल की सजा सुनाई। साथ ही उन पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। जुलाई 2021 में उन्हें इस मामले में जमानत मिल गई। दूसरी तरफ जगन्नाथ मिश्र इस मामले में बरी कर दिए गए।
3. चाईबासा ट्रेजरी केस-2
लालू प्रसाद यादव को चाईबासा ट्रेजरी से 33.13 करोड़ रुपये की निकासी के एक और धोखाधड़ी वाले मामले में जनवरी 2018 में दोषी पाया गया। उन्हें इस मामले में पांच साल जेल की सजा हुई।
राजद सुप्रीमो के खिलाफ दूसरा मामला देवघर पशुपालन विभाग के जरिए 89.27 लाख रुपये की अवैध निकासी से जुड़ा था। दिसंबर 2017 में कोर्ट ने उन्हें दोषी पाते हुए साढ़े तीन साल की जेल की सजा सुनाई। साथ ही उन पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। जुलाई 2021 में उन्हें इस मामले में जमानत मिल गई। दूसरी तरफ जगन्नाथ मिश्र इस मामले में बरी कर दिए गए।
3. चाईबासा ट्रेजरी केस-2
लालू प्रसाद यादव को चाईबासा ट्रेजरी से 33.13 करोड़ रुपये की निकासी के एक और धोखाधड़ी वाले मामले में जनवरी 2018 में दोषी पाया गया। उन्हें इस मामले में पांच साल जेल की सजा हुई।
4. दुमका ट्रेजरी घोटाला
लालू प्रसाद यादव को विशेष सीबीआई अदालत ने चारा घोटाले से जुड़े एक और मामले में मार्च 2018 में दोषी करार दिया। यहां पशुपालन विभाग पर सरकारी खजाने से 3.76 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगा था। यह रकम दिसंबर 1995 से जनवरी 1996 के बीच निकाली गई थी। लालू को इस मामले में 14 साल की जेल की सजा हुई थी। साथ ही 60 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। अप्रैल 2021 में लालू को इस मामले में जमानत मिल गई।
5. डोरंडा ट्रेजरी घोटाला
लालू के खिलाफ पांचवां मामला डोरंडा ट्रेजरी से 139.35 करोड़ रुपये की अवैध निकासी से जुड़ा था। इस मामले में उन्हें फरवरी 2022 में दोषी पाया गया। उन्हें पांच साल जेल की सजा दी गई थी। साथ ही उन पर 60 लाख रुपये का जुर्माना लगा था। यह आखिरी बार था, जब चारा घोटाले से जुड़े केस में उन्हें सजा हुई।
लालू प्रसाद यादव को विशेष सीबीआई अदालत ने चारा घोटाले से जुड़े एक और मामले में मार्च 2018 में दोषी करार दिया। यहां पशुपालन विभाग पर सरकारी खजाने से 3.76 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगा था। यह रकम दिसंबर 1995 से जनवरी 1996 के बीच निकाली गई थी। लालू को इस मामले में 14 साल की जेल की सजा हुई थी। साथ ही 60 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। अप्रैल 2021 में लालू को इस मामले में जमानत मिल गई।
5. डोरंडा ट्रेजरी घोटाला
लालू के खिलाफ पांचवां मामला डोरंडा ट्रेजरी से 139.35 करोड़ रुपये की अवैध निकासी से जुड़ा था। इस मामले में उन्हें फरवरी 2022 में दोषी पाया गया। उन्हें पांच साल जेल की सजा दी गई थी। साथ ही उन पर 60 लाख रुपये का जुर्माना लगा था। यह आखिरी बार था, जब चारा घोटाले से जुड़े केस में उन्हें सजा हुई।