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बेकाबू होता देश, क्या ये जनता का दबा हुआ आक्रोश है?
अतुल सिन्हा, अमर उजाला
Updated Tue, 03 Apr 2018 07:09 PM IST
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आखिर क्या वजह है कि अपने देश में जब तक कोई आंदोलन उग्र या हिंसक नहीं होता, उस दौरान जानमाल का नुकसान नहीं होता, आगजनी नहीं होती या लोग नहीं मरते तब तक उसे गंभीरता से नहीं लिया जाता? आखिर क्यों ऐसा होता है कि जब चुनाव करीब होते हैं तो ऐसे तमाम संवेदनशील मसले इस हद तक सतह पर उभर आते हैं कि उन्हें संभाल पाना मुश्किल हो जाता है? चाहे वो जाटों का आंदोलन हो, धर्म और संप्रदाय के सवाल हों या दलितों-पिछड़ों की सुरक्षा जैसे मसले।
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अपने देश में न्यायपालिका हो या फिर चुनाव आयोग – ऐसा क्यों माना जाता है कि इनके हर फैसले के पीछे कहीं न कहीं केन्द्र सरकार है या फिर सत्ताधारी पार्टी? ये सवाल नए नहीं हैं, लेकिन बरसों से उठते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दलितों की सुरक्षा के नाम पर 1989 में बने कानून के कुछ प्रावधानों को 20 मार्च को खारिज क्या किया, उसकी मंशा पर गंभीर सवाल उठ गए। हालात किस हद तक बेकाबू हुए, पूरा देश देख रहा है।
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सियासत करने वाले अपनी अपनी भाषा बोल रहे हैं, आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा है, लेकिन सवाल वही है कि क्या ऐसे हालात अचानक पैदा हो गए। क्या लोगों के भीतर इस कदर गुस्सा भर गया है कि उसके ऐसे नतीजे देखने को मिल रहे हैं – कहीं सांप्रदायिक दंगे, तो कहीं दलितों के नाम पर हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़... सरेआम गोली चलाते लोग, हाथों में हथियार लहराते गुंडे और पुलिस-प्रशासन की नाकामी।
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याद कीजिए, उस दौर को जब आरक्षण आंदोलन की शुरूआत ही हुई थी। वो सत्तर और अस्सी के दशक का आखिरी दौर था। पिछड़ी जीतियों, दलितों और अनुसूचित जातियों, जनजातियों को आरक्षण देने की मांग ज़ोर पकड़ रही थी। जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में 6 लोगों का आयोग बनाया जिसने 1980 में अपनी सिफारिशें दे दीं। मंडल कमीशन की सिफारिशें 1990 में तत्कालीन वी पी सिंह सरकार ने लागू कीं।
देश में इसके खिलाफ जबरदस्त हिंसक आंदोलन हुए, आत्मदाह की घटनाएं हुईं। लेकिन आरक्षण की व्यवस्था लागू हो गई। उसी दौरान 1989 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) कानून बनाया गया जिसे एससी-एसटी एक्ट के तौर पर जाना जाता है। 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने जहां मंडल कमीशन की सिफारिशों को सही करार देते हुए अंतिम तौर पर देश में 50 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था पर मुहर लगा दिया, वहीं दलितों की सुरक्षा के नाम पर बना कानून पूरी तरह अस्तित्व में आ गया।
लेकिन फिलहाल हमारा मकसद आरक्षण की व्यवस्था और इसके कानून की बारीकियों में जाना नहीं बल्कि मौजूदा हालात के पीछे की सियासत को तलाशने की कोशिश करना है। भाजपा की सरकार बनने के बाद से आरक्षण को लेकर कई बयान बीच बीच में आते रहे। खासकर संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस सुझाव की भी खासी चर्चा रही कि देश को जाति और वर्ग में बांटने वाले आरक्षण की व्यवस्था खत्म कर देना चाहिए। संघ का एक बड़ा तबका इसे सही मानता है और आरक्षण की अवधारणा को ही समाज को बांटने वाला बताता है। लेकिन देश की सियासत में बेहद गहराई तक पैठ बना चुकी इस व्यवस्था को खत्म करने के बारे में सोचना भी ऐसी ही किसी अप्रिय स्थिति का अंदेशा देने वाला था, इसलिए सरकार ने ऐसी किसी भी अवधारणा को खारिज किया और भाजपा ने बढ़ चढ़कर दलितों, पिछड़ों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में और आरक्षण की हिमायत में तमाम दलीलें दीं।
मोदी सरकार बनने के बाद
दूसरी तरफ मोदी सरकार बनने के बाद से दलित उत्पीड़न के कई ऐसे बड़े मुद्दे सामने आए, जिससे सरकार को बेहद मुश्किलें उठानी पड़ीं – चाहे वो फरीदाबाद में दलित परिवार को जलाए जाने का मामला हो, रोहित वेमुला की आत्महत्या हो, गुजरात के ऊना में दलितों पर गोरक्षकों की गुंडागर्दी हो, सहारनपुर में राजपूतों और दलितों के बीच के हिंसक संघर्ष हों या फिर पुणे में इसी साल जनवरी में हुई हिंसा हो। हरियाणा की कई घटनाएं हो या उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र में दलितों के आंदोलन हों। याद कीजिए, गुजरात में दलितों के आंदोलन और उभार की वजह से आनंदीबेन को कुर्सी से हटाना पड़ा था और इन तमाम वजहों से गुजरात में इस बार भाजपा को सत्ता पाने में किस हद तक मशक्कत करनी पड़ी, ये किसी से छिपा नहीं है।
ऐसे तमाम सामाजिक परिदृश्य के बीच जब से उत्तर प्रदेश में दलितों और पिछड़ों के नाम पर राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच दोस्ती की बुनियाद दिखी, चुनावी नतीजे भाजपा के खिलाफ गए, तब ये धारणा और मज़बूत होने लगी कि भाजपा और संघ के एजेंडे में दलितों और पिछड़ों की अहमियत उतनी नहीं है। अब भाजपा को बार बार ये सफाई देनी पड़ रही है कि सबसे ज्यादा दलित उसके साथ हैं, सबसे ज्यादा पिछड़े उसके साथ हैं और वह दलितों के हितों का पूरा सम्मान करती है और उनकी सुरक्षा को लेकर बेहद गंभीर है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए जो फैसला दिया, उसने आग में घी का काम किया। सरकार ने पुनर्विचार याचिका दाखिल तो की लेकिन 12 दिनों के बाद, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया और इस बात पर कायम रहा कि दलित उत्पीड़न की शिकायत भर से आरोप साबित नहीं होता और न ही गिरफ्तारी का कोई आधार बनता है।
जाहिर है एससी-एसटी एक्ट के दुरूपयोग और इसके नामपर बेगुनाहों को पकड़ने, पुलिसिया जुल्म और जबरन एससी-एसटी एक्ट में फंसाने की धमकी जैसे कई मामले सामने भी आए। सरकार के इस कानून का ईमानदारी से पालन करवाने में नाकाम रहने पर सुप्रीम कोर्ट ने ये जो फैसला सुनाया, उसके खिलाफ भाजपा के भीतर से भी तमाम विरोध के स्वर मुखर हुए। चाहे वो बहराइच की सांसद सावित्री बाई फुले हों, रामविलास पासवान हों, उदित राज हों या फिर भारत बंद के नाम पर बने संविधान बचाओ संघर्ष समिति और मोर्चे में शामिल नेता।
आंदोलन को हिंसक बना देने और इतने लोगों के मारे जाने की इन घटनाओं में खासकर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, बिहार, झारखंड, ओड़िसा, हरियाणा, पंजाब जैसे राज्य शामिल रहे हैं। इनमें से ज्यादातर में भाजपा की सरकारें हैं और हालात बेकाबू भी सबसे ज्यादा उन्हीं राज्यों में हुए। मायावती से लेकर जिग्नेश मेवाणी तक और उदित राज से लेकर पासवान तक यही कह रहे हैं कि विरोध शांतिपूर्ण तरीके से करें और जो लोग हिंसा कर रहे हैं, वो दलितों को बदनाम कर रहे हैं, ऐसे में सियासत अपनी भाषा बोल रही है और सबसे बड़ी चुनौती इस वक्त अगर किसी के सामने है तो वो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के सामने है कि पेपर लीक, सांप्रदायिक दंगों और अब दलितों के आक्रोश के इस सैलाब को संभालें तो कैसे संभालें। सामने कर्नाटक और दूसरे राज्यों के चुनाव हैं, 2019 दस्तक दे रहा है। बेशक ये उनके लिए गंभीर चुनौती का वक्त है।
ऐसे तमाम सामाजिक परिदृश्य के बीच जब से उत्तर प्रदेश में दलितों और पिछड़ों के नाम पर राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच दोस्ती की बुनियाद दिखी, चुनावी नतीजे भाजपा के खिलाफ गए, तब ये धारणा और मज़बूत होने लगी कि भाजपा और संघ के एजेंडे में दलितों और पिछड़ों की अहमियत उतनी नहीं है। अब भाजपा को बार बार ये सफाई देनी पड़ रही है कि सबसे ज्यादा दलित उसके साथ हैं, सबसे ज्यादा पिछड़े उसके साथ हैं और वह दलितों के हितों का पूरा सम्मान करती है और उनकी सुरक्षा को लेकर बेहद गंभीर है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए जो फैसला दिया, उसने आग में घी का काम किया। सरकार ने पुनर्विचार याचिका दाखिल तो की लेकिन 12 दिनों के बाद, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया और इस बात पर कायम रहा कि दलित उत्पीड़न की शिकायत भर से आरोप साबित नहीं होता और न ही गिरफ्तारी का कोई आधार बनता है।
जाहिर है एससी-एसटी एक्ट के दुरूपयोग और इसके नामपर बेगुनाहों को पकड़ने, पुलिसिया जुल्म और जबरन एससी-एसटी एक्ट में फंसाने की धमकी जैसे कई मामले सामने भी आए। सरकार के इस कानून का ईमानदारी से पालन करवाने में नाकाम रहने पर सुप्रीम कोर्ट ने ये जो फैसला सुनाया, उसके खिलाफ भाजपा के भीतर से भी तमाम विरोध के स्वर मुखर हुए। चाहे वो बहराइच की सांसद सावित्री बाई फुले हों, रामविलास पासवान हों, उदित राज हों या फिर भारत बंद के नाम पर बने संविधान बचाओ संघर्ष समिति और मोर्चे में शामिल नेता।
आंदोलन को हिंसक बना देने और इतने लोगों के मारे जाने की इन घटनाओं में खासकर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, बिहार, झारखंड, ओड़िसा, हरियाणा, पंजाब जैसे राज्य शामिल रहे हैं। इनमें से ज्यादातर में भाजपा की सरकारें हैं और हालात बेकाबू भी सबसे ज्यादा उन्हीं राज्यों में हुए। मायावती से लेकर जिग्नेश मेवाणी तक और उदित राज से लेकर पासवान तक यही कह रहे हैं कि विरोध शांतिपूर्ण तरीके से करें और जो लोग हिंसा कर रहे हैं, वो दलितों को बदनाम कर रहे हैं, ऐसे में सियासत अपनी भाषा बोल रही है और सबसे बड़ी चुनौती इस वक्त अगर किसी के सामने है तो वो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के सामने है कि पेपर लीक, सांप्रदायिक दंगों और अब दलितों के आक्रोश के इस सैलाब को संभालें तो कैसे संभालें। सामने कर्नाटक और दूसरे राज्यों के चुनाव हैं, 2019 दस्तक दे रहा है। बेशक ये उनके लिए गंभीर चुनौती का वक्त है।