शहीद भगत सिंह की जयंती पर विशेषः भगत सिंह, सुखदेव के गुप्त ठिकाने को भूली सरकार
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
देश की आजादी में क्रांतिकारी वीर शहीदों के योगदान को भले ही सरकारें मानती हों, लेकिन इन सपूतों से जुड़े कई ऐसे ऐतिहासिक स्थान हैं जो अब भी उपेक्षा के शिकार हैं। फिरोजपुर शहर के तूड़ी बाजार में एक ऐसी इमारत है जो कभी देश की आजादी के लिए लड़ने वाले वीर क्रांतिकारियों की कर्मभूमि थी, लेकिन सरकारों ने कभी इस स्थान को सहेजने की दिशा में काम नहीं किया। केंद्र सरकार की नजर में तो यह कभी आया नहीं, पंजाब सरकार भी इसे यादगार बनाने के संदर्भ में किया गया अपना वादा भूल चुकी है।
शहागंज मुहल्ले में स्थित इस इमारत को कृष्णा मंदिर ट्रस्ट सरकार को सौंपना चाहता है, ताकि इसे एक यादगार स्थल के रूप में सहेजा जा सके, लेकिन सरकार इसमें रुचि लेती दिख नहीं रही। ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक अंग्रेजों से भारत को आजाद कराने के लिए क्रांतिकारियों ने इस इमारत को गुप्त ठिकाने के तौर पर इस्तेमाल किया था। सांडर्स की हत्या से पहले क्रांतिकारी इसी ठिकाने पर एयर पिस्टल से निशानेबाजी का अभ्यास करते थे।
लेखक राकेश कुमार ने इस गुप्त ठिकाने के बारे में अपनी किताब में कई ऐतिहासिक तथ्यों का उल्लेख किया है। राकेश कुमार के मुताबिक आठ व नौ सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला किले में क्रांतिकारियों की एक बड़ी बैठक हुई थी। इसमें अंग्रेजों का मालखाना लूटने के लिए भगत सिंह व चंद्र शेखर आजाद को सितंबर के आखिर में फनिंदर घोष के पास बिहार पहुंचने के लिए कहा गया था।
बेहद महत्वपूर्ण था यह ठिकाना
भगत सिंह अगर सिखी स्वरूप में वहां जाते तो पहचाने जाते इसलिए फिरोजपुर के इसी गुप्त ठिकाने में क्रांतिकारी सुखदेव व डॉ. निगम ने उनकी केश-दाढ़ी काटी थी। यहां पर भगत सिंह के अलावा चंद्र शेखर आजाद, सुखदेव, शिव वर्मा, विजय कुमार सिन्हा, डॉ. गया प्रसाद, महाबीर सिंह, जय गोपाल के अलावा अन्य क्रांतिकारियों का आना-जाना भी था।
पंजाब से दिल्ली, कानपुर, लखनऊ व आगरा जैसे शहरों में जाने-आने के लिए क्रांतिकारी इसी गुप्त ठिकाने का इस्तेमाल किया करते थे। बम बनाने का सामान जुटाने का काम यहां होता था। डॉ. निगम ने यहां निगम फार्मेसी के नाम से दवा की दुकान खोली थी जिसका मकसद क्रांतिकारियों के लिए आर्थिक सहायता जुटाना था।
दस अगस्त 1928 से लेकर चार फरवरी 1929 तक इस ठिकाने को किराए पर लिया गया था। नीचे दवाखाना व ऊपर क्रांतिकारियों की रिहाइश थी।