बंगाल में तेजस्वी ने क्यों नहीं मिलाया 'हाथ', जबकि बिहार में कांग्रेस के ही साथ
पश्चिम बंगाल की 294 सीटों के लिए 27 मार्च से 29 अप्रैल के बीच आठ चरणों में मतदान होगा, जिसके नतीजे अन्य चार राज्यों के साथ 2 मई को आएंगे। राजनीतिक हिंसा के बीच सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधा मुकाबला है।
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बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और आरजेडी प्रमुख लालू यादव का करीबी रिश्ता रहा है। अब इसी राजनैतिक संबंध को लालू यादव के बेटे तेजस्वी आगे बढ़ा रहे हैं। विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने बिना शर्त तृणमूल कांग्रेस को समर्थन देने का एलान किया है। कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन की ओर से उन्हें कुछ सीटों की पेशकश भी की गई थी, बावजूद इसके तेजस्वी का अलग सियासी राह चुनना पॉलिटिकल पंडितों को सोच में डाल रहा है।
बीते साल संपन्न हुए बिहार चुनाव में तेजस्वी की अगुवाई में 'महागठबंधन' हुआ था। कांग्रेस और कम्यूनिस्ट पार्टियों के साथ मिलकर आरजेडी ने एनडीए को कांटे की टक्कर दी। बिहार विधानसभा में वह सबसे बड़ी पार्टी के नेता बनकर उभरे। ऐसे में सवाल उठता है कि बंगाल में आरजेडी ने अपने सहयोगियों को छोड़कर टीएमसी से हाथ क्यों मिलाया?
सीट देने को तैयार थी कांग्रेस
अब तेजस्वी बिहार के बाहर भी अपनी पार्टी की जमीन तलाशने में लगे हैं। संभावनाओं के विस्तार में उन्हें यह समझ आ चुका है कि बंगाल में बीजेपी और ममता बनर्जी के बीच सीधी टक्कर है। बीजेपी के खिलाफ कई मुद्दों पर दोनों पार्टी साथ भी खड़ी नजर आती हैं। ऐसे में तेजस्वी टीएमसी के साथ जाकर यह संकेत देना चाहते हैं कि वो बीजेपी के खिलाफ लड़ने वाले दलों के साथ हैं। फिलहाल सीटों के लेन-देन पर बातें सामने नहीं आई है। हालांकि, कांग्रेस-लेफ्ट तो उन्हें कुछ सीट देने को भी तैयार थे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी की माने तो उन्होंने लेफ्ट से 130 सीटों की डिमांड रखी थी, जिसमें वह आरजेडी और एनसीपी को भी सीटे देने के लिए तैयार थे, लेकिन ऐसा हो न सका। अब 92 सीटें कांग्रेस के लिए फाइनल हो गई है।
कोलकाता में डेरा डाल बैठे थे तेजस्वी
बताया जा रहा है कि तेजस्वी ने पिछले दो सप्ताह से अपने दो वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी और श्याम रजक को टीएमसी से बात करने की जिम्मेदारी सौंपी थी। दोनों ने ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी से मुलाकात भी की और बंगाल में गठबंधन की उम्मीदों को बरकरार रखा। हालांकि बाद में खुद तेजस्वी बीते दो दिन से कोलकाता में बैठकर दीदी से मुलाकात का इंतजार करते रहे। आखिरकार सोमवार को उनकी ममता बनर्जी संग बैठक हुई। ममता से मिलने के बाद तेजस्वी यादव ने स्पष्ट किया कि उनकी प्राथमिकता में सीटें नहीं हैं बल्कि मकसद तो पश्चिम बंगाल में बीजेपी के उभार को रोकना है। उन्होंने यह नहीं बताया कि उनकी पार्टी बंगाल में चुनाव लड़ेगी की नहीं।
बंगाल में भी महागठबंधन चाहते थे तेजस्वी
तेजस्वी ने कहा था कि सारे दलों को मिलकर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना चाहिए। वो चाहते थे कि कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां मिलकर ममता बनर्जी की तृणमूल के साथ गठबंधन करें, जिससे बीजेपी को रोका जा सके। आरजेडी के एक नेता ने कहा कि, 'हमारे नेता लालू प्रसाद यादव का मानना है कि मौजूदा वक्त समय देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने का है इसलिए हम टीएमसी के साथ बिना किसी शर्त और फायदे के जुड़े हैं।' बीजेपी की घेराबंदी वैसी नहीं हो पा रही जैसा तेजस्वी चाहते थे। शायद यही कारण है कि उन्होंने कांग्रेस-लेफ्ट की बजाय बीजेेेपी को रोकने में सक्षम टीएमसी के साथ खड़ा होना बेहतर समझा।