इस वजह से अक्तूबर में पूर्वी तट पर आते हैं चक्रवात, ऐसे की जाती है भविष्यवाणी
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अक्तूबर माह में ओडिशा-आंध्र के तटों पर आया तितली चक्रवात बीते पांच सालों में आया सबसे घातक चक्रवात था। इससे करीब 12 लोगों की मौत हुई और हजारों लोग प्रभावित हुए। इसके अलावा ये भी खबर आई कि चक्रवात के कारण 5 हजार पक्षियों की भी जान गई।
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अक्तूबर माह में ओडिशा-आंध्र के तटों पर आया तितली चक्रवात बीते पांच सालों में आया सबसे घातक चक्रवात था। इससे करीब 12 लोगों की मौत हुई और हजारों लोग प्रभावित हुए। इसके अलावा ये भी खबर आई कि चक्रवात के कारण 5 हजार पक्षियों की भी जान गई।
आईआईटी भुवनेश्वर के वैज्ञानिक का कहना है कि चक्रवात तो हमेशा आते हैं। लेकिन उसे बढ़ाती है उसकी आवृति। कि वह कितनी आवृति के साथ आ रहा है। यह बात उन्होंने बंगाल की खाड़ी पर किए अवोलकन के आधार पर कही।
उत्तर पश्चिमी प्रशांत से सटी हुई होने के कारण यह दुनिया में ऐसी जगह है जहां सबसे अधिक तूफान आते हैं। बंगाल की खाड़ी में आए तूफान के कारण कई जगह लैंडफॉल हुए हैं। जैसे इंडोनेशिया और चीन। हाल ही में तितली चक्रवात ओडिशा और आंध्र प्रदेश में आया। साल 2013 में फाइलिन नाम का चक्रवात आया और साल 2014 में हुदहुद चक्रवात आया। यह सभी अक्तूबर माह में आए। मानसून में चक्रवात कम ही आते हैं क्योंकि हवा का दबाव अधिक होता है।
भविष्यवाणी करना मुश्किल
अमेरिका में बादलों में विमान से ही नमी का स्तर और चक्रवात से संबंधित आंकड़े एकत्रित किए जाते हैं। भारत में समुद्रीय तटों पर आने वाले चक्रवात के बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि वह सैटेलाइट तस्वीरों पर ही काफी हद तक भरोसा करते हैं। जिससे नमी की मात्रा और तीव्रता से संबंधित काफी कम ही आंकड़े मिल पाते हैं।
वैज्ञानिकों को विस्तृत तस्वीर तभी मिल पाती है जब चक्रवात तट से 300-400 किमी की दूरी पर होता है। लेकिन जब तक इस बारे में बेहतर जानकारी मिलती है, तब तक तैयारी करने के लिए काफी कम समय बचता है। तितली चक्रवात के बारे में पता लगाना इसलिए मुश्किल था क्योंकि वह आवर्ती चक्रवात (दिशा बदल लेना) में बदल गया था। भारत ने तूफान की भविष्यवाणी करने वाले मॉडल अमेरिका और यूरोप से लिए हैं लेकिन उसे और बेहतर करने के लिए संसाधनों की कमी है।
निकासी के तरीके
शेल्टर इन प्लेस वाले तरीके में पहले से मौजूद घरों और सामुदायिक बिल्डिंगों में दुर्ग बनाए जाते हैं जिसके लिए काफी पैसे की जरूरत होती है। इसके अलावा एक और तरीका है जिसे वर्टीकल निकास कहा जाता है। इसमें लोगों को प्रभाव क्षेत्र के भीतर ही विशेष रूप से डिजाइन की गई इमारतों में भेजा जाता है। तितली चक्रवात के समय इस तरीके का सबसे अधिक प्रयोग हुआ।
सरकार ने दावा किया है कि तितली चक्रवात के समय 3 लाख लोगों की सुरक्षित तरीके से निकासी कराई गई। लेकिन एक शोधकर्ता का कहना है कि यह संख्या गलत है। उन्होंने कहा कि हुदहुद और फिलिन में लोगों की जान इसलिए बची क्योंकि यह चक्रवात साल 1999 में आए सुपरसाइक्लोन से विपरीत था। इसमें तूफान उतना भयानक नहीं था और न ही पानी का स्तर उतना बढ़ा था।