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मुंबई: काला धन सफेद करने का जरिया बनें बैंक और बीमारू कंपनी!

Mon, 05 Dec 2016 03:41 AM IST
सुरेन्द्र मिश्र/ अमर उजाला, मुंबई
सुरेन्द्र मिश्र/ अमर उजाला, मुंबई Updated Mon, 05 Dec 2016 03:41 AM IST
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Banks and Sick Company becoming instrument of money laundering!

बीते 8 नवंबर को कालेधन पर नकेल कसने के लिए 500 और 1000 रुपये के नोटबंदी की घोषणा होते ही देशभर में उथल-पुथल मच गई। तब से लेकर अब तक सरकारी खजाने में करीब 11 लाख करोड़ रूपये के पुराने नोट जमा हो चुके हैं। वहीं, ढाई लाख करोड़ रुपये के  नए नोट बैंक से निकल भी चुके हैं। करीब एक तिहाई रकम निकलने के बावजूद आम आदमी अब भी बैंक में पैसे के लिए कतार में लगा है।

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आखिरकार पैसा गया कहां। क्या यह पैसा बीमारू कंपनियों में निवेश किया जा रहा है या फिर बैंक ही कालाधन को सफेद बनाने का जरिया बन चुके हैं। जानकार कहते हैं कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में कुछ ऐसा ही हो रहा है। कालेधन के खिलाफ केंद्र सरकार के स्ट्राइक के बाद यह मामला बड़ा संवेदनशील हो चुका है। इसलिए चार्टर्ड अकाउंटेंट से लेकर व्यवसायी, बैंकर्स कोई भी कालेधन पर बात करने को राजी नहीं है। 
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आर्थिक जानकारों की मानें तो मुंबई के धनकुबेर जन धन खाते के अलावा कारखानों और कर्मचारियों पर कालाधन खर्च कर रहे हैं। कर्मचारियों को जहां एक साल से लेकर दो साल का अग्रिम वेतन भुगतान किया जा रहा हैं वहीं, बीमारू कंपनियों में निवेश कर भविष्य में उसे प्रोफिट में लाने के इंतजाम भी किए जा रहे हैं। कर्मचारियों को अग्रिम भुगतान करने से पहले सौ रुपये के स्टांप पेपर पर लिखवाया जा रहा है फिर भी यह काफी जोखिम भरा है। आयकर एक्ट की धारा के तहत कोई भी फर्म 20 हजार रुपये से ज्यादा लोन कैश में नहीं दे सकती।
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लेकिन इसकी चिंता कौन करता है। मुंबई पश्चिम उपनगर के एक उद्योग समूह (जिसके छह हजार कर्मचारी बताए जाते हैं) ने अपने कर्मचारियों को दो साल की सेलरी का अग्रिम भुगतान कर दिया है। इसमें ए ग्रेड के अधिकारी से लेकर बी,सी, और डी ग्रेड जिसमें चौकीदार भी शामिल हैं। ऐसे कर्मचारियों की तो मानो लॉटरी लग गई है।

'प्रोफिट मेकिंग कंपनी बनाने की कोशिश में अपना कालाधन खपा रहे हैं'

Banks and Sick Company becoming instrument of money laundering!

वॉचमैन की नौकरी करने वाले कई लोग कंपनी से पैसा मिलते ही गांव चले गए हैं। आज उनके घर पर ईंट आ रही हैं और वे मकान बनवा रहे हैं। दीगर है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में ईंट के भट्ठे से तभी ज्यादातर ईंटें उठती है जब उनके यहां मुंबई का पैसा आता है। ऐसे लोगों का अब दोबारा मुंबई लौटना भी मुश्किल हैं क्योंकि अगर उन्हें वॉचमैन की नौकरी करनी है तो मुंबई ही क्यों?

सूत्र बताते हैं कि मुंबई के बड़े कारोबारी बीमारू कंपनियों को खरीदकर उसे एक-दो साल बाद प्रोफिट मेकिंग कंपनी बनाने की कोशिश में अपना कालाधन खपा रहे हैं। इसके लिए बाकायदा चार्टर्ड अकाउंटेंट की सहायता ली जा रही है। एक चार्टर्ड अकाउंटेंट ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कंपनी के शेयर अपने खास लोगों रिश्तेदारों को बेचकर दो साल में अचानक हाइप दिखाकर कालेधन को सफेद करने की कोशिश शुरू है।

ऐसे में आज की तारीख में जिस कंपनी के शेयर का मूल्य 20 रुपये हैं ठीक एक साल बाद उसके शेयर 2000 रुपये हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हालांकि नोटबंदी के बाद मुंबई के धन्नासेठों ने पहले जौहरियों का रुख किया था। 500 से लेकर 1000 रुपये के नोटों से तमाम जेवर और सोने के सिक्के आदि खरीद लिए थे। दो दिन में ही जौहरी भी मालामाल हो गए। उसके बाद दुकान का शटर बंद हो गया। मुंबई और ठाणे के कई जौहरियों के पास इतना पैसा आ गया है कि वे आज भी चेक लेकर जेवर देने के लिए तैयार नहीं हैं।

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