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अयोध्या फैसला: बूटा सिंह के सुझाव पर पक्षकार बनने कोर्ट पहुंचे रामलला

Tue, 12 Nov 2019 10:18 AM IST
अनवर अंसारी अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: अनवर अंसारी Updated Tue, 12 Nov 2019 10:18 AM IST
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Ayodhya verdict Ramlala reached court to become party on suggestion of Buta Singh
बूटा सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : social media

सुप्रीम कोर्ट की सांविधानिक पीठ ने अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर बनाने के लिए जिन रामलला विराजमान के पक्ष में फैसला सुनाया, उन्हें पक्षकार बनाने का सुझाव किसी भाजपा या विश्व हिंदू परिषद के नेता का नहीं था। यह सुझाव तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह ने दिया था। 

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दरअसल 1989 से पहले बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि को लेकर तीन मामले अदालत के सामने थे। 1951 में गोपाल सिंह विशारद ने याचिका दायर कर रामलला की पूजा करने का अधिकार मांगा था। जबकि 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने मंदिर के प्रबंधन के अधिकार उन्हें दिए जाने की मांग की थी। इन दोनों में से किसी ने जन्मभूमि पर अधिकार की बात नहीं की थी। केवल 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड की याचिका में मस्जिद की भूमि के स्वामित्व की मांग की गई थी। 
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1988-89 में जब राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था, उस दौरान तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह ने विहिप नेताओं को समझाया कि आंदोलन से मंदिर नहीं बन पाएगा। वह या तो संसद द्वारा कानून बनाने से होगा या फिर अदालत से मुकदमा जीतने से। उनका कहना था चूंकि अदालत में किसी ने भी मंदिर की भूमि के स्वामित्व की मांग नहीं की है, इसलिए अदालत से जब भी फैसला होगा, वह सुन्नी वक्फ बोर्ड के हक में ही होगा। 
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सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ ने शनिवार को जन्मस्थान को तो विधिक पक्ष नहीं माना, लेकिन रामलला विराजमान को अपने जन्म स्थान का विधिक स्वामी करार दिया और उनके जन्मस्थान पर मंदिर बनाने के आदेश दिए। 

पूर्व जज अग्रवाल ने अभिभावक बनकर दायर की याचिका

विहिप के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय के मुताबिक बूटा सिंह ने ही पटना में सिविल मामलों के विशेषज्ञ पूर्व वकील जनरल लाल नारायण सिन्हा से मिलने की सलाह दी। सिन्हा ने ही उन्हें रामलला विराजमान की ओर से याचिका दायर करने की सलाह दी। जस्टिस देवकीनंदन अग्रवाल ने इसके बाद 1989 में रामलला विराजमान और जन्म स्थान के बतौर विधिक अभिभावक इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर राम जन्म भूमि पर स्वामित्व उन्हें सौंपे जाने की मांग की। 

आपराधिक मामले में भी पक्ष में फैसले का भरोसा
बाबरी मस्जिद-ध्वंस को भले ही सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी करार दिया हो लेकिन विहिप को इस मामले में भी अपने पक्ष में फैसला आने की उम्मीद है। अभी तक 1100 में से 350 गवाहों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं और मार्च तक फैसला सुनाया जाना है। चंपत राय का कहना है अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत आधे गवाह तो विहिप के सदस्य हैं। इनमें से एक त्रिलोकी पांडे तो सुप्रीम कोर्ट में खुद वादी थे। 

राव की भी कृतज्ञ विहिप 
वि्व हिंदू परिषद ने पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव को भी धन्यवाद दिया। चंपत राय का कहना था कि छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद अगले ढाई दिनों तक उन्होंने राम जन्मभूमि स्थल पर सुरक्षा बल न भेजकर अस्थायी मंदिर बनाने का अवसर दिया। जबकि कुछ समय पहले प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया जा चुका था। 

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