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...जब पूर्व पीएम अटल की इस कविता से बौखला गया था पूरा पाकिस्तान, सुनाई थी खरी-खरी

Thu, 16 Aug 2018 08:36 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 16 Aug 2018 08:36 PM IST
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Atal bihari vajpayee poem on pakistan and terrorism
सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का गुरुवार को दिल्ली के एम्स में निधन हो गया। वह काफी दिनों से बीमार थे। बीते 11 जून को अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें एम्स में भर्ती करवाया गया था।
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वह दिग्गज कवि और लोकप्रिय राजनेता थे। उनके पास एक कवि हृदय भी था। पत्रकारिता से राजनीति में आए अटल बिहारी वाजपेयी ने कई मशहूर कविताएं लिखीं। जिनमें पाकिस्तान को लेकर लिखी उनकी एक कविता लोगों को आज भी भुलाये नहीं भूलती है उसमें अटलजी ने ना सिर्फ पाकिस्तान को धोया है बल्कि सारी दुनिया के सामने पाकिस्तान के असली चेहरे को बेनकाब किया।
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इस कविता के जरिए उन्होंने पाकिस्तान की नापाक हरकतों और उसे समर्थन देने वाले देशों को जमकर कोसा। वाजपेयी की यह कविता सोशल मीडिया पर भी खूब पड़ी और शेयर की जाती है। ये है उनकी कविता जिसमें उन्होंने पाकिस्तान को जमकर कोसा है।
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एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतंत्रता भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।

अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतंत्रता, अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता। 
त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतंत्रता, दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता।

इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो, चिनगारी का खेल बुरा होता है। 
औरों के घर आग लगाने का जो सपना, वो अपने ही घर में सदा खरा होता है।

अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो, अपने पैरों आप कुल्हाड़ी नहीं चलाओ। 
ओ नादान पड़ोसी अपनी आंखे खोलो, आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ।

पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है? तुम्हे मुफ़्त में मिली न कीमत गयी चुकाई। 
अंग्रेजों के बल पर दो टुकडे पाये हैं, माँ को खंडित करते तुमको लाज ना आई ?

अमेरिकी शस्त्रों से अपनी आजादी को दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो। 
दस बीस अरब डालर लेकर आने वाली बरबादी से तुम बच लोगे यह मत समझो।

धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो।
हमलों से, अत्याचारों से, संहारों से भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो।

जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार, अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष,
स्वातंत्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे अगणित जीवन यौवन अशेष।

अमेरिका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध, काश्मीर पर भारत का सर नही झुकेगा  
एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतंत्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा।
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