कुरुक्षेत्र: हिंदुत्व को नया चेहरा मिला और भाजपा को नया प्रतिद्वंद्वी, विधानसभा चुनाव नतीजों का खास विश्लेषण
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विस्तार
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने संघ परिवार को भाजपा और हिंदुत्व का नया नेता और भाजपा विरोधी राजनीति को कांग्रेस का विकल्प दे दिया है। अब 2024 के लोकसभा चुनावों और उससे पहले होने वाले सभी चुनावों में संघ परिवार योगी आदित्यनाथ को हिंदुत्व के नए नेता के रूप में पूरे देश में पेश करेगा तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी और उसके नेता अरविंद केजरीवाल ने भाजपा के मुकाबले खुद को एक नए विकल्प के रूप में पेश कर दिया है। पंजाब की जीत के बाद अपने संबोधन में अरविंद केजरीवाल ने देश में इंकलाब लाने के लिए बिल्कुल उसी शैली में जनता से आम आदमी पार्टी से जुड़ने का आह्वान किया जैसै कि कभी गुजरात चुनावों में जीत के बाद 2012 में नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में किया था। केजरीवाल के तेवर बता रहे हैं कि अब वह दिल्ली में ही रुकने वाले नहीं है। उनकी कोशिश उत्तर भारत में आम आदमी पार्टी को भाजपा विरोधी राजनीति की धुरी बनाने की होगी।
कांग्रेस के भीतर होगी भारी उथल-पुथल
उधर, कांग्रेस में तूफान से पहले की खामोशी दिख रही है। उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी की जी तोड़ मेहनत और पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी के दलित कार्ड के बावजूद कांग्रेस की शर्मनाक हार और उत्तराखंड गोवा और मणिपुर में पिछड़ने से उसके हाशिए पर जाने की पटकथा लिख दी है। अब कांग्रेस के भीतर भारी उथल-पुथल होगी। उसके नेतृत्व को असंतुष्टों की तरफ से सीधी चुनौती मिलने के साथ-साथ राजस्थान में अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल जैसे छत्रपों पर गांधी परिवार की निर्भरता बढ़ जाएगी। चुनाव नतीजों पर टिप्पणी करते हुए जी-23 के नेता मनीष तिवारी ने अमर उजाला से बातचीत में यह कहकर कि राहुल गांधी से ही पूछा जाना चाहिए कि कांग्रेस की यह दुर्दशा क्यों हुई, आने वाले दिनों में असंतुष्ट नेता क्या करेंगे इसका संकेत दे दिया है। जबकि भाजपा में अब योगी आदित्यनाथ को पार्टी के भीतर से मिलने वाली चुनौतियां भी इस रिकॉर्ड जीत के बाद कुंद पड़ जाएंगी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने हिंदू राष्ट्र के परम वैभव को पाने के लिए 49 वर्षीय योगी आदित्यनाथ पर भविष्य का सियासी दांव खेलेगा।
योगी आदित्यनाथ ने 37 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ा
सात चरणों की लंबी चुनावी प्रक्रिया पूरी करते हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों से योगी आदित्यनाथ ने किसी मुख्यमंत्री और सरकार की वापसी का 37 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़कर बता दिया कि वह न सिर्फ उत्तर प्रदेश के लिए बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के लिए बहुत उपयोगी हो गए हैं। हालांकि अखिलेश यादव एक बार फिर देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री बनने से चूक गए, लेकिन चुनावी मुकाबले में मोदी योगी की भाजपा से सीधी टक्कर लेकर और सपा की सीटों व वोट प्रतिशत में पिछले चुनाव के मुकाबले खासी बढ़ोतरी करके वह गैर भाजपा राजनीति का उत्तर भारत में बड़ा चेहरा बन गए हैं। जबकि प्रियंका गांधी का महिला कार्ड धर्म और जाति के राजनीतिक ध्रुवीकरण को काट नहीं पाया और तमाम जी तोड़ मेहनत व भारी तादाद में भीड़ जुटाने के बावजूद आए खराब नतीजों ने कांग्रेस की इस संभावित नेता की चमक को फीका कर दिया है। वहीं पंजाब में प्रचंड बहुमत की सुनामी लाकर आम आदमी पार्टी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भविष्य की गैर भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में अपने लिए अहम जगह बना ली है।
पीएम मोदी और शाह की लोकप्रियता पर मुहर
बात उत्तर प्रदेश की जहां काफी कांटे की लड़ाई दिख रही थी और लग रहा था कि इसे वही जीतेगा जिसके मुद्दों और नारों ने जनता के दिल को छुआ हो। भाजपा ने न सिर्फ उत्तर प्रदेश की यह लड़ाई जीती बल्कि उत्तराखंड में अपनी सरकार भी बचाई और गोवा व मणिपुर में भी विरोधियों को पीछे छोड़ दिया। भाजपा की इस कामयाबी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गृह मंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के नेतृत्व पर जनता की लोकप्रियता की मुहर लगा दी और योगी आदित्यनाथ को पार्टी में लगातार चुनाव जीतने वाले मुख्यमंत्रियों नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह की कतार में लाकर खड़ा कर दिया। पांच साल पहले जब प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और चुनाव हुए थे तो भाजपा के पक्ष में अनेक कारण मौजूद थे जिन्होंने 2017 में भाजपा को पहली बार ऐतिहासिक जीत दिलाकर सहयोगियों समेत 325 सीटों का तूफानी बहुमत दिलाया था।
2002 के बाद 14 साल सत्ता से बाहर रही थी भाजपा
2002 की हार के बाद भाजपा 14 साल से सत्ता से बाहर रही और सपा-बसपा ने बारी बारी से प्रदेश में सरकार बनाई। इसलिए लोगों की नाराजगी भी उनके ही खिलाफ थी और भाजपा को लेकर एक अदृश्य सहानुभूति भी पनप रही थी। सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी और उसके प्रथम परिवार यानी मुलायम सिंह यादव के कुनबे में ऊपर से नीचे तक जबर्दस्त घमासान था जिसकी वजह से सपा के जनाधार, संगठन और कार्यकर्ताओं में बंटवारा था, भ्रम था, असंतोष और निराशा थी। अखिलेश, रामगोपाल यादव बनाम शिवपाल सिंह यादव और अमर सिंह के खेमों में खींचतान ने अखिलेश सरकार की उपलब्धियों को तार-तार कर दिया था। वैसे भी अखिलेश यादव भले ही पांच साल मुख्यमंत्री रहे थे, लेकिन करीब तीन साल तक उनकी सरकार की डोर पिता मुलायम सिंह यादव, चाचा शिवपाल यादव, रामगोपाल यादव और मोहम्मद आजम खां के अलावा मुलायम सिंह यादव की वफादार एक ताकतवर नौकरशाह के बीच ही झूलती रहती थी, इसलिए उत्तर प्रदेश में कहावत चल पड़ी थी कि सपा सरकार में साढ़े तीन मुख्यमंत्री हैं। इन सबके बीच सपा के पतन में आखिरी कील कांग्रेस के साथ गठबंधन ने ठोक दी थी। सौ से ज्यादा सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ने वाले अखिलेश यादव को कांग्रेस के सवर्ण जनाधार का कोई फायदा तो नहीं मिला बल्कि जहां सपा उम्मीदवार थे, वहां गैर मुस्लिम कांग्रेसी जनाधार ने भाजपा को वोट करके उसकी ताकत बढ़ा दी और यही सपा के यादव जनाधार ने कांग्रेस की सीटों पर किया और राज्य की सभी सीटों पर भाजपा को कहीं कम कहीं ज्यादा यह अतिरिक्त बोनस वोट मिला।
2014 के बाद मोदी की लोकप्रियता चरम पर
उधर, भाजपा का मनोबल 2014 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों (बिहार और दिल्ली के अपवादों के सिवा) में मिली जीत से आसमान छू रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता चरम पर थी। उनकी हर बात पर लोग आंख मूंद कर भरोसा कर रहे थे। पार्टी अध्यक्ष बन चुके अमित शाह ने राज्य में गैर यादव पिछड़ों और गैर जाटव दलितों की एक छतरी बनाकर उन्हें भाजपा के साथ जोड़ने में कामयाबी हासिल की थी। एक नए चेहरे केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश भाजपा की कमान देकर गैर यादव पिछड़ी जातियों में यह अघोषित संदेश दे दिया गया कि अगर भाजपा की सरकार बनी तो मौर्य मुख्यमंत्री बन सकते हैं। कल्याण सिंह के बाद उत्तर प्रदेश में कोई गैर यादव पिछड़ा चेहरा मुख्यमंत्री नहीं बना था, इसलिए पिछड़ी जातियों की इस राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पर लगाकर भाजपा ने 2017 में उन्हें अपने साथ पूरी तरह गोलबंद कर लिया और सवर्ण तो भाजपा के साथ गोलबंद थे ही। फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो 2014 में वाराणसी से लोकसभा में चुनकर गए थे, उन्होंने उत्तर प्रदेश में सुशासन और विकास के लिए अपने नाम पर वोट मांगा और लोगों ने आंख मूंदकर उन पर भरोसा किया और वोट दिया। इसके साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ने चुनाव प्रचार में श्मशान बनाम कब्रिस्तान और दीवाली बनाम रमजान में बिजली का मुद्दा उठाकर हिंदुत्व के ध्रुवीकरण का भी तड़का लगा दिया था। इससे 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों की आंच फिर गरम हो गई थी और भाजपा के पक्ष में हिंदुओं का जबर्दस्त ध्रुवीकरण हो गया।
योगी सरकार का पूरा बहीखाता था जनता के सामने
इस बार पांच साल तक उत्तर प्रदेश में शासन करने वाली भाजपा और योगी आदित्यनाथ की सरकार का पूरा बहीखाता लोगों के सामने था कि 2017 में भाजपा ने जो सपने दिखाए थे और वादे किए थे, वो कहां तक पूरे हुए। अपने बेहद खर्चीले प्रचार अभियान से भाजपा ने अपनी उपलब्धियों को लोगों की जुबान पर रटा दिया। साथ ही अपने पक्ष में सपा सरकार से बेहतर कानून व्यवस्था देने का दावा करते हुए राज्य में घटित हाथरस और उन्नाव जैसे कई शर्मनाक कांडों के बावजूद यह अवधारणा बनाने में कामयाब रही कि योगीराज में प्रदेश में महिलाओं के सम्मान की सुरक्षा बेहतर तरीके से हुई। भाजपा के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और करिश्मे के साथ-साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रखर हिंदुत्ववादी चेहरा हैं जिसमें बुलडोजर मुख्यमंत्री की छवि भी जुड़ गई और मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे बाहुबलियों और मोहम्मद आजम खां जैसे आक्रामक मुस्लिम नेता को सबक सिखाने की बार-बार घोषणाओं के जरिए कानून-व्यवस्था के नाम पर मुस्लिम विरोध के हिंदू ध्रुवीकरण साधने की कोशिश भी कामयाब रही। इसमें जिन्ना और कैराना के पलायन के तड़के भी लगे। इसके साथ भाजपा जिसे अपना ब्रह्मास्त्र बता रही है, वह है कोरोना काल से शुरू हुई गरीबों को मुफ्त राशन देने की योजना। इसे दिसंबर 2021 तक चलना था लेकिन चुनावों के मद्देनजर मार्च 2022 तक बढ़ा दिया गया। भाजपा नेताओं का दावा है कि मुफ्त राशन वितरण की यह योजना उसके लिए गेमचेंजर साबित हुई है।
भाजपा को इन मुद्दों ने दिलाया फायदा
भाजपा ने इन दोनों मुद्दों महिला सुरक्षा और कानून व्यवस्था के साथ पांच करोड़ लोगों को मुफ्त राशन को हर जनसभा में जमकर उठाया और प्रचार भी किया। भाजपा के पास साधन संसाधन, संगठन और कार्यकर्ता बल की कमी नहीं थी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी उसे जबर्दस्त समर्थन व सहयोग मिला जिसका उसने पूरा उपयोग किया। हालांकि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस बार वो गलतियां नहीं दोहराईं जो उन्होंने 2017 में की थीं। सबसे पहले उन्होंने चुनावों से कई महीने पहले ही यह घोषणा कर दी थी कि सपा इस बार किसी राष्ट्रीय और बड़े दल से गठबंधन नहीं करेगी बल्कि स्थानीय और छोटी पार्टियों से चुनावी समझौते करेगी। इसके साथ ही सपा ने कांग्रेस और बसपा के साथ किसी भी चुनावी दोस्ती की संभावना को खत्म कर दिया।
अखिलेश ने इस बार बदली रणनीति
दरअसल, 2017 में कांग्रेस और 2019 में बसपा के गठबंधन का हश्र देख चुके अखिलेश ने इस बार रणनीति बदली और उन छोटी और इलाकाई दलों को साथ लिया जिनका अपने अपने इलाकों में अपनी जातियों के बीच इतना आधार था कि वह किसी के हक में वोटों का संतुलन बना और बिगाड़कर किसी की जीत और किसी की हार तय कर सकते हैं। इसके बाद अखिलेश यादव ने सुभासपा के ओमप्रकाश राजभर, जनवादी क्रांति पार्टी के संजय चौहान, महान दल के केशव देव मौर्य, अपना दल (कमेरावादी) की कृष्णा पटेल और रालोद के जयंत चौधरी के साथ चुनावी गठबंधन किया। साथ ही गैर यादव अन्य पिछड़े वर्गों जाटों मुस्लिमों के दूसरे मजबूत नेताओं स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान, धर्मवीर सैनी को भाजपा से राजाराम पाल, हरेंद्र मलिक, पंकज मलिक, इमरान मसूद को कांग्रेस और रामअचल राजभर, लालजी वर्मा आदि को बसपा से अपने साथ जोड़ा। अखिलेश यादव ने बेहद सावधानी से मजबूत ब्राह्मण नेताओं हरिशंकर तिवारी, विनय तिवारी, विजय मिश्र, विनोद चतुर्वेदी आदि को भी सपा में शामिल कराया।
भाजपा के पक्ष में हिंदु ध्रुवीकरण की खामोश लहर चली
करीब साढ़े चार साल तक निष्क्रियता का आरोप झेलने वाले अखिलेश यादव ने बहुत सधे तरीके से सितंबर से खुद को सरकार के विरोध में मैदान में उतारा और अपने प्रचार अभियान को इस कदर आगे बढ़ाया कि समाजवादी पार्टी गठबंधन भाजपा से सीधे मुकाबले में आ गया। सपा का भाजपा से सीधे मुकाबले ने अगर मुस्लिम वोटों को उसके पक्ष में एकमुश्त ध्रुवीकृत किया तो इसके प्रचार ने भाजपा के पक्ष में हिंदु ध्रुवीकरण की खामोश लहर भी चली जिसने सपा के पिछड़े वर्गों को उसके साथ वैसे एकजुट नहीं होने दिया जो भाजपा को हराने के लिए जरूरी था। सपा को उम्मीद थी कि प्रियंका गांधी का नारा, लड़की हूं लड़ सकती हूं और उनकी जीतोड़ मेहनत भाजपा के सवर्ण जनाधार में सेंध लगाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जबकि बसपा का गैर मुस्लिम वोट का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ चला गया। इन तमाम समीकरणों ने भाजपा की जीत और सपा के पिछड़ने की गाथा लिखी है। वहीं पंजाब, उत्तराखंड गोवा और मणिपुर में पार्टी के संगठन में मचे घमासान और नेतृत्व के संकट ने कांग्रेस के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर किया और लोगों ने अन्य विकल्प तलाश लिए। पंजाब में इसका फायदा आम आदमी पार्टी को मिला तो उत्तराखंड गोवा और मणिपुर में भाजपा ने दोबारा जीत दर्ज की।
अब कांग्रेस में घमासान के आसार
इन चुनाव नतीजों का सबसे पहला असर कांग्रेस के भीतर नए घमासान के रूप में सामने आएगा। प्रशांत किशोर एक बार फिर दुगने जोश से भाजपा विरोधी गैर कांग्रेसी मोर्चे की दिशा में काम शुरू करेंगे। इन पराजयों ने एनसीपी, शिवसेना, डीएमके और राजद जैसे सहयोगी दलों के ऊपर भी कांग्रेस के प्रभाव को क्षीण कर दिया है। जबकि टीआरएस, कांग्रेस वाईएसआर, बीजद जैसे दलों की कांग्रेस से पहले ही दूरी बन चुकी है। अब आम आदमी पार्टी दिल्ली और पंजाब में सत्ता पाने के बाद गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, उत्तराखंड आदि राज्यों में कांग्रेस की सियासी जमीन छीनने की पूरी कोशिश करेगी। अरविंद केजरीवाल अब एक नए प्रभावशाली छत्रप के रूप में सामने आएंगे जो मोदी और भाजपा को उनकी ही शैली में टक्कर दे सकते हैं। पंजाब की जीत के बाद अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए अरविंद केजरीवाल ने इसका संकेत दे दिया है।
केजरीवाल अब कांग्रेस का विकल्प बनेंगे
जहां ममता बनर्जी एमके स्टालिन के चंद्रशेखर राव नवीन पटनायक नीतीश कुमार जैसे छत्रपों और उनके दलों का राजनीतिक चरित्र और अपील क्षेत्रीय है, वहीं अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी का गठन ही भले दिल्ली की पार्टी के रूप में हुआ लेकिन उनका राजनीतिक चरित्र राष्ट्रीय है और पंजाब की तूफानी जीत ने इसे और विस्तार दे दिया है। अब आम आदमी पार्टी यहीं नहीं रुकेगी। इस साल के आखिर में होने वाले गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव, 2023 में कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनावों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करके कांग्रेस की जमीन और वोट छीनेगी। खुद को कांग्रेस के विकल्प के रूप में पेश करेगी और 2024 में लोकसभा चुनावों अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर अपनी प्रभावशाली भूमिका बनाएगी। आप की कोशिश कांग्रेस से ज्यादा या बराबर सांसद लाकर भाजपा विरोधी मोर्चे की धुरी बनना है।