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विधानसभा चुनाव: पांचों राज्यों में निर्णायक रहेगी पुरानी पेंशन, किसके हिस्से सरकारी कर्मियों का नफा-नुकसान

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Mon, 09 Oct 2023 02:26 PM IST
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सार
राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने पुरानी पेंशन बहाल की है। ओपीएस बहाली वाला राजस्थान, देश में पहला राज्य बना है। 2023-24 का बजट पेश करने के दौरान सीएम गहलोत ने कहा, सभी सेवारत और रिटायर कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) का लाभ मिलेगा...
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Assembly elections: Old pension will be decisive in five states
Old Pension Scheme - फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar

विस्तार

भारतीय निर्वाचन आयोग ने पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का शेड्यूल जारी कर दिया है। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में 'पुरानी पेंशन' का मुद्दा अपनी निर्णायक क्षमता दिखा चुका है। अब पांच राज्यों में भी 'ओपीएस' के मुद्दे पर सरकारी कर्मचारी अपनी ताकत दिखाएंगे। यह तय है कि सरकारी कर्मियों का नफा-नुकसान किसी न किसी पार्टी के हिस्से में तो जरूर आएगा। भाजपा का स्टैंड क्लीयर है कि पुरानी पेंशन पर कोई बात नहीं होगी। एनपीएस में सुधार किया जा सकता है, लेकिन ओपीएस की गुंजाइश नहीं है। खुद प्रधानमंत्री मोदी, इस बारे में अपना मत स्पष्ट कर चुके हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी है, जो अपनी चुनावी वादों में पुरानी पेंशन को प्रमुखता से शामिल कर रही है। पहले हिमाचल प्रदेश में और उसके बाद कर्नाटक में कांग्रेस ने ओपीएस की गारंटी देकर भाजपा के हाथ से सत्ता छीन ली। राजस्थान और छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकारों ने 'ओपीएस' लागू कर दिया है, जबकि मध्यप्रदेश और तेलंगाना में पार्टी ने पुरानी पेंशन बहाली का वादा किया है।



इन राज्यों में लागू हो चुकी है पुरानी पेंशन

देश में पुरानी पेंशन का मुद्दा लगातार गर्माता जा रहा है। गैर भाजपा शासित राज्य, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में पुरानी पेंशन लागू हो चुकी है। कर्नाटक में भी ओपीएस लागू करने के लिए गुणा-भाग किया जा रहा है। राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने पुरानी पेंशन बहाल की है। ओपीएस बहाली वाला राजस्थान, देश में पहला राज्य बना है। 2023-24 का बजट पेश करने के दौरान सीएम गहलोत ने कहा, सभी सेवारत और रिटायर कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) का लाभ मिलेगा। इसके बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी सरकारी कर्मचारियों को एनपीएस/ओपीएस का विकल्प दे दिया। झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार ने 1 सितंबर 2022 को पुरानी पेंशन योजना बहाल करने की मंजूरी दी। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार ने पुरानी पेंशन योजना को मंजूरी दे दी है। लगभग 1.75 लाख कर्मचारियों को इसका फायदा हुआ है।

मत पत्र सबसे शक्तिशाली हथियार है

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार ने भी अपने चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादे के मुताबिक, ओपीएस को लागू कर दिया है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने ओपीएस बहाली की बात कही थी। कर्नाटक स्टेट गवर्नमेंट एंप्लॉई एसोसिएशन के अध्यक्ष सीएस शादाक्षरी ने चुनाव से पहले कहा था, भाजपा ने सरकारी कर्मियों को निराश किया है। लगभग पांच लाख कर्मियों, पेंशनरों और उनके परिजनों को मिलाकर यह संख्या 40 लाख से ज्यादा पहुंच गई थी। नतीजा, विधानसभा में भाजपा सरकार को सरकारी कर्मियों की नाराजगी झेलनी पड़ी। एनपीएस के खिलाफ गठित नेशनल ज्वाइंट काउंसिल ऑफ एक्सन (एनजेसीए) के वरिष्ठ सदस्य और एआईडीईएफ के महासचिव सी. श्रीकुमार का कहना है, भाजपा को विधानसभा चुनाव में सरकारी कर्मियों की नाराजगी का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। वित्त मंत्रालय द्वारा गठित कमेटी का क्या फायदा होगा। सरकारी कर्मचारी जानते हैं कि जब प्रधानमंत्री मोदी, पुरानी पेंशन के खिलाफ सार्वजनिक बयान दे रहे हैं, तो इन कमेटियों का कोई लाभ नहीं है। लोकतंत्र में मत पत्र सबसे शक्तिशाली हथियार है। हर राजनीतिक दल, जनमत का सम्मान करता है। पुरानी पेंशन के लिए कर्मचारी संगठन, राष्ट्रव्यापी अनिश्चितकालीन हड़ताल कर सकते हैं। इसके लिए 20 और 21 नवंबर को देशभर में स्ट्राइक बैलेट होगा।  

10 करोड़ लोगों की उपेक्षा नहीं कर सकते

बतौर श्रीकुमार, देश में अगर केंद्र एवं राज्यों के सभी सरकारी कर्मचारियों, पेंशनरों, उनके परिवार और रिश्तेदारों को मिलाकर वह संख्या लगभग 10 करोड़ तक पहुंच जाती है। यह यह एक छोटी संख्या नहीं है। क्या कोई राजनीतिक दल 10 करोड़ की संख्या वाले लोगों के समूह की उपेक्षा करने का साहस कर सकता है। भाजपा सहित दूसरी राजनीतिक पार्टियों को एनपीएस पर अपना मन बनाना होगा। उन्हें खुले तौर पर सामने आना पड़ेगा। एनपीएस को खत्म करने की घोषणा करनी होगी। पंजाब, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और राजस्थान सरकार ने पुरानी पेंशन योजना बहाल की है। कर्नाटक सरकार भी इस बाबत काम कर रही है। केवल पांच राज्यों के विधानसभा में ही नहीं, बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भी पुरानी पेंशन का मुद्दा, अहम रहेगा। मध्यप्रदेश कर्मचारी महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष संतोष सिंह दीक्षित ने अपने बयान में कहा था, कर्नाटक चुनाव का परिणाम सबके सामने है। यहां पर कांग्रेस ने पुरानी पेंशन का मुद्दा घोषणा पत्र में शामिल किया। इससे पहले हिमाचल प्रदेश में पुरानी पेंशन का मुद्दा अपना असर दिखा चुका है। कर्मचारियों का एकतरफा वोट कांग्रेस के पक्ष में गया है।

नुकसान भी उठाना पड़ सकता है

दीक्षित ने कहा-मध्यप्रदेश के अलावा अन्य प्रदेशों में भी कर्मचारी रहते हैं। अगर मध्यप्रदेश सरकार, ओपीएस लागू नहीं करती है तो भाजपा को इसका नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। तेलंगाना राज्य सीपीएस कर्मचारी संघ (टीएससीपीएसईयू) के अध्यक्ष जी. स्थितप्रज्ञ ने अगस्त में की एक रैली में कहा था, अंशदायी पेंशन योजना को खत्म किया जाए। अगर मुख्यमंत्री केसीआर, चुनाव से पहले ओपीएस लागू करते हैं तो सरकारी कर्मचारी, बीआरएस का समर्थन करेंगे। नेशनल मूवमेंट फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम के बैनर तले रामलीला मैदान में हुई 'पेंशन शंखनाद महारैली' में एनएमओपीएस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय कुमार बंधु ने कहा, पुरानी पेंशन, कर्मियों का अधिकार है। वे इसे लेकर ही रहेंगे। अगर सरकार अपनी जिद नहीं छोड़ती है तो 'वोट की चोट' के आधार पर 'पुरानी पेंशन' बहाल कराएंगे।

एनपीएस में रिटायर्ड कर्मियों को मिली इतनी पेंशन

एनपीएस में कर्मियों जो पेंशन मिल रही है, उतनी तो बुढ़ावा पेंशन ही है। एनपीएस स्कीम में शामिल कर्मी, 18 साल बाद रिटायर हो रहे हैं, उन्हें क्या मिला है। एक कर्मी को एनपीएस में 2417 रुपये मासिक पेंशन मिली है, दूसरे को 2506 रुपये और तीसरे कर्मी को 4900 रुपये प्रतिमाह की पेंशन मिली है। अगर यही कर्मचारी पुरानी पेंशन व्यवस्था के दायरे में होते, तो उन्हें प्रतिमाह क्रमश: 15250 रुपये, 17150 रुपये और 28450 रुपये मिलते। एनपीएस में कर्मियों द्वारा हर माह अपने वेतन का दस फीसदी शेयर डालने के बाद भी उन्हें रिटायरमेंट पर मामूली सी पेंशन मिलती है। इस शेयर को 14 या 24 फीसदी तक बढ़ाने का कोई फायदा नहीं होगा। एआईडीईएफ के महासचिव सी.श्रीकुमार के मुताबिक, एनपीएस में पुरानी पेंशन व्यवस्था की तरह महंगाई राहत का भी कोई प्रावधान नहीं है। जो कर्मचारी पुरानी पेंशन व्यवस्था के दायरे में आते हैं, उन्हें महंगाई राहत के तौर पर आर्थिक फायदा मिलता है। एनपीएस में सामाजिक सुरक्षा की गारंटी भी नहीं रही। रिटायरमेंट के बाद सरकारी कर्मियों को जानबूझकर कष्टों में धकेला जा रहा है।

रामलीला मैदान में कर्मियों की दो बड़ी रैलियां

केंद्र एवं राज्य सरकारों के कर्मचारी संगठन, 'पुरानी पेंशन' पर अब निर्णायक लड़ाई की ओर बढ़ रहे हैं। कर्मचारी संगठनों ने सरकार को स्पष्ट तौर से बता दिया है कि उन्हें बिना गारंटी वाली 'एनपीएस' योजना को खत्म करने और परिभाषित एवं गारंटी वाली 'पुरानी पेंशन योजना' की बहाली से कम कुछ भी मंजूर नहीं है। नई दिल्ली के रामलीला मैदान में दस अगस्त को कर्मियों की रैली हुई थी। उसके बाद एक अक्तूबर की रैली में सरकारी कर्मियों ने भारी संख्या में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इसके बाद नई दिल्ली में 20 सितंबर को हुई राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) स्टाफ साइड की बैठक के एजेंडे में 'ओपीएस' का मुद्दा टॉप पर रहा था। कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करते हुए अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ (एआईडीईएफ) के महासचिव सी. श्रीकुमार ने कहा था, हमने सरकार के समक्ष एक बार फिर अपनी मांग दोहराई है। एनपीएस को खत्म किया जाए और पुरानी पेंशन योजना' को जल्द से जल्द बहाल करें। अगर सरकार नहीं मानती है तो देश में कलम छोड़ हड़ताल होगी, रेल के पहिये रोक दिए जाएंगे। दूसरे चरण में सरकार को सियासत के मोर्चे पर चोट की जाएगी। केंद्र एवं राज्यों के सरकारी कर्मियों और उनके परिजनों व रिश्तेदारों को मिलाकर वह संख्या दस करोड़ के पार चली जाती है। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है। इसके अलावा 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान जब कर्मियों व उनके परिजनों की संख्या वोट में बदलेगी तो केंद्र सरकार को कर्मियों की ताकत का अहसास होगा।

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