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Election Analysis: भाजपा ने उन सभी क्षत्रपों को खत्म कर दिया, जो चुनौती बन सकते थे, अब राज्यसभा की राह आसान
Tue, 05 May 2026 04:13 AM IST
Devesh Tripathi
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Tue, 05 May 2026 04:13 AM IST
सार
इन नतीजों से पहले शरद पवार व अरविंद केजरीवाल के कमजोर पड़ने तथा नीतीश कुमार व नवीन पटनायक के प्रभाव के फीका पड़ने के बाद अब ममता, स्टालिन व विजयन भी सत्ता से बाहर हो गए...
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पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम 2026
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरलम और पुदुचेरी के चुनावी नतीजे भाजपा के लिए बेहद अहम हैं। बंगाल में पहली जीत और असम व पुदुचेरी में वापसी ने उसे अब सही मायने में अखिल भारतीय पार्टी बना दिया है। वहीं, ममता बनर्जी और एमके स्टालिन जैसे नेताओं की हार ने क्षेत्रीय क्षत्रपों की मुखर आवाज को कुंद कर दिया है। तमिलनाडु में टीवीके की जीत भाजपा के लिए राज्य में सत्ता में वापसी का अवसर भी मुहैया करा सकती है।
राज्यसभा में आसान होगी राह, 2029 में भी असर
द्रमुक व तृणमूल की हार से विपक्ष और कमजोर पड़ा। बंगाल की जीत राज्यसभा में भाजपा को अपने दम पर बहुमत में मददगार साबित होगी। बंगाल में सत्ताधारी दल को लोकसभा में ऐतिहासिक रूप से बढ़त मिलती रही है। 2029 के आम चुनाव के लिए भी राह आसान होगी। भाजपा दावा कर सकती है कि वह ऐसी पार्टी है, जिसकी अपील विभिन्न क्षेत्रों और संस्कृतियों तक फैली हुई है।
खत्म हुआ हिंदी बेल्ट का ठप्पा
बंगाल में जीत और असम में तीसरी बार सत्ता बरकरार रखना, पार्टी के लिए नई ऊंचाई है। कभी सिर्फ हिंदी बेल्ट तक सीमित मानी जाने वाली भाजपा ने पश्चिम भारत को जीतने के बाद अब बंगाल के गढ़ पर भी कब्जा कर पूर्वी भारत तक अपनी पहुंच बना ली। यह इस वैचारिक दावे को भी मजबूती देता है कि भारतीय सभ्यता एक ही इकाई है। बंगाल में जीत के साथ, खुद को सिर्फ हिंदू, हिंदी, हिंदुस्तान व आक्रामक राजनीति से जोड़कर देखने वाली सोच को भी खत्म कर दिया।
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क्षेत्रीय क्षत्रपों का खात्मा
भाजपा ने तकरीबन उन सभी क्षेत्रीय क्षत्रपों को खत्म कर दिया, जो उसके लिए चुनौती बन सकते थे। शरद पवार व अरविंद केजरीवाल के कमजोर पड़ने तथा नीतीश कुमार व नवीन पटनायक के प्रभाव के फीका पड़ने के बाद अब ममता, स्टालिन व विजयन भी हार गए।
तमिलनाडु में चौंका सकती है पार्टी
तमिलनाडु में भाजपा विजय की टीवीके की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा सकती है। सूत्राें का कहना है, भाजपा ने आखिरी मिनट तक बातचीत का रास्ता खुला रखा था और चूंकि विजय अकेले दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हैं, इसलिए हम विकल्प खुले रखेंगे।
दक्षिण दूर पर 80% आबादी पर राज
दक्षिण के दो राज्य केरल व तमिलनाडु अब भी भाजपा की पहुंच से बाहर हैं, पर भाजपाशासित राज्यों में 78% आबादी रहती है। हालांकि, दक्षिण में भाजपा के प्रदर्शन को झटका कहना जल्दबाजी होगी। पार्टी ने केरल में तीन सीटें जीत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। तमिलनाडु में एक सीट पर जीत निराशाजनक है, जो हिंदुत्व संदेश की सीमाएं उजागर करता है।
पुदुचेरी ने दिया एनडीए को सहारा
दक्षिण भारत में यूं तो आंध्र प्रदेश में एनडीए सरकार है, पर इस बार सिर्फ पुदुचेरी ने ही सहारा दिया। वहां का राजनीतिक इतिहास अस्थिर रहा है। सरकारें बीच में ही गिर जाती हैं, गठबंधन टूट जाते हैं। एआईएनआर कांग्रेस के एनडीए में आने के बाद वहां स्थिरता आई है। भाजपा की दो सीटें कम होने का सरकार पर असर नहीं पड़ेगा।
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राज्यसभा में आसान होगी राह, 2029 में भी असर
द्रमुक व तृणमूल की हार से विपक्ष और कमजोर पड़ा। बंगाल की जीत राज्यसभा में भाजपा को अपने दम पर बहुमत में मददगार साबित होगी। बंगाल में सत्ताधारी दल को लोकसभा में ऐतिहासिक रूप से बढ़त मिलती रही है। 2029 के आम चुनाव के लिए भी राह आसान होगी। भाजपा दावा कर सकती है कि वह ऐसी पार्टी है, जिसकी अपील विभिन्न क्षेत्रों और संस्कृतियों तक फैली हुई है।
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खत्म हुआ हिंदी बेल्ट का ठप्पा
बंगाल में जीत और असम में तीसरी बार सत्ता बरकरार रखना, पार्टी के लिए नई ऊंचाई है। कभी सिर्फ हिंदी बेल्ट तक सीमित मानी जाने वाली भाजपा ने पश्चिम भारत को जीतने के बाद अब बंगाल के गढ़ पर भी कब्जा कर पूर्वी भारत तक अपनी पहुंच बना ली। यह इस वैचारिक दावे को भी मजबूती देता है कि भारतीय सभ्यता एक ही इकाई है। बंगाल में जीत के साथ, खुद को सिर्फ हिंदू, हिंदी, हिंदुस्तान व आक्रामक राजनीति से जोड़कर देखने वाली सोच को भी खत्म कर दिया।
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क्षेत्रीय क्षत्रपों का खात्मा
भाजपा ने तकरीबन उन सभी क्षेत्रीय क्षत्रपों को खत्म कर दिया, जो उसके लिए चुनौती बन सकते थे। शरद पवार व अरविंद केजरीवाल के कमजोर पड़ने तथा नीतीश कुमार व नवीन पटनायक के प्रभाव के फीका पड़ने के बाद अब ममता, स्टालिन व विजयन भी हार गए।
तमिलनाडु में चौंका सकती है पार्टी
तमिलनाडु में भाजपा विजय की टीवीके की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा सकती है। सूत्राें का कहना है, भाजपा ने आखिरी मिनट तक बातचीत का रास्ता खुला रखा था और चूंकि विजय अकेले दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हैं, इसलिए हम विकल्प खुले रखेंगे।
दक्षिण दूर पर 80% आबादी पर राज
दक्षिण के दो राज्य केरल व तमिलनाडु अब भी भाजपा की पहुंच से बाहर हैं, पर भाजपाशासित राज्यों में 78% आबादी रहती है। हालांकि, दक्षिण में भाजपा के प्रदर्शन को झटका कहना जल्दबाजी होगी। पार्टी ने केरल में तीन सीटें जीत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। तमिलनाडु में एक सीट पर जीत निराशाजनक है, जो हिंदुत्व संदेश की सीमाएं उजागर करता है।
पुदुचेरी ने दिया एनडीए को सहारा
दक्षिण भारत में यूं तो आंध्र प्रदेश में एनडीए सरकार है, पर इस बार सिर्फ पुदुचेरी ने ही सहारा दिया। वहां का राजनीतिक इतिहास अस्थिर रहा है। सरकारें बीच में ही गिर जाती हैं, गठबंधन टूट जाते हैं। एआईएनआर कांग्रेस के एनडीए में आने के बाद वहां स्थिरता आई है। भाजपा की दो सीटें कम होने का सरकार पर असर नहीं पड़ेगा।
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