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कुरुक्षेत्र: पांच राज्यों के नतीजे तय करेंगे लोकसभा चुनाव की भूमिका, दलों से ज्यादा जनता की अग्निपरीक्षा

विनोद अग्निहोत्री विनोद अग्निहोत्री
Updated Mon, 10 Jan 2022 09:10 AM IST
सार

इन विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा की तरह फिर भाजपा के सेनापति होंगे जिनकी लोकप्रिय छवि को पार्टी हर चुनावी राज्य में भुनाने की कोशिश करेगी।

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चुनावी रैली(प्रतीकात्मक फोटो) - फोटो : Twitter :@priyankagandhi

विस्तार

पांच राज्यों के चुनाव घोषित होते ही मीडिया महोत्सव शुरु हो गया है। कहा जा रहा है कि ये चुनाव 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल हैं और भाजपा कांग्रेस समेत उन सभी राजनीतिक दलों जो मैदान में हैं, की अग्निपरीक्षा इन चुनावों में होगी। लेकिन वास्तविकता है कि ये चुनाव राजनीतिक दलों के लिए नहीं बल्कि आम जनता या मतदाताओं की अग्निपरीक्षा साबित होने जा रहे हैं। क्योंकि इन चुनावों के नतीजे ही मतदाताओं के मानस का पैमाना होंगे और उनके अनुसार ही देश की भावी राजनीतिक दिशा, दशा और उसके मुद्दे तय होंगे जो अगले लोकसभा चुनावों की भूमिका तैयार करेंगे।

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हर पार्टी के सामने अपनी-अपनी चुनौती
जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं उनमें चार राज्य उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भाजपा की सरकारें हैं जबकि पंजाब में कांग्रेस सत्ता में है। यानी भाजपा को अपने चार राज्य बचाने और साथ ही पंजाब में जहां वह पहली बार बिना अकाली दल की बैसाखी के उतर रही है, में अपने बलबूते कमल खिलाने की चुनौती है। वहीं कांग्रेस के सामने पंजाब में अपनी सरकार बचाने और उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा में सरकार बनाने और उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी के नेतृत्व में चमत्कारिक प्रदर्शन करने का लक्ष्य है। वहीं उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी अपने सहयोगी दलों के साथ भाजपा गठबंधन को रोकने और अपनी सरकार बनाने के मंसूबे के साथ मैदान में है तो बसपा की कोशिश कम से कम इतने विधायक जिताकर लाने की है कि बिना उसके कोई सरकार न बन सके। आम आदमी पार्टी पंजाब में इस बार सरकार बनाने से न चूकने के लिए पूरी ताकत लगा रही है और उत्तराखंड, गोवा व उत्तर प्रदेश में भी चुनाव मैदान में है।
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हमेशा की तरह पीएम मोदी ही होंगे सेनापति
इन विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा की तरह फिर भाजपा के सेनापति होंगे जिनकी लोकप्रिय छवि को पार्टी हर चुनावी राज्य में भुनाने की कोशिश करेगी। मोदी के साथ उनके सिपहसालार के रूप में उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी समेत भाजपा के तमाम बड़े नेता चुनाव प्रचार में जुट गए हैं। उधर कांग्रेस में पंजाब में जहां जीत का दारोमदार मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ आदि नेताओं पर है तो उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत पार्टी के तारणहार हैं। आम आदमी पार्टी को पंजाब, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और गोवा में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के चेहरे पर सबसे ज्यादा भरोसा है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अकेले ही मोदी योगी की सेना को मजबूत टक्कर दे रहे हैं। जबकि बसपा प्रमुख मायावती को प्रचार से ज्यादा अपने जनाधार की निष्ठा पर भरोसा है। हालांकि पार्टी महासचिव सतीश मिश्रा 2007 की तरह ब्राह्मण को जोड़ने के लिए लगभग पूरे प्रदेश में घूम-घूम कर सभाएं कर चुके हैं।
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कोरोना के संक्रमण के बीच राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी
बिहार और प.बंगाल की तरह ये विधानसभा चुनाव भी कोरोना महामारी के संक्रमण की छाया में हो रहे हैं। बिहार के चुनाव कोरोना की पहली लहर के उतार के दौर में हुए थे, जबकि प.बंगाल, असम और तमिलनाडु के चुनाव कोरोना की दूसरी लहर के चरम दौर में हुए जब पूरे देश में कोरोना संक्रमण से होने वाली मौतों और इलाज की अफरातफरी से लोग जूझ रहे थे। अब पांच राज्यों के चुनाव कोरोना की तीसरी लहर के उस शुरुआती दौर में शुरु हुए हैं जब आशंका है कि अगर जरूरी कदम न उठाए गए तो तीसरी लहर भी भयावह हो सकती है। इसीलिए इस बार पहले से सबक लेकर चुनाव आयोग ने कोरोना प्रतिबंधों के सख्ती से पालन करने का संदेश और निर्देश राजनीतिक दलों और लोगों को दिया है। अपनी तरफ से चुनाव आयोग ने कोरोना संक्रमण से बचते हुए चुनाव कराने के सारे इंतजाम कर दिए हैं और ज्यादा से ज्यादा चुनाव प्रचार डिजिटल और मीडिया के जरिए करने को कहा है। 15 जनवरी तक सभी तरह की रैलियों, जलसे, जुलूसों और भीड़ जमा करने वाले किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई है।आगे का फैसला 15 जनवरी के बाद हालात की समीक्षा करके किया जाएगा। आयोग ने जीत के बाद निकलने वाले विजय जुलूसों को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है और नामांकन बिना भीड़ के कराने या ऑनलाइन करने की सुविधा भी दे दी है। मतदान बूथों की संख्या में बढ़ोत्तरी समेत कोरोना निरोधक सारे उपाय भी किए गए हैं। अब यह जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की है कि वह चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों, प्रतिबंधों का न सिर्फ खुद सख्ती से पालन करें बल्कि अपने समर्थक वर्गों से भी करवाएं। इससे भी ज्यादा यह आम जनता की बड़ी जिम्मेदारी है कि वह स्वंय कोरोना प्रतिबंधों का पालन करे और राजनीतिक दलों पर भी इनके पालन का दबाव बनाए और चुनाव प्रचार के दौरान भीड़ भाड़ न होने दे।

विपक्ष के मुद्दों पर भाजपा की काट
अब अगर इन चुनावों में मुद्दों की बात करें तो विपक्ष के लिए सबसे अहम मुद्दे महंगाई, बेरोजगारी, डीजल पेट्रोल की कीमतों, खाद की कीमत और किल्लत, गैस सिलेंडरों की बढी कीमत, बिजली की बढ़ी दरें, खस्ताहाल अर्थव्यवस्था, छोटे दूकानदारों, व्यापारियों और उद्यमियों के कारोबार में सुस्ती,आवारा और छुट्टा पशुओं की समस्या, महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध, दलितों और वंचित वर्गों के उत्पीड़न हैं। इसके साथ ही कोरोना की पहली लहर के दौरान हजारों मील पैदल चलकर अपने गांव पहुंचने वाले प्रवासी मजदूरों की तकलीफें और दूसरी लहर में बीमारी और इलाज के अभाव में हुई बड़ी संख्या में मौतें,गंगा और अन्य नदियों में बहती और किनारों पर दफन होने वाली लाशों, श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों में लगने वाली लंबी लाईनों की भयावय यादें भी चुनाव प्रचार में विपक्ष की तरफ से उठाई जाएंगी।

इनकी काट के लिए चार राज्यों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित की गईं हजारों करोड़ की परियोजनाओं, शिलान्यास किए गए विकास कार्यों जिनमें जेवर हवाई अड्डा, गंगा एक्सप्रेस वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे डिफेंस कोरीडोर, सरयू नहर परियोजना और उद्घाटन किए जाने वाले पूर्वांचल एक्सप्रेस वे को मुद्दा बनाकर अपनी विकासवादी घोषणाओं से विपक्ष के आरोपों से पैदा होने वाली नकारात्मकता और सत्ताविरोधी रुझानों की धार को कुंद करने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही भाजपा उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के राज को अपराधियों का राज घोषित करते हुए जनता को आगाह करने में जुटी है कि अगर सपा जीती तो फिर उन माफियाओं का राज लौट आएगा जिन्हें योगी सरकार ने या तो जेल में भेज दिया है या फिर पुलिस मुठभेड़ों में मार गिराया गया है। प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री आदित्यनाथ, पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत सभी भाजपा नेता इस मुद्दे को जोरशोर से अपनी सभाओं में उठा रहे हैं। जब वो माफिया कहते हैं तो उनका इशारा आम तौर पर अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसों की तरफ होता है जिससे दो निशाने सधते है एक तो अपराधीकरण के खिलाफ भाजपा का नारा बुलंद होता है तो साथ ही मुस्लिम विरोधी ध्रुवीकरण में मदद मिलती है। जबकि कई अपराधी और माफिया चरित्र वाले लोग सत्ता के गलियारों और भाजपा नेताओं के मंच पर भी देखे जाते हैं।विपक्ष भी इसे अपने तरीके से मुद्दा बना रहा है, जिसमें सबसे ज्यादा नाम लखीमपुर खीरी कांड के अभियुक्त आशीष मिश्रा के पिता और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी का लिया जा रहा है, जिनके इस्तीफे की मांग लगातार किसान संगठन और विपक्षी दल करते रहे हैं।

भाजपा के सामने सामाजिक समीकरण साधने की चुनौती
इन चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने उस सामाजिक समीकरण को साधे रखने की है जिसकी वजह से उसे उत्तर प्रदेश में 2014, 2017 और 2019 के चुनावों में लगातार भारी जीत मिली है। इन चुनावों में जहां सवर्ण हिंदू पूरी तरह एक मुश्त उसके साथ रहे वहीं गैर यादव पिछड़े और गैर जाटव दलितों का बड़ा समर्थन भाजपा को मिला और एक तरह से आरएसएस की हिंदुत्व की अवधारणा जातीय गोलबंदी पर भारी पड़ी। लेकिन इस बार हालात बदले हुए हैं। केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर चुनाव लड़ने के बावजूद उनकी जगह एकाएक योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने, जातीय जनगणना के मुद्दे पर भाजपा की हीला हवाली, और शासन प्रशासन में सवर्णों के वर्चस्व ने पिछड़ों को नाराज किया है। जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पिछले तीन चुनावों में भाजपा के लिए मजबूती से डटे रहने वाले जाट और अन्य किसान जातियों को किसान आंदोलन ने नाराज कर दिया और तीनों कृषि कानून वापस लेने के बावजूद अभी उनकी नाराजगी कितनी दूर हुई यह कहना मुश्किल है। वहीं सोनभद्र, हाथरस जैसे कांडों, आगरा बलिया प्रयागराज में दलितों की हत्याओं और मुठभेड़ के नाम पर पुलिस की मनमानी, गोरखपुर मे युवा व्यापारी की हत्या जैसी घटनाओं ने सरकार की छवि पर असर डाला  है। जहां कांग्रेस की तरफ से प्रियंका गांधी ने हर ऐसी  घटना पर खुद मौके पर जाकर सरकार के लिए मुसीबत ख़ड़ी की तो सपा के अखिलेश यादव अब अपनी हर सभा में इनको उठा रहे हैं।

भाजपा के हिंदुत्व के सामने अखिलेश का पिछड़ों का इंकलाब 
अखिलेश यादव ने इस सामाजिक असंतोष को भांप कर अपने चुनाव अभियान को पिछड़ों के इंकलाब का नाम दिया है और उन्होंने गैर यादव पिछड़ों के सपा के साथ पहले की तरह गोलबंद करने के लिए ओम प्रकाश राजभर की सभासपा, संजय चौहान की पार्टी, केशवदेव मौर्य के महान दल, जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोकदल, अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की पत्नी कृष्णा पटेल, कांग्रेस से सपा में शामिल हुए पाल समाज के नेता राजाराम पाल, जाटों के नेता हरेंद्र मलिक और पंकज मलिक, सुखदेव राजभर के बेटे रामअचल राजभर, लालजी वर्मा समेत कई पिछड़े और किसान जातियों के नेताओं को साथ लेकर सपा के जनाधार का विस्तार करने की कोशिश की है। आम आदमी पार्टी के भी सपा के साथ गठबंधन की चर्चा है। अखिलेश यादव की नजर भाजपा के साथ गए निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद और योगी सरकार के कुछ मंत्रियों पर भी है। अखिलेश की कोशिश भाजपा के हिंदुत्व की काट में मंडल के जमाने का पिछड़ा गठबंधन करके चुनाव की बाजी पलटने की है। इसके अलावा इस चुनाव में ब्राह्मण समुदाय जिसकी तादाद राज्य में करीब 12 फीसदी है जो सर्वाधिक मुखर मतदाता समूह है, उसे अपने साथ लेने की होड़ सभी दलों में हैं। भाजपा उसे अपना परंपरागत जनाधार मानती है और कांग्रेस के कमजोर होने के बाद भाजपा ही ब्राह्मणों की स्वाभाविक पसंद और अपनी पार्टी रही है। लेकिन 2007 में बसपा के नारों 'पंडित शंख बजाएगा हाथी बढ़ता जाएगा' और 'हाथी नहीं गणेश है ब्रह्मा विष्णु महेश है' ने बड़ी तादाद में ब्राह्रणों को बसपा के साथ जोड़ा और उसकी पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। बाद में ब्राह्मण 2012 में सपा और फिर भाजपा के साथ हो गए। इस बार अनेक कारणों से राज्य में यह धारणा बन गई है कि ब्राह्मण उपेक्षित हैं और इसीलिए समाजवादी पार्टी जहां परशुराम मंदिर का उद्घाटन करके ब्राह्मणों को जोडने की कोशिश में है तो बसपा ने सतीश मिश्र को आगे करके प्रबुद्ध सम्मेलनों के जरिए ये कोशिश की है। साथ ही बसपा विकास दूबे कांड में जेल में बंद खुशी दूबे का मुद्दा भी उठा रही है और सतीश मिश्र खुद इसकी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। 

भाजपा इसे भांप चुकी है। इसलिए भाजपा ने एक बार फिर हिंदू ध्रुवीकरण के दांव को तेज किया है। एक तरफ उसने अपने ब्राह्मण नेताओं के जरिए इस वर्ग को साधने की कोशिश की है। सबसे ज्यादा ब्राह्मणउत्पीड़न का मुद्दा उठाने वाले कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद को भाजपा ने अपने साथ लेकर उन्हें राज्य में मंत्री बना दिया। तमाम विरोध के बावजूद खीरी कांड में विवादित गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी को नहीं हटाया गया है। साथ ही अपने विकास कार्यों से ज्यादा भाजपा नेता अखिलेश और समाजवादी पार्टी को यादव मुसलमानों की पार्टी साबित करने में जुटे हैं ताकि मुसलमानों का डर दिखाकर हिंदुओं का ध्रुवीकरण किया जा सके। इसके लिए एक तरफ काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, अयोध्या में राम मंदिर और मथुरा के श्रीकृष्ण मंदिर के विकास का नारा दिया जा रहा है तो दूसरी तरफ जिन्ना से लेकर गाय तक को प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के भाषणों में जगह मिल रही है।

प्रियंका गांधी ने खेला लैंगिक न्याय का दांव
भाजपा के हिंदू ध्रुवीकरण और सपा के जातीय गोलबंदी के दांव की काट के लिए कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को आगे करके लैंगिक न्याय का दांव खेला है। प्रियंका गांधी ने महिलाओं को चालीस फीसदी टिकट देने से लेकर छात्राओं को स्मार्ट फोन और स्कूटी तक देने, महिलाओं को विशेष अवसर देने के वादे करते हुए उनके लिए अलग से पार्टी का घोषणापत्र जारी किया है। लड़की हूं लड़ सकती हूं के नारे के साथ प्रियंका ने गोरखपुर वाराणसी से लेकर महोबा और चित्रकूट तक में महिलाओं की प्रतिज्ञा रैलियां की हैं और कई शहरों में लड़कियों की मैराथन दौड़ आयोजित की जा रही है। महिला सुरक्षा और सशक्तीकरण को प्रियंका ने इतना बड़ा मुद्दा बना दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी प्रयागराज में महिलाओं के सम्मेलन को संबोधित करना पड़ा। इसके अलावा कांग्रेस किसानों को गेहूं, धान का उचित मूल्य दिलाने, बिजली के बिल आधे करने जैसे वादे भी कर रही है। इससे आगे बढ़कर अखिलेश यादव ने बिजली मुफ्त देने का वादा कर दिया है तो चुनाव घोषणा होने से पहले योगी सरकार ने बिजली के बिल आधे कर दिए। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश के चुनावों में विकास के तड़के से लेकर धार्मिक, जातीय और लैंगिक ध्रुवीकरण के दांव भी हैं।

उत्तराखंड और पंजाब में कांग्रेस की परीक्षा
उत्तराखंड में कांग्रेस ने भाजपा द्वारा पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बदलने के मुद्दे को जनादेश का अपमान और सरकार की अक्षमता के रूप में पेश करना शुरु कर दिया है। हालांकि तीसरे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खासी मेहनत कर रहे हैं लेकिन उन्हें अपनी पार्टी के भीतर से लेकर बाहर तक विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है। वहीं हरीश रावत को भी कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी झेलनी पड़ी और उन्होंने जब तीखे तेवर दिखाए तो हाईकमान ने उन्हें पूरे अधिकार दे दिए।रावत ने अपने चुनाव अभियान को उत्तराखंडियत के मुद्दे पर केंद्रित कर दिया है।

वहीं पंजाब में इस बार चुनाव दो ध्रुवीय न होकर बहु ध्रुवीय हो गया है। कांग्रेस और अकाली बसपा गठबंधन के अलावा आम आदमी पार्टी, भाजपा और कैप्टन अमरिदंर सिंह की पंजाब लोक कांग्रेस गठबंधन, किसान आंदोलन के बाद किसान नेता बलबीर सिंह राजोवाल की पार्टी और गुरुनाम सिंह चढूनी की पार्टी भी मैदान में उतर रही हैं। एक समय लगता था कि पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस फिर बाजी मारेगी। लेकिन जब कैप्टन सिद्धू झगड़े के बाद कैप्टन को मुख्यमंत्री पद से हटाया गया तो लगा कि कांग्रेस ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है।भाजपा ने इसमें अपने लिए अवसर देखा क्योंकि अकाली दल पहले ही उससे अलग हो चुका था।भाजपा ने फौरन अमरिंदर से दोस्ती की और चुनावी तालमेल कर लिया। लेकिन जिस तरह पंजाब के मुख्यमंत्री बने चरणजीत सिंह चन्नी ने पिछले कुछ महीनों में न सिर्फ पार्टी के भीतर अपने विरोधियों को शांत किया और प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के विरोध को भी कमजोर किया, वहीं दूसरी तरफ आम जनता से सीधा संवाद करने के उनके अंदाज ने जल्दी ही उन्हें लोकप्रिय बना दिया। पांच जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फिरोजपुर यात्रा के दौरान उनकी सुरक्षा में लगी सेंध के मुद्दे का चन्नी ने जिस तरह राजनीतिक जवाब दिया है उससे उनका कद और बढ़ गया। साथ ही राज्य के पहले दलित मुख्यमंत्री होने की वजह से सूबे के 33 फीसदी दलितों के समर्थन को कांग्रेस को पूरा भरोसा है।उधर प्रकाश सिंह बादल की जगह अकाली दल की पूरी कमान अब उनके बेटे सुखबीर बादल के हाथों में आ गई है और अकाली दल में सुखदेव सिंह ढींढसा जैसे नेता अलग हो चुके हैं,इससे भी अकाली दल की पकड़ कमजोर हुई है।भाजपा से गठबंधन टूटने के कारण शहरी और खासकर हिंदू मतदाताओं का समर्थन भी अकाली दल को मिलना मुश्किल है।जबकि भाजपा के सामने पंजाब के ग्रामीण इलाकों में अकेले चुनाव लड़ने की कठिन चुनौती है जो उसने कैप्टन अमरिंदर सिंह के जरिए पूरा करने की रणनीति बनाई है, लेकिन जिस तरह अमरिंदर सिंह की सभाओं में लोग नहीं आ रहे हैं,उससे भी भाजपा चिंतित है।वहीं आम आदमी पार्टी जिसने पिछले चुनावों में तमाम कोशिशों के बावजदू भले ही सरकार न बना पाई हो लेकिन उसने अकाली दल को जरूर पीछे छोड़ दिया था। इस बार आम आदमी पार्टी फिर पूरी ताकत से मैदान में हैं और उसने एक नया विकल्प देने का नारा भी दिया है।लेकिन उसकी समस्या है कि उसके पास पंजाब का कोई स्थानीय चेहरा नहीं है।इसलिए मुख्यमंत्री चन्नी ने भी पंजाब और पंजाबियत को एक मुद्दा बनाना शुरु कर दिया है।क्योंकि भाजपा सीमावर्ती पंजाब में राष्ट्रवाद को एक मुद्दा बनाना चाहती है और प्रधानमंत्री के काफिले में सुरक्षा सेंध को एक बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है,चन्नी इसकी काट पंजाबियत से करना चाहते हैं।अब देखना है कि दलित अस्मिता और पंजाबियत के मुद्दे से चन्नी के नेतृत्व में कांग्रेस भाजपा के राष्ट्रवाद और आप की चुनौती का मुकाबला कैसे और किस हद तक कर पाती है।जबकि अकाली दल की हालत पंजाब में वैसी ही दिखाई दे रही है जैसी उसकी सहयोगी बसपा की उत्तर प्रदेश में दिख रही है।

गोवा और मणिपुर में भाजपा को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की चुनौती
गोवा और मणिपुर में पिछले चुनावों में भी कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी लेकिन भाजपा ने जोड़ तोड़ करके अपनी सरकार दोनों राज्यों में बनाई। गोवा में इस बार भाजपा बिना अपने कद्दावर नेता मनोहर परिकर के चुनाव मैदान में है और मौजूदा मुख्यमंत्री को लेकर भाजपा का ही एक खेमा खासा असहज है। उधर कांग्रेस की संभावनाओं पर ग्रहण लगाने के लिए आम आदमी पार्टी के साथ साथ इस बार तृणमूल कांग्रेस ने भी गोवा में खम ठोंका है।लेकिन मुख्य मुकाबला सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के ही बीच है।यही स्थिति मणिपुर की भी है। यहां भाजपा में ज्यादातर नेता वही हैं जो पहले कांग्रेस में थे, जबकि कांग्रेस अपने नए नेताओं के साथ मैदान में है। असम के मुख्यमंत्री हिमंतो विश्वसर्मा भाजपा की पूर्वोत्तर राजनीति के प्रमुख रणनीतिकार हैं। अगर गोवा और मणिपुर में कांग्रेस फिर बहुमत से चूक गई तो भाजपा पिछला इतिहास दोहरा सकती है।


इसीलिए ये चुनाव राजनीतिक दलों से ज्यादा आम जनता और मतदाताओं की अग्निपरीक्षा हैं कि उन्हें कौन से मुद्दे पसंद हैं और वह कैसा जनादेश देते हैं। क्या उत्तर प्रदेश में मंहगाई, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, महिला सशक्तीकरण ,कोरोना कुप्रबंधन, पुलिस ज्यादती, दलित उत्पीड़न, व्यापार उद्योग के पटरी से उतरने, खाद संकट, किसानों की घटती आमदनी,आवारा और छुट्टा पशुओं की समस्या, महंगे पेट्रोल डीजल, रसोई गैस को ध्यान में रखकर लोग वोट देंगे या विकास परियोजनाओं की घोषणओं,शिलान्यासों और उद्घाटनों, मुफ्त राशन, मुस्लिम माफियों से कानून व्यवस्था बिगड़ने के डर, काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या में राम मंदिर, मथुरा में श्री कृष्ण मंदिर के विकास, जिन्ना और गाय के नारों को तरजीह देकर मतदान करेंगे। क्या अगले  पांच साल के लिए फिर मोदी योगी की डबल इंजन की सरकार लोग बनाएंगे या लखनऊ आगरा एक्सप्रेस वे और मेट्रो रेल परियोजनाओं से प्रदेश में विकास की यात्रा शुरू करने वाले युवा अखिलेश पर फिर भरोसा करेंगे। क्या भाजपा के हिंदू ध्रुवीकरण में लोग बहेंगे या सपा की जातीय गोलबंदी और पिछडों के इंकलाब का नारा अपना रंग दिखाएगा। क्या प्रियंका गांधी के महिला सशक्तीकरण, चालीस फीसदी महिलाओं को टिकट और उनकी  भागीदारी के साथ लडकी हूं लड़ सकती हूं का नारा धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण पर भारी पड़ेगा और सूबे की आधी आबादी को कांग्रेस की तरफ ले आएगा या फिर महिलाएं अपने परिवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि और पतियों की राजनीतिक पंसद के मुताबिक मतदान करेंगी। क्या कानून व्यवस्था में अव्वल मानी जाने वाली मायावती अपने दलित जनाधार के दम पर कुछ करिश्मा कर पाएंगी और क्या 2007 की तरह सतीश मिश्रा उनके साथ ब्राह्णणों को जोड पाएंगे या अपना वोट बैंक सहेजे रखते हुए भी बसपा की सीटें पिछली बार के ही आस पास रह जाएंगी। कमोबेश ऐसे ही सवाल पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर के मतदाताओं के सामने भी होंगे और उनके निर्णय से ही देश और प्रदेशों की भावी राजनीतिक दिशा तय होगी। इसलिए ये दलों से ज्यादा मतदाताओं की अग्निपरीक्षा है।

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