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विधानसभा चुनाव 2018: अगर आपका वोट चोरी हो जाए तो ऐसे करें हासिल
बीबीसी हिंदी
Updated Fri, 07 Dec 2018 04:23 PM IST
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मतदान
- फोटो : amar ujala
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पिछले कुछ दिनों से आम जनता के बीच धारा 49 (पी) की काफी चर्चा है। कई लोग गूगल के जरिए इसके बारे में जानकारी जुटा रहे हैं। मुरुगदास की बनाई फिल्म 'सरकार' की कहानी भी इसी के इर्द-गिर्द गढ़ी गई थी। इस फिल्म में हीरो विजय अपने चोरी हुए वोट को वापस पाने की जद्दोजहद करता है।
जब से यह फिल्म रिलीज हुई है तभी से लोगों के मन में धारा 49 (पी) को समझने की बेताबी बढ़ गई है। सवाल उठता है कि क्या फिल्म की कहानी की तरह हकीकत में भी चोरी हुआ वोट वापस हासिल किया जा सकता है? धारा 49 (पी) क्या है?
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धारा 49 (पी) का इस्तेमाल कैसे किए जा सकता है। इस बारे में डॉ। वेंकटेश्वरलू समझाते हैं कि जो भी व्यक्ति इस धारा का इस्तेमाल करना चाहता है, सबसे पहले वो अपनी वोटर आईडी पीठासीन अधिकारी को दिखाए। इसके साथ ही फॉर्म 17 (बी) पर भी हस्ताक्षर कर जमा करना होता है। बैलेट पेपर को मतगणना केंद्र में भेजा जाता है। धारा 49 (पी) का इस्तेमाल करते हुए कोई व्यक्ति ईवीएम के जरिए वोट नहीं डाल पाता।
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जब से यह फिल्म रिलीज हुई है तभी से लोगों के मन में धारा 49 (पी) को समझने की बेताबी बढ़ गई है। सवाल उठता है कि क्या फिल्म की कहानी की तरह हकीकत में भी चोरी हुआ वोट वापस हासिल किया जा सकता है? धारा 49 (पी) क्या है?
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टेंडर वोट क्या है?
अगर हमारा वोट कोई और डाल दे, तो इसे धारा 49 (पी) के तहत वोट का चोरी होना कहा जाता है। चुनाव आयोग ने साल 1961 में इस धारा को संशोधित कर शामिल किया था। इसके तहत वोट करने के असल हकदार को दोबारा वोट करने का अधिकार दिया जा सकता है। यही वोट टेंडर वोट कहलाता है।
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यह धारा काम कैसे करती है
ओसमानिया यूनिवर्सिटी के लीगल सेल के निदेशक डॉ। वेंकटेश्वरलू ने बीबीसी को इस बारे में बताया हैं कि अगर कोई दूसरा व्यक्ति फर्जी तरीके से आपका वोट डाल दे तब धारा 49 (पी) के जरिए इस वोट को निरस्त किया जा सकता है। इसके बाद असल मतदाता को दोबारा वोट करने का मौका दिया जाता है।धारा 49 (पी) का इस्तेमाल कैसे किए जा सकता है। इस बारे में डॉ। वेंकटेश्वरलू समझाते हैं कि जो भी व्यक्ति इस धारा का इस्तेमाल करना चाहता है, सबसे पहले वो अपनी वोटर आईडी पीठासीन अधिकारी को दिखाए। इसके साथ ही फॉर्म 17 (बी) पर भी हस्ताक्षर कर जमा करना होता है। बैलेट पेपर को मतगणना केंद्र में भेजा जाता है। धारा 49 (पी) का इस्तेमाल करते हुए कोई व्यक्ति ईवीएम के जरिए वोट नहीं डाल पाता।
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- फोटो : amar ujala
वोट को चुनौती देना जरूरी
वेंकटेश्वरलू बताते हैं कि बहुत से लोगों को वोट को चुनौती देने के बारे में पता ही नहीं होता। इस बारे में अधिक से अधिक जागरूकता फैलाने की जरूरत है।वेंकटेश्वरलू समझाते हैं कि 'कई बार लोग फर्जी वोटिंग की शिकायत वोटिंग एजेंट के पास भी कर देते हैं। इसके लिए पोलिंग एजेंट को फॉर्म 14 और महज दो रुपए अदा कर पीठासीन अधिकारी के पास शिकायत करनी होगी। इसके बाद पीठासीन अधिकारी या तो गांववालों की मौजूदगी में या फिर इलाके के राजस्व अधिकारी की मौजूदगी में जांच करेगा।
अगर फर्जी वोट की पहचान हो जाती है तो जिसके नाम से वोट गया है, पीठासीन अधिकारी उसे अपना मत देने का अधिकार देगा। लेकिन अगर फर्जी मत की पहचान नहीं होती है तो पीठासीन अधिकारी या तो शिकायतकर्ता के ख़िलाफ मामला दर्ज कर सकता है या फिर पोलिंग एजेंट को दो रुपए वापस कर मामला ख़त्म कर सकता है।
टेंडर वोट के साथ बड़ा पेंच
वैसे टेंडर वोट के साथ एक बड़ा पेंच भी है। कोई व्यक्ति भले ही अपना वोट दोबारा डाल दे लेकिन चुनाव आयोग इसकी गिनती नहीं करता, और बहुत ही विषम परिस्थितियों में इसे गिना जाता है।लेकिन फिर भी टेंडर वोट का महत्व कम नहीं हो जाता। दरअसल, मतगणना के समय सबसे पहले ईवीएम में डाले गए वोटों की गिनती होती है। अगर पहले दो प्रतिभागियों के बीच वोटों का अंतर बहुत कम होता है तो उसके बाद बैलेट वोट गिने जाते हैं। उसके बाद भी अंतर कम ही रहता है तब टेंडर वोट को गिनती में शामिल करने का फैसला लिया जाता है।
साल 2008 में राजस्थान में हुए विधानसभा चुनावों में राजस्थान हाईकोर्ट ने टेंडर वोट को गिनती में शामिल करने का फैसला दिया था।
एक वोट की कीमत
चुनाव में हमेशा कहा जाता है कि एक-एक वोट की अपनी कीमत होती है। भारत के इतिहास में सिर्फ दो ही लोग एक वोट के अंतर से हारे हैं। साल 2008 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नेता सीपी जोशी चुनावी मैदान में थे। उन्हें 62,215 वोट मिले जबकि उनके विरोधी बीजेपी के कल्याण सिंह चौहान को 62,216 मत मिले।इतने करीबी नतीजे आने के बाद वोटों की दोबारा गिनती कराई गई, लेकिन नतीजे पहले जैसे ही रहे। वहीं साल 2004 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जेडी(एस) के टिकट पर खड़े एआर कृष्णमूर्ति का मुकाबला कांग्रेस के आर ध्रुवनारायण से था। कृष्णमूर्ति को इस चुनाव में 40,751 मत मिले जबकि ध्रुवनारायण को 40,752। इस तरह एक वोट के आधार पर कांग्रेस को जीत मिली।