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चुनाव नतीजों से बदली राज्यों की सियासत: कहीं पार्टी टूटने की आशंका, कहीं गठबंधनों में पड़ी कड़वाहट की गांठ

Mon, 11 May 2026 08:17 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 11 May 2026 08:17 PM IST
सार

चुनाव नतीजों के बाद जहां विपक्ष में जाने वाले दलों में अक्सर अपने प्रदर्शन को लेकर आंतरिक मंत्रणा होती है, वहीं पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक अभी चुनाव के नतीजों पर बवाल हो रहा है। दूसरी तरफ केरल में हारने वाले गठबंधन के साथ-साथ जीतने वाले गठबंधन में बड़ी दरार है। 

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Assembly Election Results 2026 How Politics of West Bengal Tamil Nadu Assam and Kerala has changed in one Week
चुनाव नतीजों के बाद चार राज्यों में सियासी हलचल तेज। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

4 मई को पांच राज्यों के चुनावी नतीजे आए। तीन राज्यों में सत्ता परिवर्तन हो गया। इन नतीजों के एक हफ्ते बाद जहां पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में नई सरकार का गठन हो चुका है, असम और पुदुचेरी में शपथ ग्रहण होने वाला है। वहीं, केरल मं अभी भी मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर रार छिड़ी है। 
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पश्चिम बंगाल से तमिलनाडु तक चुनाव के नतीजों पर बवाल हो रहा है। नौबत तो यहां तक आ गई है कि किसी राज्य में पुराने गठबंधन टूट कर नए गठजोड़ बन चुके हैं। वहीं, किसी पार्टी में पूरी तरह टूट की आशंका गहरा गई है। इतना ही नहीं कुछ राज्यों में तो चुनावी नतीजों के सामने आने के बाद से ही पार्टी या गठबंधन के नेताओं ने शीर्ष नेतृत्व को हार का जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया है। आइये जानते हैं चुनाव के बाद किस राज्य में सियासी तौर पर कैसी हलचल मची है...
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1. पश्चिम बंगाल में चुनाव नतीजों के बाद टीएमसी शीर्ष नेतृत्व क्यों-कैसे घिरा

पश्चिम बंगाल के 2026 विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की करारी हार मिली। इसमें भाजपा ने 294 में से 208 सीटें जीतीं। इसके बाद से ही टीएमसी के साथ-साथ पूरे विपक्ष में सियासी उथल-पुथल और बगावत देखने को मिली है। 

टीएमसी में अंदरूनी कलह

नेतृत्व पर सीधे सवाल: चुनाव हारते ही कई वरिष्ठ नेताओं ने ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व पर खुलकर सवाल उठाए हैं। मालदा के वरिष्ठ नेता कृष्णेंदु नारायण चौधरी ने पार्टी की हार के लिए सीधे तौर पर एक व्यक्ति (अभिषेक बनर्जी) और पार्टी के कॉरपोरेट-शैली प्रबंधन को जिम्मेदार ठहराया।

आईपैक का विरोध: कई नेताओं ने राजनीतिक सलाहकार कंपनी आईपैक पर अत्यधिक निर्भरता को हार का कारण बताया। सिलीगुड़ी की पूर्व जिला अध्यक्ष पपिया घोष ने कहा कि 2021 के बाद से कार्यकर्ता खुद को एक कंपनी के कर्मचारी जैसा महसूस करने लगे थे और पार्टी में सिंडिकेट राज चल रहा था।

दो गुटों में बंटी पार्टी: पूर्व मंत्री रबींद्रनाथ घोष ने दावा किया कि राज्य स्तर पर पार्टी दो गुटों- ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के बीच बंट गई है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अभिषेक अपनी मनमर्जी के फैसले ममता पर थोपते थे। 

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इस्तीफों की झड़ी: इस हार के बाद कई बड़े नेताओं और करीबियों ने पार्टी छोड़ दी है। पूर्व विधायक और फिल्म निर्माता राज चक्रवर्ती ने राजनीति से ही संन्यास ले लिया। सिलीगुड़ी के मेयर गौतम देब ने भी इस्तीफे की पेशकश की है। इसके अलावा अर्थशास्त्री अभिरूप सरकार सहित ममता बनर्जी के कई सलाहकारों ने इस्तीफा दे दिया है।

पैसों की मांग के गंभीर आरोप: इससे पहले पूर्व क्रिकेटर और मंत्री मनोज तिवारी ने आरोप लगाया कि उन्हें टिकट देने के बदले पांच करोड़ रुपये की मांग की गई थी। इसके अलावा हावड़ा नगर निगम के पूर्व चेयरमैन डॉ. सुजॉय चक्रवर्ती ने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि अभिषेक बनर्जी उन पर ठेकेदारों से पार्टी फंड के लिए पैसा वसूलने का दबाव डाल रहे थे।

प्रवक्ता भी रूठे, निलंबित हुए: पार्टी के खिलाफ बयानबाजी करने पर टीएमसी ने अपने तीन प्रवक्ताओं- रिजु दत्ता, कोहिनूर मजूमदार और कार्तिक घोष को 6-6 साल के लिए निलंबित कर दिया है। निलंबित प्रवक्ता रिजु दत्ता ने भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी से माफी मांगी और उनकी तारीफ करते हुए कहा कि शुभेंदु अधिकारी ने चुनाव के बाद टीएमसी के लगभग 5,000 कार्यकर्ताओं की जान बचाई है।

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विपक्षी गठबंधन में भी टूट के संकेत

बंगाल के इस झटके ने विपक्षी दलों के गठबंधन- इंडिया के अंदर विपक्षी एकता और चुनाव रणनीति की पोल खोल दी है। दरअसल, चुनाव से पहले जहां ममता बनर्जी ने कांग्रेस या वाम मोर्चा का साथ लेने से सीधा इनकार कर दिया था, तो वहीं चुनाव नतीजों के बाद ममता ने विपक्षी दलों से एकजुट होकर भाजपा का विरोध करने का आह्वान किया। हालांकि, उनकी इस अपील पर बाकी विपक्षी दलों ने कोई ठोस कदम या बयान तक जारी नहीं किया। 

2. तमिलनाडु में कैसे टूटे गठबंधन, कैसे अब एक पूरी पार्टी के ही टूटने के आसार?

तमिलनाडु के 2026 विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य के सियासी समीकरणों को पूरी तरह से पलट दिया है, जिससे न केवल प्रमुख गठबंधन बिखरे हैं, बल्कि प्रमुख द्रविड़ियन पार्टी एआईएडीएमके के भीतर भारी बगावत और विभाजन के हालात पैदा हो गए हैं। दरअसल, राज्य में अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) अपने चुनावी डेब्यू में ही 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। इस नतीजे ने राज्य में द्रमुक और अन्नाद्रमुक के दशकों पुराने एकाधिकार को पूरी तरह से तोड़ दिया है।

एक गठबंधन टूटा, दूसरे में टूट की आशंका

द्रमुक के नेतृत्व वाले सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस (एसपीए) इस चुनाव में बुरी तरह सिमट गया। द्रमुक को केवल 59 सीटें मिलीं, जबकि प्रमुख सहयोगी कांग्रेस के हिस्से में भी मुट्ठी भर सीटें ही आईं। इस झटके ने इंडिया गठबंधन की उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया, जिसमें क्षेत्रीय दलों को केंद्र में भाजपा के खिलाफ एक मजबूत राष्ट्रीय ढाल माना जा रहा था। इसका असर यह हुआ कि जहां कांग्रेस ने विजय की टीवीके की सरकार बनाने के लिए एसपीए से किनारा किया, वहीं द्रमुक गठबंधन का हिस्सा रही वीसीके भी विजय को बाहर से समर्थन देने के लिए तैयार हो गई।

इसके साथ ही चुनाव से ठीक पहले अन्नाद्रमुक ने भाजपा के साथ एक बार फिर साथ आकर एनडीए गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था। गठबंधन ने मिलकर कुल 53 सीटें जीतीं, लेकिन इसमें भाजपा सिर्फ एक सीट ही निकाल सकी। इस खराब प्रदर्शन ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी कि भाजपा के साथ गठबंधन करने से तमिलनाडु में क्षेत्रीय दलों को चुनावी नुकसान उठाना पड़ता है।

एक पूरी पार्टी ही टूटने के आसार

चुनावी हार के बाद 47 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर खिसकने वाली अन्नाद्रमुक में जबरदस्त विद्रोह शुरू होने की खबरें। माना जा रहा है कि इससे पार्टी दो फाड़ होने की कगार पर है। पार्टी स्पष्ट रूप से मौजूदा प्रमुख एदापद्दी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) और वरिष्ठ नेता सीवी, शनमुगम के नेतृत्व वाले दो विरोधी गुटों में बंट चुकी है। जहां पलानीस्वामी ने अपने आवास पर बैठक बुलाई, जिसमें बमुश्किल 10 से 13 विधायक और 25-30 जिला सचिव ही पहुंचे, वहीं शनमुगम के खेमे की बैठक में लगभग 35 से 37 विधायक और 50 से अधिक जिला सचिव शामिल हुए।

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पार्टी में ईपीएस के एकछत्र राज का विरोध करते हुए बागी नेताओं ने शर्त रखी है कि एसपी. वेलुमणि को विधायक दल का नेता और सीवी. शनमुगम को उपनेता नियुक्त किया जाए। इसके साथ ही पलानीस्वामी के कामकाज की निगरानी के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाने की भी मांग की गई है।

बताया गया है कि बागी गुट की बगावत इस हद तक बढ़ गई है कि सीवी. शनमुगम के खेमे के विधायक विधानसभा में नई टीवीके सरकार का समर्थन करने की संभावनाओं पर भी गुप्त रूप से विचार कर रहे हैं, भले ही उन्हें टीवीके की तरफ से अभी तक कोई न्योता न मिला हो। इस बीच एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि ईपीएस ने अन्नाद्रमुक को टूट से बचाने के लिए बागियों की कुछ शर्तें मान ली हैं, लेकिन विधायकों और जिला सचिवों का एक बड़ा धड़ा उनके खिलाफ खड़ा हो जाने से उनका पार्टी सुप्रीमो बने रहना बेहद मुश्किल हो गया है। नेतृत्व और भविष्य की रणनीति को लेकर मचे इस घमासान से पूरी एआईएडीएमके के बंटवारे का गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

3. केरल में हारने वाले गठबंधन से लेकर जीतने वाले गठबंधन तक में रार

केरल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद, जीतने वाले गठबंधन- यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) से लेकर हारने वाले गठबंधन लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) तक में पदों और नेतृत्व को लेकर भारी खींचतान मची हुई है।

जीतने वाले गठबंधन (यूडीएफ/कांग्रेस) में रार

मुख्यमंत्री पद की रेस: यूडीएफ ने 140 सदस्यीय विधानसभा में 102 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है, लेकिन अब मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए दो बड़े नेताओं- वीडी. सतीशन, और रमेश चेन्नीथला के बीच कड़ी टक्कर चल रही है। इस विवाद के बीच सीएम पद के लिए केसी. वेणुगोपाल का एक और नाम चर्चा में शामिल हो गया।  

गुटबाजी और सड़कों पर प्रदर्शन: वीडी. सतीशन, जिन्होंने पार्टी के चुनाव अभियान का नेतृत्व किया था, के समर्थक मुख्यमंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी का समर्थन करते हुए सड़कों पर उतर आए हैं। केसी. वेणुगोपाल की इस रेस में अचानक एंट्री के बाद से विरोध इतना उग्र हो गया है कि तिरुवनंतपुरम और कन्नूर जैसे शहरों में सतीशन समर्थकों द्वारा वेणुगोपाल के पोस्टर फाड़े जा रहे हैं और सतीशन के लिए न्याय के नारे लगाए जा रहे हैं। 

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आलाकमान पर निर्भरता: भारी बहुमत और विधायकों के होने के बावजूद कांग्रेस पार्टी का प्रदेश नेतृत्व तुरंत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका है, और फैसला दिल्ली स्थित कांग्रेस हाईकमान पर छोड़ दिया गया है, जिससे जीत के जश्न के बीच पार्टी की काफी किरकिरी हो रही है।

हारने वाले गठबंधन (एलडीएफ/माकपा) में रार

नेता प्रतिपक्ष को लेकर विवाद: चुनाव हारने के बाद अब सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी माकपा में विपक्ष के नेता को चुनने पर बगावती सुर उठने लगे हैं। जिन पिनरई विजयन के नेतृत्व में वाम मोर्चे ने यह चुनाव लड़ा था, अब पार्टी के अंदर ही उन्हें विपक्ष का नेता बनाए जाने के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं। विवाद बढ़ता देख नेता प्रतिपक्ष चुनने का यह फैसला पार्टी की सर्वोच्च संस्था- पोलित ब्यूरो पर टाल दिया गया है।

4. असम में विपक्ष एक-दूसरे पर उठा रहा उंगली

असम के 2026 विधानसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की एकतरफा जीत और विपक्षी गठबंधन की करारी हार के बाद, विपक्ष के बीच फूट पड़ गई है और नेता अपनी हार का ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ रहे हैं। यह कलह मुख्य रूप से सहयोगी दलों- रायजोर दल और कांग्रेस के बीच खुलकर सामने आई है। 



रायजोर दल ने कांग्रेस पर लगाए गए आरोप
  • रायजोर दल के प्रमुख अखिल गोगोई ने कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि भाजपा को हराने के लिए उनके पास कोई स्पष्ट रणनीति नहीं थी और उनका चुनाव अभियान बहुत ही अव्यवस्थित और आधा-अधूरा था। 
  • गोगोई के मुताबिक, गठबंधन का ज्यादातर समय जनता के बीच जाने के बजाय सीट-बंटवारे को लेकर होने वाली अंतहीन बैठकों में ही बर्बाद हो गया।
  • गोगोई ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि जहां प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने कई बार असम का दौरा किया, वहीं नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने चुनाव प्रचार के लिए सिर्फ दो-दो दिन ही दिए।
  • गोगोई ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष देवव्रत सैकिया पर निशाना साधते हुए कहा कि वे विधानसभा में मुंह बंद करके बैठे रहे, जबकि जनता को एक ऐसे विपक्ष की जरूरत थी जो उनकी आवाज उठा सके।

कांग्रेस का गोगोई पर तीखा पलटवार

  • गोगोई के हमलों के जवाब में देवव्रत सैकिया ने पलटवार करते हुए कहा कि गोगोई सिर्फ कांग्रेस की पीठ पर खड़े होकर ही अपनी शिवसागर सीट से जीत पाए हैं। सैकिया ने यह भी याद दिलाया कि पंचायत चुनावों में जब गठबंधन नहीं था, तब गोगोई की पार्टी बुरी तरह फ्लॉप हुई थी।
  • असम महिला कांग्रेस की अध्यक्ष मीरा बोरठाकुर गोस्वामी ने भी अखिल गोगोई को निशाने पर लेते हुए चेतावनी दी कि अगर कांग्रेस ने शिवसागर सीट पर अपना उम्मीदवार उतारा होता, तो ईवीएम भी उन्हें हारने से नहीं बचा पाती।

कुल मिलाकर, असम में यह साफ दिखा कि विपक्षी दल सत्ता विरोधी लहर को भुनाने या पूरे राज्य में एकजुट चुनावी नैरेटिव बनाने में पूरी तरह विफल रहे। स्थिति तब और खराब हो गई थी जब चुनाव से ठीक पहले प्रद्योत बोरदोलोई और भूपेन बोरा जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी, जो विपक्ष की कमजोर स्थिति को पहले ही दर्शा चुका था।

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