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‘बुलियों की खुशामद कभी काम नहीं आती’: भारतीय आईटी कंपनियों पर अमेरिकी शिकंजे से भड़की कांग्रेस, सरकार को घेरा

Fri, 09 Oct 2026 10:20 AM IST
प्रशांत तिवारी एएनआई, नई दिल्ली
एएनआई, नई दिल्ली Published by: प्रशांत तिवारी Updated Fri, 09 Oct 2026 10:20 AM IST
सार

अमेरिकी सरकार ने इन्फोसिस, विप्रो, एचसीएल, टाटा और कॉग्निजेंट समेत कई बड़ी आईटी कंपनियों के लिए PERM कार्यक्रम के तहत नए आवेदन दाखिल करने पर अस्थायी रोक लगाई है। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने इसे मोदी सरकार की अमेरिका के प्रति कथित नरम नीति की नाकामी बताया और भारतीय कानूनों के तहत जवाब देने की मांग की। 

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Appeasing bullies never works Congress lashes out over US crackdown on Indian IT companies targets government
जयराम रमेश, कांग्रेस सांसद - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

अमेरिका ने भारत की कई बड़ी आईटी कंपनियों समेत माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए ग्रीन कार्ड से जुड़ी प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। अमेरिकी सरकार के इस फैसले से भारतीय आईटी पेशेवरों और कंपनियों के सामने नई मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस के राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने केंद्र की मोदी सरकार को घेरते हुए आरोप लगाया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने की कोशिशों के बावजूद भारत के हितों की रक्षा नहीं हो पा रही है। उन्होंने कहा कि ताकतवर लोगों के सामने झुकने और उनकी खुशामद करने से कोई फायदा नहीं होता। जयराम रमेश ने इस फैसले को भारत की कूटनीति और सरकार की नीतियों से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं।

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ट्रंप को खुश करने की कोशिश पर जयराम रमेश का सवाल
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर अमेरिकी सरकार के फैसले की आलोचना की। उन्होंने कहा कि अमेरिका की ताजा कार्रवाई ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि दबंग नेताओं को खुश करने की नीति से कोई फायदा नहीं मिलता। उनके मुताबिक, अमेरिकी सरकार का यह कदम सीधे तौर पर भारतीय आईटी पेशेवरों को प्रभावित करता है।
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रमेश ने उठाया एमडीआर का मुद्दा
जयराम रमेश ने यूपीआई के मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) यानी व्यापारियों से डिजिटल भुगतान पर लिए जाने वाले शुल्क का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने के लिए यूपीआई पर एमडीआर शुल्क लगाने का फैसला किया, जिससे अमेरिकी कंपनियों को सीधा फायदा मिल सकता है। उन्होंने एक्स पर लिखा, 'बुलियों की खुशामद करने से कभी फायदा नहीं होता, यह बात अमेरिकी सरकार की कल की कार्रवाई से एक बार फिर साबित हो गई है। यह कार्रवाई सीधे भारतीय आईटी पेशेवरों को निशाना बनाती है। इससे कुछ ही समय पहले मोदी सरकार ने राष्ट्रपति ट्रंप को खुश करने के लिए यूपीआई पर एमडीआर शुल्क लगाने की पूरी कोशिश की, जिसका साफ और सीधा फायदा अमेरिकी कंपनियों को होगा।”
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डेटा प्रोटेक्शन कानून का इस्तेमाल करे भारत: कांग्रेस
जयराम रमेश ने कहा कि भारत के पास अमेरिकी फैसले का जवाब देने के लिए कई विकल्प मौजूद हैं। उन्होंने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और उससे जुड़े नियमों का जिक्र करते हुए कहा कि संसद से पारित कानूनों के जरिए भारत जवाबी कदम उठा सकता है। हालांकि, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि मौजूदा हालात में सरकार अमेरिका के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं करेगी। अपनी पोस्ट में उन्होंने ‘ज्ञानेशगेट’ का भी जिक्र किया और दावा किया कि प्रधानमंत्री खुद राजनीतिक दबाव में हैं। ये आरोप जयराम रमेश की राजनीतिक प्रतिक्रिया का हिस्सा हैं।

अमेरिकी फैसले से भारतीय आईटी कंपनियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं
अमेरिकी श्रम विभाग ने कई बड़ी आईटी कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (PERM) कार्यक्रम के तहत नए आवेदन दाखिल करने से अस्थायी रूप से रोक दिया है। इस सूची में कॉग्निजेंट, इन्फोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल और कैपजेमिनी जैसी कंपनियां शामिल हैं। अमेरिकी टेक कंपनियों माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी पर भी यह रोक लगाई गई है। PERM प्रक्रिया अमेरिका में रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड हासिल करने के रास्ते का एक अहम हिस्सा है। इसके जरिए कंपनियां कुछ विदेशी कर्मचारियों को स्थायी निवास दिलाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाती हैं। ऐसे में इस कार्यक्रम पर रोक लगने से प्रभावित कंपनियों के लिए अपने कर्मचारियों को स्थायी निवास दिलाना मुश्किल हो सकता है। अमेरिकी श्रम विभाग ने कहा है कि संबंधित कंपनियों के खिलाफ कई संघीय जांच चल रही हैं। अमेरिकी श्रम सचिव कीथ सॉन्डरलिंग ने स्पष्ट किया कि विभाग इन कंपनियों से जुड़े न तो नए आवेदन स्वीकार करेगा और न ही पहले से लंबित स्थायी श्रम प्रमाणन आवेदनों पर आगे की प्रक्रिया करेगा।
 
'भारत के लिए चुनौती के साथ अवसर भी'
वहीं, इस मुद्दे पर कर्नाटक के आईटी मंत्री प्रियांक खरगे ने कहा कि अमेरिकी फैसले से भारतीय आईटी कंपनियों के पारंपरिक आउटसोर्सिंग मॉडल पर दबाव बढ़ सकता है। अमेरिका में काम करने की लागत बढ़ने, कुशल कर्मचारियों को बनाए रखने में मुश्किल आने और भारतीय पेशेवरों को वहां भेजने की प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अगर भारतीय इंजीनियरों को अमेरिका भेजना ज्यादा मुश्किल और महंगा होता है, तो कंपनियां ज्यादा तकनीकी और उच्च मूल्य वाले काम भारत में ही करवा सकती हैं। इससे देश में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) का विस्तार हो सकता है और रिसर्च, इंजीनियरिंग, उत्पाद विकास, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तथा डीप टेक्नोलॉजी से जुड़े काम बढ़ सकते हैं। खरगे के मुताबिक, इससे भारत में वरिष्ठ तकनीकी पेशेवरों की मांग बढ़ने और देश को वैश्विक नवाचार केंद्र के रूप में मजबूत करने का मौका मिल सकता है। उन्होंने जोर दिया कि इन अवसरों का लाभ उठाने के लिए भारत को पहले से बेहतर तैयारी करनी होगी।

पवन खेड़ा ने भी मोदी सरकार पर साधा निशाना
इससे पहले गुरुवार को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी अमेरिकी वीजा प्रतिबंधों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा था। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव के सामने मजबूती से भारत का पक्ष रखने में नाकाम रहे हैं। पवन खेड़ा ने कहा कि एच-1बी वीजा की ऊंची फीस के कारण अमेरिकी कंपनियां भारतीय पेशेवरों को नौकरी देने से पहले दोबारा विचार कर रही हैं। अब बड़ी भारतीय आईटी कंपनियों के लिए PERM कार्यक्रम पर रोक से भारतीय कर्मचारियों को अमेरिका में स्थायी निवास दिलाने की प्रक्रिया भी मुश्किल हो सकती है।


ये भी पढ़ें: अमेरिका में आईटी कंपनियों पर शिकंजा: वेंस बोले- विदेशी कर्मचारी ‘बंधुआ मजदूर’, भारतीय कंपनियों पर क्या असर?

छात्रों के लिए भी अमेरिकी नियम सख्त होने के संकेत
अमेरिकी सरकार का यह कदम ऐसे समय आया है, जब वहां के गृह सुरक्षा विभाग ने एफ-1 गैर-आप्रवासी छात्र वीजा धारकों के लिए ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) कार्यक्रम में शामिल होने पर नई फीस लगाने का प्रस्ताव दिया है। इस कार्यक्रम के तहत पात्र विदेशी छात्र अपनी पढ़ाई से जुड़े क्षेत्र में अमेरिका में व्यावहारिक काम का अनुभव हासिल कर सकते हैं। अमेरिकी प्रशासन ने प्रस्तावित फीस को अमेरिकी कामगारों के हितों की रक्षा करने और आव्रजन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने की कोशिश बताया है। इन फैसलों से साफ है कि अमेरिका विदेशी पेशेवरों और छात्रों से जुड़े नियमों की समीक्षा कर रहा है। भारतीय आईटी कंपनियों के लिए अब बड़ी चुनौती अमेरिकी नियमों के अनुरूप कारोबार जारी रखने के साथ-साथ अपने कुशल कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना होगी।

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