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न्यायिक और पुलिस हिरासत में अंतर: शाहरुख के बेटे को कोर्ट ने न्यायिक हिरासत में भेजा; जानिए क्या हैं इसके मायने?

Thu, 07 Oct 2021 08:41 PM IST
हिमांशु मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Thu, 07 Oct 2021 08:41 PM IST
सार

अभिनेता शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान समेत 8 आरोपियों को मुंबई की कोर्ट ने क्रूज ड्रग्स मामले में 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। हम आपको बता रहे हैं कि आखिर कोर्ट के इस फैसले का क्या मतलब है? 

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Aryan khan sent to Judicial custody; know about diffrence between judicial custody and police custody
आर्यन खान को कोर्ट ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अभिनेता शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान समेत 8 आरोपियों को मुंबई की कोर्ट ने क्रूज ड्रग्स मामले में 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। कोर्ट से नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने पुलिस कस्टडी की डिमांड की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। हम आपको बता रहे हैं कि आखिर कोर्ट के इस फैसले का क्या मतलब है? पुलिस और न्यायिक हिरासत में क्या अंतर होता है?
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हिरासत क्या है?

हिरासत का मतलब किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा के मुताबिक कहीं आने-जाने या कुछ करने पर प्रतिबंध। ऐसी परिस्थिति में सरकारी विभाग जैसे की पुलिस, एनसीबी, सीबीआई के अफसर उस व्यक्ति पर नजर रखते हैं। किसी भी व्यक्ति को बिना मतलब के हिरासत में नहीं रखा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता चंद्र प्रकाश पांडेय के मुताबिक, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हिरासत व्यक्ति के व्यक्तिगत आजादी पर सीधा हमला है। ऐसी स्थिति में कानूनी तौर पर ही किसी व्यक्ति को अधिकारी हिरासत में रख सकते हैं। इसके लिए कोर्ट की अनुमति लेना जरूरी होता है। हिरासत में लेने के बाद सक्षम अधिकारी उस व्यक्ति से पूछताछ कर सकते हैं। 
 
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गिरफ्तारी क्या है?

गिरफ्तारी का मतलब होता है कि किसी व्यक्ति को बलपूर्वक पुलिस कैद में रखना। गिरफ्तारी के बाद व्यक्ति को हिरासत में रखा जा सकता है, लेकिन ये जरूरी नहीं है कि हिरासत के बाद किसी व्यक्ति को गिरफ्तार ही किया जाए। हिरासत में लेने के 24 घंटे के अंदर संबंधित व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के कोर्ट में पेश करना जरूरी होता है। 
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न्यायिक हिरासत या पुलिस हिरासत का क्या मतलब?

किसी आरोपी को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करती है। उस वक्त मजिस्ट्रेट के पास दो विकल्प होते हैं। पहला ये कि वह उस व्यक्ति को पुलिस हिरासत में दे दे और दूसरा उसे न्यायिक हिरासत में भेज दे। आरपीसी की धारा 167(2) में मजिस्ट्रेट को यह शक्ति प्रदान की गई है। 

जब आरोपी पुलिस हिरासत में भेजा जाएगा तो उसे पुलिस थाने में बंद किया जाएगा। इस दौरान पुलिस उससे पूछताछ कर सकती है। हिरासत में रहने के दौरान पुलिस आरोपी से कभी भी पूछताछ कर सकती है। 

वहीं, जब आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेजा जाता है तो उसे जेल भेज दिया जाता है। ऐसी स्थिति में अगर पुलिस को पूछताछ करनी होती है तो इसके पहले मजिस्ट्रेट का आदेश लेना जरूरी होता है। न्यायिक हिरासत के दौरान पुलिस हिरासत की प्रकृति को बदल नहीं सकती है। 
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