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AI Security: आर्टिफिशियल टेक्नोलॉजी से बढ़ेगी सुरक्षा, लेकिन खतरे भी कम नहीं
Fri, 13 Dec 2024 09:56 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Fri, 13 Dec 2024 09:56 PM IST
सार
विशेषज्ञों का कहना है कि एआई का असर एकतरफा नहीं होगा। यदि इसके कारण अपराधियों को अपराध करने के लिए नए-नए तरीके मिलने की संभावना पैदा हो रही है तो इसी एआई के कारण उनको पकड़ने में भी उतनी ही सहूलियत होने वाली है।
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साइबर सिक्योरिटी और एआई तकनीक पर जानकारी देते सुरक्षा विशेषज्ञ योगेश मुद्रास और दिल्ली पुलिस के DCP।
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
आर्टिफिशियल टेक्नोलॉजी का जीवन के विभिन्न क्षेत्रों पर क्या असर पड़ेगा, इसको लेकर सभी क्षेत्रों के विशेषज्ञ आकलन कर रहे हैं।शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर परिवहन तक हर क्षेत्र में इसका बड़ा असर पड़ना तय माना जा रहा है। लेकिन इसी के साथ आर्टिफिशियल टेक्नोलॉजी के कारण लोगों को सुरक्षा की चिंता भी होने लगी है। जिस तरह लोगों की आवाज और वीडियो की नकल कर नए ऑडियो-वीडियो और फोटो बनाए जा रहे हैं, उससे एआई के कारण लोगों की जिंदगी में बड़ा असर हो सकता है, इस क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ ऐसा मानते हैं।
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि एआई का असर एकतरफा नहीं होगा। यदि इसके कारण अपराधियों को अपराध करने के लिए नए-नए तरीके मिलने की संभावना पैदा हो रही है तो इसी एआई के कारण उनको पकड़ने में भी उतनी ही सहूलियत होने वाली है। उदाहरण के तौर पर कोई अपराधी लूट या हत्या की वारदात को अंजाम देकर किसी रास्ते से भाग रहा है तो पुलिस के लिए हर एक गाड़ी को रोककर उसकी पहचान कर पाना बहुत मुश्किल भरा काम होता है। इसमें अपराधियों के बचकर निकल भागने की संभावना बहुत ज्यादा होती है।
लेकिन यदि इसी जगह पर सड़क पर लगे सीसीटीवी कैमरे आर्टिफिशियल टेक्नोलॉजी यानी एआई तकनीक से लैस होंगे तो सड़क पर चल रहे लाखों वाहनों को परेशान किए बिना अपराधी के वाहन की पहचान करना, और उसकी लोकेशन का अलर्ट पुलिस को भेजना बेहद आसान हो जाएगा। ऐसे में सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि एआई तकनीक को एक खतरा मानने की बजाय उसको चैलेंज के रूप में लेने की जरूरत है।
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कैमरों को एआई से जोड़ना चैलेंज- पुलिस
दिल्ली यातायात पुलिस के डीसीपी एसके सिंह ने कहा कि पूरी दिल्ली में 15 हजार के करीब कैमरे पुलिस के द्वारा लगाए गए हैं। लेकिन निजी लोगों-संस्थाओं के द्वारा लगाए गए कैमरों को मिलाकर लगभग 1.5 लाख कैमरे वर्तमान समय में काम कर रहे हैं। लेकिन इसके बाद भी यदि कोई अपराधी किसी स्थान से अपराध करके भागता है तो इतने कैमरों की जांच कर उसको पकड़ना आसान नहीं होता।
एक सामान्य व्यक्ति कुछ कैमरों पर कड़ी निगाह करके देखना चाहे तो वह आधे घंटे से अधिक लगातार सतर्क नहीं रह सकता। उसका ध्यान भंग होना बहुत स्वाभाविक है। और इसी बीच अपराधी का बच निकलना बहुत संभव हो सकता है, लेकिन एआई जैसी तकनीक के कारण लाखों कैमरों पर एक साथ लगातार सतर्क निगाह रखना बेहद आसान हो सकता है। ऐसे में एआई अपराधियों की परेशानी बढ़ाने वाला है।
लेकिन यहां है चैलेंज
लेकिन दिल्ली पुलिस जैसी किसी भी सुरक्षा एजेंसी के लिए सबसे मुश्किल चैलेंज यह होता है कि सभी कैमरों को किसी एक सॉफ्टवेयर से नहीं चलाया जाता। इस समय भारत में 800 से अधिक प्रकार के सीसीटीवी कैमरे चलाए जा रहे हैं और हर तरह का कैमरा अपने अलग-अलग सॉफ्टवेयर से चलता है। भारत में जितने भी प्रकार के कैमरे उपयोग किए जा रहे हैं, इसमें लगभग 20 प्रतिशत विदेशों से आयात किए जा रहे हैं। उनके काम करने का तरीका और सॉफ्टवेयर बहुत अलग तरीके का है।
अब यदि किसी शहर में 400 अलग-अलग तरह के कैमरों को जगह-जगह पर लगाया गया होगा तो सुरक्षा एजेंसी के लिए हर तरह के कैमरों के सॉफ्टवेयर से डाटा इकट्ठा करना, उसको प्रोसेस करके सटीक अपराधी की पहचान करना बड़ा काम है। यह असंभव नहीं है, लेकिन हर तरह के कैमरों को किसी एक सॉफ्टवेयर से जोड़कर उसका डाटा प्रोसेस करने के लिए भारी पैसा, समय और संसाधन चाहिए। ज्यादातर मामलों में यह काम सरकारों के द्वारा समय से नहीं उपलब्ध कराया जाता जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए चैलेंज बन जाता है।
सुरक्षा बन गया बड़ा उद्योग
इनफोर्मा मार्केट्स इन इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर योगेश मुद्रास ने कहा कि जिस तरह लोगों के सामने सुरक्षा के नए-नए खतरे उभर रहे हैं, सुरक्षा को लेकर लोगों की चिंता भी बढ़ती जा रही हैं। टॉप शहरों से नहीं, बल्कि देश के टियर 2 और टियर 3 वाले शहरों से भी घरों-बैंकों की सुरक्षा के लिए नई-नई तकनीक की मांग हो रही है। यही कारण है कि भारत में यह एक अलग तरह का बड़ा उद्योग बन चुका है। 2024 में देश का सीसीटीवी मार्केट 3.98 बिलियन डॉलर का हो चुका है, जो 2029 तक 20.6 फीसदी की दर से बढ़कर 10.17 बिलियन डॉलर के पार पहुंच जाएगा।
योगेश मुद्रास ने कहा कि केवल वाहन तक की पहचान करने के लिए सीसीटीवी कैमरे सक्षम हो चुके हैं, लेकिन यदि यातायात पुलिस यह चेक करना चाहती है कि क्या ड्राइवर ने सीट बेल्ट पहनी है या नहीं, इसके लिए तकनीक को अलग स्तर पर ले जाना होगा। लेकिन एआई यही काम आसान कर सकता है। इसके लिए केंद्र सरकार को भारी निवेश करना होगा। निजी क्षेत्र इसमें सहयोग कर सकता है।
पासवर्ड लीक बड़ा खतरा, लेकिन पकड़ना भी आसान
इस समय जिस तरह पासवर्ड हैक कर लोगों के बैंकों के धनराशि उड़ाई जा रही है, लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ गई है। लोगों की पूरी जिंदगी की कमाई केवल चंद सेकेंड के पासवर्ड लीक के जरिए खत्म कर दी जाती है। शुरुआती दौर में यह सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा था, लेकिन चूंकि इस तरह के मामलों में पैसा किसी एक बैंक से दूसरे बैंक में रूट किया जाता है जो ऑनलाइन होता है, इसको पकड़ना भी उतना ही आसान होता है।
लेकिन इसके लिए पुलिस को सतर्क रहकर काम करना होता है। कई बार पुलिस कर्मियों को दूसरे राज्यों की सुरक्षा एजेंसी से संपर्क कर एक तालमेल से काम करने की आवश्यकता होती है। लेकिन इसमें बहुत अधिक समय लगने, और कई बार आपसी सहयोग न मिल पाने के कारण इस तरह के मामले हल नहीं हो पाते। लेकिन यह मानवीय सहयोग की कमी है, तकनीक की नहीं।
सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि राष्ट्रीय स्तर पर इसको लेकर एक सिस्टम बनाया जाए तो इस तरह के अपराधों में पैसे को बैंकों से बाहर जाने पर रोक लगाकर ऐसे अपराध रोके जा सकते हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कई बार पहल कर नियमों में ऐसे बदलाव किए हैं जो इस तरह के अपराधों को कम करने में मदद कर रहे हैं। लेकिन अपराधों का स्तर बता रहा है कि अभी बहुत नए प्रयास करने की आवश्यकता है और एआई तकनीक इसमें बहुत सहयोग कर सकती है।
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लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि एआई का असर एकतरफा नहीं होगा। यदि इसके कारण अपराधियों को अपराध करने के लिए नए-नए तरीके मिलने की संभावना पैदा हो रही है तो इसी एआई के कारण उनको पकड़ने में भी उतनी ही सहूलियत होने वाली है। उदाहरण के तौर पर कोई अपराधी लूट या हत्या की वारदात को अंजाम देकर किसी रास्ते से भाग रहा है तो पुलिस के लिए हर एक गाड़ी को रोककर उसकी पहचान कर पाना बहुत मुश्किल भरा काम होता है। इसमें अपराधियों के बचकर निकल भागने की संभावना बहुत ज्यादा होती है।
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लेकिन यदि इसी जगह पर सड़क पर लगे सीसीटीवी कैमरे आर्टिफिशियल टेक्नोलॉजी यानी एआई तकनीक से लैस होंगे तो सड़क पर चल रहे लाखों वाहनों को परेशान किए बिना अपराधी के वाहन की पहचान करना, और उसकी लोकेशन का अलर्ट पुलिस को भेजना बेहद आसान हो जाएगा। ऐसे में सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि एआई तकनीक को एक खतरा मानने की बजाय उसको चैलेंज के रूप में लेने की जरूरत है।
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कैमरों को एआई से जोड़ना चैलेंज- पुलिस
दिल्ली यातायात पुलिस के डीसीपी एसके सिंह ने कहा कि पूरी दिल्ली में 15 हजार के करीब कैमरे पुलिस के द्वारा लगाए गए हैं। लेकिन निजी लोगों-संस्थाओं के द्वारा लगाए गए कैमरों को मिलाकर लगभग 1.5 लाख कैमरे वर्तमान समय में काम कर रहे हैं। लेकिन इसके बाद भी यदि कोई अपराधी किसी स्थान से अपराध करके भागता है तो इतने कैमरों की जांच कर उसको पकड़ना आसान नहीं होता।
एक सामान्य व्यक्ति कुछ कैमरों पर कड़ी निगाह करके देखना चाहे तो वह आधे घंटे से अधिक लगातार सतर्क नहीं रह सकता। उसका ध्यान भंग होना बहुत स्वाभाविक है। और इसी बीच अपराधी का बच निकलना बहुत संभव हो सकता है, लेकिन एआई जैसी तकनीक के कारण लाखों कैमरों पर एक साथ लगातार सतर्क निगाह रखना बेहद आसान हो सकता है। ऐसे में एआई अपराधियों की परेशानी बढ़ाने वाला है।
लेकिन यहां है चैलेंज
लेकिन दिल्ली पुलिस जैसी किसी भी सुरक्षा एजेंसी के लिए सबसे मुश्किल चैलेंज यह होता है कि सभी कैमरों को किसी एक सॉफ्टवेयर से नहीं चलाया जाता। इस समय भारत में 800 से अधिक प्रकार के सीसीटीवी कैमरे चलाए जा रहे हैं और हर तरह का कैमरा अपने अलग-अलग सॉफ्टवेयर से चलता है। भारत में जितने भी प्रकार के कैमरे उपयोग किए जा रहे हैं, इसमें लगभग 20 प्रतिशत विदेशों से आयात किए जा रहे हैं। उनके काम करने का तरीका और सॉफ्टवेयर बहुत अलग तरीके का है।
अब यदि किसी शहर में 400 अलग-अलग तरह के कैमरों को जगह-जगह पर लगाया गया होगा तो सुरक्षा एजेंसी के लिए हर तरह के कैमरों के सॉफ्टवेयर से डाटा इकट्ठा करना, उसको प्रोसेस करके सटीक अपराधी की पहचान करना बड़ा काम है। यह असंभव नहीं है, लेकिन हर तरह के कैमरों को किसी एक सॉफ्टवेयर से जोड़कर उसका डाटा प्रोसेस करने के लिए भारी पैसा, समय और संसाधन चाहिए। ज्यादातर मामलों में यह काम सरकारों के द्वारा समय से नहीं उपलब्ध कराया जाता जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए चैलेंज बन जाता है।
सुरक्षा बन गया बड़ा उद्योग
इनफोर्मा मार्केट्स इन इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर योगेश मुद्रास ने कहा कि जिस तरह लोगों के सामने सुरक्षा के नए-नए खतरे उभर रहे हैं, सुरक्षा को लेकर लोगों की चिंता भी बढ़ती जा रही हैं। टॉप शहरों से नहीं, बल्कि देश के टियर 2 और टियर 3 वाले शहरों से भी घरों-बैंकों की सुरक्षा के लिए नई-नई तकनीक की मांग हो रही है। यही कारण है कि भारत में यह एक अलग तरह का बड़ा उद्योग बन चुका है। 2024 में देश का सीसीटीवी मार्केट 3.98 बिलियन डॉलर का हो चुका है, जो 2029 तक 20.6 फीसदी की दर से बढ़कर 10.17 बिलियन डॉलर के पार पहुंच जाएगा।
योगेश मुद्रास ने कहा कि केवल वाहन तक की पहचान करने के लिए सीसीटीवी कैमरे सक्षम हो चुके हैं, लेकिन यदि यातायात पुलिस यह चेक करना चाहती है कि क्या ड्राइवर ने सीट बेल्ट पहनी है या नहीं, इसके लिए तकनीक को अलग स्तर पर ले जाना होगा। लेकिन एआई यही काम आसान कर सकता है। इसके लिए केंद्र सरकार को भारी निवेश करना होगा। निजी क्षेत्र इसमें सहयोग कर सकता है।
पासवर्ड लीक बड़ा खतरा, लेकिन पकड़ना भी आसान
इस समय जिस तरह पासवर्ड हैक कर लोगों के बैंकों के धनराशि उड़ाई जा रही है, लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ गई है। लोगों की पूरी जिंदगी की कमाई केवल चंद सेकेंड के पासवर्ड लीक के जरिए खत्म कर दी जाती है। शुरुआती दौर में यह सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा था, लेकिन चूंकि इस तरह के मामलों में पैसा किसी एक बैंक से दूसरे बैंक में रूट किया जाता है जो ऑनलाइन होता है, इसको पकड़ना भी उतना ही आसान होता है।
लेकिन इसके लिए पुलिस को सतर्क रहकर काम करना होता है। कई बार पुलिस कर्मियों को दूसरे राज्यों की सुरक्षा एजेंसी से संपर्क कर एक तालमेल से काम करने की आवश्यकता होती है। लेकिन इसमें बहुत अधिक समय लगने, और कई बार आपसी सहयोग न मिल पाने के कारण इस तरह के मामले हल नहीं हो पाते। लेकिन यह मानवीय सहयोग की कमी है, तकनीक की नहीं।
सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि राष्ट्रीय स्तर पर इसको लेकर एक सिस्टम बनाया जाए तो इस तरह के अपराधों में पैसे को बैंकों से बाहर जाने पर रोक लगाकर ऐसे अपराध रोके जा सकते हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कई बार पहल कर नियमों में ऐसे बदलाव किए हैं जो इस तरह के अपराधों को कम करने में मदद कर रहे हैं। लेकिन अपराधों का स्तर बता रहा है कि अभी बहुत नए प्रयास करने की आवश्यकता है और एआई तकनीक इसमें बहुत सहयोग कर सकती है।