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बुंदेलखंड का एक और कड़वा सच, भूख प्यास से तड़पकर दम तोड़ रहे जानवर

Sun, 24 Apr 2016 10:31 AM IST
चंद्रभान यादव, रशीद सिद्दीकी/अमर उजाला बांदा
चंद्रभान यादव, रशीद सिद्दीकी/अमर उजाला बांदा Updated Sun, 24 Apr 2016 10:31 AM IST
सार

  • जानवरों के मरने का सबूत दे रही हर तरफ पड़ी हड्डियां
  •  खुद के खाने का इंतजाम करें या जानवरों का पेट भरें
  • जलाशयों में बचे कीचड़युक्त पानी के सहारे जानवर जिंदा

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animals are dying of hunger and thirst in bundelkhand
सूखा प्राकृतिक है या लोगों द्वारा पैदा किया गया? - फोटो : getty

विस्तार

जरूरत पड़ी तो हम छीन कर खा लेंगे। चार छह किलोमीटर जाकर पानी पी लेंगें। इससे भी काम नहीं चला तो गांव छोड़कर शहर चले जाएंगे लेकिन इन बेजुबानों का क्या करें। एक के बाद एक मर रहे हैं। खूंटे पर मरने से पाप अलग से लग रहा है। यह दर्द है बांदा जिले के अंतिम छोर पर बसे गांव महराजपुर के बशीर का। बशीर की तरह ही बुंदेलखंड के हर जिले में सूखे से कराह रहे लोगों के सामने पशुओं को बचाना चुनौती बन गई है। हमने बुंदेलखंड के जिलों के अलग-अलग गांवों में जाकर भूसा वितरण और जानवरों की स्थिति की पड़ताल की तो हालात चौंकाने वाले मिले।
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उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर बसे महराजपुर गांव में ज्यादातर पटेल बिरादरी के लोग हैं। मुख्य मार्ग से करीब 500 मीटर अंदर गांव तक पक्की सड़क बनी है। सड़क के दोनों तरफ कच्चे मकान हैं। किसी के दरवाजे पर एक भैंस बंधी है तो किसी के दो। गांव में प्रवेश करते हैं तो लोग घेर लेते हैं। राशन कार्ड के बारे में पूछते ही फट पड़ते हैं। कहते हैं कि राशन की मत पूछो। पहले जानवरों का हाल पूछो। बब्बन सिंह तपाक से कहते हैं कि सड़क के किनारे खेतों पर नजर डालो तो अपने आप समझ जाओगे। हर तरफ हड्डी पड़ी है। जो जानवरों के मरने का सबूत दे रही है।
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बब्बन सिंह की तरह ही विकलांग बदलू भी बोलते हैं। कहते हैं कि भूसा देने की बात कही गई थी लेकिन एक तिनका भी नहीं मिला। चारे का इंतजाम नहीं कर पाया तो खुला छोड़ दिया। कुछ दिन तक गाय अन्ना जानवरों के साथ रही। दो दिन पहले पता चला कि वह खेत में मरी पड़ी है। खेत में गया। आंसू बहाया और फिर गड्ढा खोदवाकर दफन करा दिया। आखिर कर भी क्या सकते हैं। खुद के खाने का इंतजाम करें कि जानवरों का पेट भरे। एक भैंस दूध दे रही है। किसी तरह उसके चारे-पानी का इंतजाम कर रहे हैं। कुछ ऐसी ही बातें नरैनी तहसील के बिल्हरका, महाराजपुर, शाहबाजपुर आदि गांवों के पशुपालक बताते हैं।
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जलाशयों में बचे कीचड़युक्त पानी के सहारे जानवर जिंदा

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कीचड़युक्त पानी के सहारे जानवर जिंदा - फोटो : amar ujala bureau
अब जरा चित्रकूट जिले के बरगढ़ निवासी बिजई प्रजापति का दर्द जानते हैं। पाठा का यह गांव भी अंतिम छोर पर बसा है। बिजई के गांव में स्थित मंडी परिषद में भूसा डिपो भी खुला है। लेकिन बकौल बिजई- एक दिन सिर्फ तीन किलो भूसा मिला। दूसरे दिन मांगने गए तो भगा दिया गया।

दो दिन तक जानवर सिर्फ पानी के सहारे रहे। पड़िया ने दम तोड़ दिया और एक गाय को खेत में छोड़़ दिया। अब अपनी खुराक में कटौती करके किसी तरह भैंस को खिला रहे हैं, क्योंकि वह दूध दे रही है।

महोबा और हमीरपुर जिले की भी ऐसी ही स्थित है। महोबा जिले के सूपा, लाडपुर गांव में किसी भी व्यक्ति को भूसा नहीं मिला है। सड़क के किनारे बसे इस गांव के लोग जानवरों को खेत में छोड़ दिए हैं। जलाशयों में बचे कीचड़युक्त पानी के सहारे जानवर जिंदा हैं। हमीरपुर के लोग तो सुबह होते ही जानवर लेकर नदी के किनारे पहुंच जाते हैं। नदी की तलहटी में उगी घास और गंदे पानी के सहारे यहां के जानवर जिंदा हैं।
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