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आंध्र प्रदेश: भाई-बहन के झगड़े में टूटा मां का दिल, तेलंगाना में बहन की अलग पार्टी बनाने से नाराज जगनमोहन रेड्डी
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जगन मोहन रेड्डी और उनकी बहन वाई एस शर्मिला
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी और उनकी बहन शर्मिला के बीच इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं है। बताया जा रहा है कि आठ जुलाई के बाद दोनों के संबंध तब से बिगड़ गए हैं जब उनकी बहन वाई एस शर्मिला ने भाई के समर्थन और उनकी इच्छा के बिना तेलंगाना में अपनी वाईएसआर तेलंगाना पार्टी (वाईएसआरटीपी) बना ली है। तब से दोनों भाई-बहन के रिश्ते में एक दूरी आ गई है।इसकी एक झलक गुरुवार को भी देखने को मिली, जब जगनमोहन के पिता और कांग्रेस के पूर्व सीएम वाई एस राजशेखर रेड्डी की 12वीं पुण्यतिथि थी। मुख्यमंत्री की मां वाई एस विजयलक्ष्मी ने इस दिन श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया था। हर पार्टी से लगभग तीन सौ लोग कार्यक्रम में बुलाए गए थे। लोगों के लिए हैरानगी की बात यह थी कि जगनमोहन रेड्डी इस कार्यक्रम में नहीं पहुंचे, जबकि शर्मिला अपनी मां के साथ पूरे कार्यक्रम के दौरान रहीं। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री के इस सभा में नहीं पहुंचने से उनकी मां बहुत दुखी हुईं।
हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसके पहले मुख्यमंत्री अपनी मां विजयम्मा और बहन शर्मिला के साथ आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले के इडुपुलापाया में वाईएसआर घाट पर अपने पिता को श्रद्धांजलि देने गए थे। वे चालीस मिनट तक साथ रहे लेकिन रिश्तों में ठंढापन साफ झलक रहा था।
गुरुवार को वाई एस राजशेखर रेड्डी की श्रद्धांजलि सभा में मौजूद हिंदू अखबार के वरिष्ठ पत्रकार आर रविकांत रेड्डी ने बताया इस बैठक में ज्यादा वाईएसआर रेड्डी की बातें होती रहीं। वैसे यह एक श्रद्धांजलि सभा थी लेकिन मंशा पूरी तरह से राजनीतिक लग रही थी। बैठक में कोई बड़े नेता नहीं पहुंचे, लेकिन जो भी आए थे वे वाईएसआर के बहुत करीबी थे लेकिन अब राजनीति में वे सक्रिय नहीं है। लेकिन ऐसा लग रहा था कि मां पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से अपनी बेटी के लिए समर्थन चाहती हैं। शर्मिला को लगता है कि उन्होंने अपने भाई को समर्थन दिया था अब समर्थन देने की बारी उनकी है।
वाई एस शर्मिला
- फोटो :
Twitter : @realyssharmila
फरवरी से ही रिश्ते में पड़ने लगी थी दरार
मिली जानकारी के मुताबिक दोनों भाई-बहनों के रिश्ते में दरार तभी पड़ने लगी जब इस साल फरवरी में मुख्यमंत्री की छोटी बहन ने हैदराबाद में अपने भाई की सहमति के बिना एक राजनीतिक बैठक की थी। आंध्र प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक बैठक में लगभग सौ कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया था। यह बैठक तेलंगाना में अलग राजनीतिक पार्टी बनाने को लेकर थी। मुख्यमंत्री इस पक्ष में नहीं थे कि पड़ोसी राज्य तेलंगाना में अलग से कोई पार्टी बनाई जाए। बैठक के बाद शर्मिला ने मीडिया को बताया था- मेरा इरादा सभी जिलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं से बात करके इस जमीनी हकीकत को समझना था कि तेलंगाना में हम वाईएसआर का शासन क्यों नहीं वापस ला सकते।
2019 के विधानसभा चुनाव के बाद यह पहली बैठक थी जिसमें शर्मिला ने हिस्सा लिया था। इस चुनाव में उन्होंने भाई के समर्थन में प्रचार किया था। राजनीतिक पर्यवेक्षकों को हैरानी इस बात पर हुई थी कि वाईएसआरसीपी का एक भी सदस्य इस बैठक में शामिल नहीं था और आयोजन स्थल पर जगनमोहन की फोटो भी नहीं थी। आंध्र सरकार के सलाहकार सज्जला रामकृष्ण रेड्डी ने तब मामले को ढंकने की कोशिश करते हुए कहा था- मुख्यमंत्री और उनकी बहन के बीच वैचारिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन दोनों भाई-बहनों के बीच कोई विवाद नहीं है।
भाई की छत्रछाया से निकल कर अपना अलग वजूद चाहती हैं शर्मिला
सूत्रों का कहना है कि दरअसल शर्मिला भाई की छत्रछाया से निकलकर अपने पिता की राजनीतिक विरासत में अपना हिस्सा चाहती हैं। आंध्रप्रदेश में भाई मुख्यमंत्री हैं और उनकी पार्टी एक मजबूत स्थिति में है, ऐसे में शर्मिला को जगनमोहन के रहते यहां अपना राजनीतिक भविष्य नजर नहीं आ रहा है। आर रविकांत रेड्डी कहते हैं जाहिर है वाई एस आर की बेटी होने के नाते वे भी इस विरासत में अपनी भागादारी चाहती हैं और यह किसी भी राजनीतिक परिवार के लिए एक सामान्य बात है।
इसी वजह से शर्मिला तेलंगाना में पार्टी का विस्तार करना चाहती हैं जिससे कि स्वतंत्र रूप से अपना प्रभाव कायम कर सकें। लेकिन सूत्रों ने बताया कि जगनमोहन रेड्डी इसके सख्त खिलाफ हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि उनका ध्यान पूरी तरह से आंध्र प्रदेश पर है और तेलंगाना में पार्टी का विस्तार करना ठीक नहीं है। बताया जा रहा है कि शर्मिला पिछले साल से ही तेलंगाना में पार्टी का विस्तार करने पर चर्चा कर रही थीं, लेकिन मुख्यमंत्री हमेशा इसका विरोध करते रहे।
मिली जानकारी के मुताबिक दोनों भाई-बहनों के रिश्ते में दरार तभी पड़ने लगी जब इस साल फरवरी में मुख्यमंत्री की छोटी बहन ने हैदराबाद में अपने भाई की सहमति के बिना एक राजनीतिक बैठक की थी। आंध्र प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक बैठक में लगभग सौ कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया था। यह बैठक तेलंगाना में अलग राजनीतिक पार्टी बनाने को लेकर थी। मुख्यमंत्री इस पक्ष में नहीं थे कि पड़ोसी राज्य तेलंगाना में अलग से कोई पार्टी बनाई जाए। बैठक के बाद शर्मिला ने मीडिया को बताया था- मेरा इरादा सभी जिलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं से बात करके इस जमीनी हकीकत को समझना था कि तेलंगाना में हम वाईएसआर का शासन क्यों नहीं वापस ला सकते।
2019 के विधानसभा चुनाव के बाद यह पहली बैठक थी जिसमें शर्मिला ने हिस्सा लिया था। इस चुनाव में उन्होंने भाई के समर्थन में प्रचार किया था। राजनीतिक पर्यवेक्षकों को हैरानी इस बात पर हुई थी कि वाईएसआरसीपी का एक भी सदस्य इस बैठक में शामिल नहीं था और आयोजन स्थल पर जगनमोहन की फोटो भी नहीं थी। आंध्र सरकार के सलाहकार सज्जला रामकृष्ण रेड्डी ने तब मामले को ढंकने की कोशिश करते हुए कहा था- मुख्यमंत्री और उनकी बहन के बीच वैचारिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन दोनों भाई-बहनों के बीच कोई विवाद नहीं है।
भाई की छत्रछाया से निकल कर अपना अलग वजूद चाहती हैं शर्मिला
सूत्रों का कहना है कि दरअसल शर्मिला भाई की छत्रछाया से निकलकर अपने पिता की राजनीतिक विरासत में अपना हिस्सा चाहती हैं। आंध्रप्रदेश में भाई मुख्यमंत्री हैं और उनकी पार्टी एक मजबूत स्थिति में है, ऐसे में शर्मिला को जगनमोहन के रहते यहां अपना राजनीतिक भविष्य नजर नहीं आ रहा है। आर रविकांत रेड्डी कहते हैं जाहिर है वाई एस आर की बेटी होने के नाते वे भी इस विरासत में अपनी भागादारी चाहती हैं और यह किसी भी राजनीतिक परिवार के लिए एक सामान्य बात है।
इसी वजह से शर्मिला तेलंगाना में पार्टी का विस्तार करना चाहती हैं जिससे कि स्वतंत्र रूप से अपना प्रभाव कायम कर सकें। लेकिन सूत्रों ने बताया कि जगनमोहन रेड्डी इसके सख्त खिलाफ हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि उनका ध्यान पूरी तरह से आंध्र प्रदेश पर है और तेलंगाना में पार्टी का विस्तार करना ठीक नहीं है। बताया जा रहा है कि शर्मिला पिछले साल से ही तेलंगाना में पार्टी का विस्तार करने पर चर्चा कर रही थीं, लेकिन मुख्यमंत्री हमेशा इसका विरोध करते रहे।
एक सभा में जुटी भीड़
- फोटो :
Twitter : @realyssharmila
पिता के समान राज्य में लोकप्रिय हैं शर्मिला
वाई एस आर रेड्डी 2004 में संयुक्त आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। 2009 में एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गई। पिता की मृत्यु के बाद कांग्रेस से उनका विवाद हुआ और जगनमोहन रेड्डी ने अपनी अलग वाईएसआरसीपी बना ली। इस दौरान जगनमोहन का राजनीतिक करियर बढ़ता गया और शर्मिला उनके करियर को चमकाने के लिए अपना सहयोग देती रहीं।
आंध्र प्रदेश की राजनीति के जानकार बताते हैं, जगनमोहन की तुलना में शर्मिला ज्यादा व्यवहारिक और लोकप्रिय मानी जाती हैं। जब जगन 2013 में भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में थे, तब शर्मिला ने आंध्र प्रदेश में पार्टी के लिए प्रचार करते हुए पदयात्रा की थी। उनके पिता भी पदयात्राएं किया करते थे। उन्होंने आंध्र प्रदेश में 2019 के विधानसभा चुनावों के दौरान जगन के लिए प्रचार किया, लेकिन उसके बाद वह शांत बनी रहीं।
अलग पावर सेंटर के खिलाफ जगनमोहन
हालांकि जब जगनमोहन मुख्यमंत्री बन गए उसके बाद शर्मिला को उनके साथ नहीं देखा गया। बताया गया कि शर्मिला पार्टी या सरकार में अपनी अलग जगह चाहती हैं। कई बार अटकलें लगीं कि वें राज्यसभा जाने की इच्छुक हैं या सरकार में मंत्री बनना चाहती हैं लेकिन न तो उन्हें ऊपरी सदन में भेजा गया और न ही मुख्यमंत्री ने उन्हें अपनी मंत्रिमंडल में जगह दी।
एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि जगनमोहन नहीं चाहते कि शर्मिला को पार्टी या सरकार में कोई जगह देकर एक अलग पावर सेंटर बनाया जाए, क्योंकि वाईएसआर की बेटी होने के नाते वे भी राज्य में लोकप्रिय हैं। उनके फॉलोअर्स बहुत हैं और लोगों से सीधे संपर्क में रहती हैं। इसलिए सबने माना था कि जगनमोहन के सत्ता संभालने के बाद उनका भी राजनीतिक कद बढ़ेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसलिए अब वह अलग राजनीतिक पार्टी बनाकर अपना करियर बनाना चाहती हैं। शर्मिला शादीशुदा हैं और एक ईसाई परिवार में ब्याही गई हैं। कहा जाता है कि अपने राजनीतिक उदय के बाद जगनमोहन ने अपनी मां और बहन को राजनीतिक चर्चाओं से दूर रखने की कोशिश की।
भाजपा की बी टीम होने का आरोप
भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों का दावा है कि शर्मिला के अलग राजनीतिक पार्टी बनाने के पीछे तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) का हाथ है। जो 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले सत्ता-विरोधी वोटों को विभाजित करने के लिए शर्मिला की पार्टी का इस्तेमाल करना चाहती है। हालांकि टीआरएस के भीतर कई लोग वाईएसआरटीपी को भाजपा की बी-टीम कह रहे है, जो रेड्डी समुदाय और ईसाई वोट बैंक का ध्रुवीकरण कर सकती है। टीआरएस तेलंगाना में प्रमुख राजनीतिक ताकत है। यहां कांग्रेस ने अपनी जमीन खो दी है और भाजपा यहां अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही है।
वाई एस आर रेड्डी 2004 में संयुक्त आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। 2009 में एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गई। पिता की मृत्यु के बाद कांग्रेस से उनका विवाद हुआ और जगनमोहन रेड्डी ने अपनी अलग वाईएसआरसीपी बना ली। इस दौरान जगनमोहन का राजनीतिक करियर बढ़ता गया और शर्मिला उनके करियर को चमकाने के लिए अपना सहयोग देती रहीं।
आंध्र प्रदेश की राजनीति के जानकार बताते हैं, जगनमोहन की तुलना में शर्मिला ज्यादा व्यवहारिक और लोकप्रिय मानी जाती हैं। जब जगन 2013 में भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में थे, तब शर्मिला ने आंध्र प्रदेश में पार्टी के लिए प्रचार करते हुए पदयात्रा की थी। उनके पिता भी पदयात्राएं किया करते थे। उन्होंने आंध्र प्रदेश में 2019 के विधानसभा चुनावों के दौरान जगन के लिए प्रचार किया, लेकिन उसके बाद वह शांत बनी रहीं।
अलग पावर सेंटर के खिलाफ जगनमोहन
हालांकि जब जगनमोहन मुख्यमंत्री बन गए उसके बाद शर्मिला को उनके साथ नहीं देखा गया। बताया गया कि शर्मिला पार्टी या सरकार में अपनी अलग जगह चाहती हैं। कई बार अटकलें लगीं कि वें राज्यसभा जाने की इच्छुक हैं या सरकार में मंत्री बनना चाहती हैं लेकिन न तो उन्हें ऊपरी सदन में भेजा गया और न ही मुख्यमंत्री ने उन्हें अपनी मंत्रिमंडल में जगह दी।
एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि जगनमोहन नहीं चाहते कि शर्मिला को पार्टी या सरकार में कोई जगह देकर एक अलग पावर सेंटर बनाया जाए, क्योंकि वाईएसआर की बेटी होने के नाते वे भी राज्य में लोकप्रिय हैं। उनके फॉलोअर्स बहुत हैं और लोगों से सीधे संपर्क में रहती हैं। इसलिए सबने माना था कि जगनमोहन के सत्ता संभालने के बाद उनका भी राजनीतिक कद बढ़ेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसलिए अब वह अलग राजनीतिक पार्टी बनाकर अपना करियर बनाना चाहती हैं। शर्मिला शादीशुदा हैं और एक ईसाई परिवार में ब्याही गई हैं। कहा जाता है कि अपने राजनीतिक उदय के बाद जगनमोहन ने अपनी मां और बहन को राजनीतिक चर्चाओं से दूर रखने की कोशिश की।
भाजपा की बी टीम होने का आरोप
भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों का दावा है कि शर्मिला के अलग राजनीतिक पार्टी बनाने के पीछे तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) का हाथ है। जो 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले सत्ता-विरोधी वोटों को विभाजित करने के लिए शर्मिला की पार्टी का इस्तेमाल करना चाहती है। हालांकि टीआरएस के भीतर कई लोग वाईएसआरटीपी को भाजपा की बी-टीम कह रहे है, जो रेड्डी समुदाय और ईसाई वोट बैंक का ध्रुवीकरण कर सकती है। टीआरएस तेलंगाना में प्रमुख राजनीतिक ताकत है। यहां कांग्रेस ने अपनी जमीन खो दी है और भाजपा यहां अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही है।