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Padma Shri: डॉ. रतन ने अंडमान की जारवा जनजाति को विलुप्त होने से बचाया था, अब पद्मश्री से होंगे सम्मानित
Thu, 26 Jan 2023 06:50 PM IST
गुलाम अहमद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पोर्ट ब्लेयर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पोर्ट ब्लेयर
Published by: गुलाम अहमद
Updated Thu, 26 Jan 2023 06:50 PM IST
सार
Dr Ratan Chandra Kar: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से पद्मश्री के लिए चुने गए डॉ. रतन ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उनके पास खुशी जताने के लिए शब्द नहीं हैं। उन्होंने यह उपलब्धि हासिल करने में उनकी मदद करने के लिए सभी को धन्यवाद दिया।
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Dr Ratan Chandra Kar
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के स्वास्थ्य अधिकारियों के हाथपांव फूल गए थे। इससे निपटने के लिए उन्होंने डॉ. रतन चंद्र कर की सेवा ली। अधिकारियों के कहने पर तत्कालीन चिकित्सा अधिकारी डॉ. रतन ने कदमतला गांव और लखरालुंगटा में जारवा जनजाति के लोगों के स्वास्थ्य की निगरानी की और उनका सफलतापूर्वक इलाज किया। बाद में उनके साथ घुल-मिल गए।
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खतरनाक धनुष और बाणों से लैस जारवा जनजाति के लोग अपनी उग्रता के लिए जाने जाते हैं और वे बाहरी लोगों को अपने क्षेत्र में घुसना पसंद नहीं करते हैं। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से पद्मश्री के लिए चुने गए डॉ. रतन ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उनके पास खुशी जताने के लिए शब्द नहीं हैं। उन्होंने यह उपलब्धि हासिल करने में उनकी मदद करने के लिए सभी को धन्यवाद दिया।
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डॉ. रतन की पत्नी अंजलि ने उनसे जारवा जनजाति के लोगों का इलाज करने की चुनौती स्वीकार करने और उन्हें विलुप्त होने से बचाने का आग्रह किया था। उस समय जारवा जनजाति को बचाना बड़ी चुनौती थी। हालांकि, उनके दोनों बेटों तनुमॉय और अनुमॉय अपने पिता की सुरक्षा को लेकर चिंता होने लगी, क्योंकि जारवा जनजाति के निवास क्षेत्र में प्रवेश करने को लेकर कई जोखिम थे। हालांकि, गहन विचार विचार करने के बाद डॉ. रतन ने यह महसूस करते हुए इस चुनौती को स्वीकार किया कि उन्हें जीवन में ऐसा अवसर कभी नहीं मिलेगा। उनके पास पहले से ही नगालैंड में कोन्याक जनजाति के बीच सेवा के दौरान ऐसी स्थिति को संभालने का अनुभव था।
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उन्होंने कहा, यह मेरे जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था जब मैं मध्य अंडमान में कदमतला के लिए रवाना हुआ, जो पोर्ट ब्लेयर से लगभग 120 किमी दूर है। कदमतला की यात्रा करते समय, मैं जारवा जनजाति के लोगों की संभावित प्रतिक्रिया के बारे में सोचकर थोड़ा घबराया हुआ था कि क्या वे मुझे स्वीकार करेंगे या मुझ पर हमला करेंगे? मैं ऊहापोह की स्थिति से गुजर रहा था, लेकिन उन्हें खसरा व अन्य प्रकोप से बचाने के लिए चिकित्सा देने की आवश्यकता थी।
पांच घंटे से अधिक की हवाई यात्रा के बाद डॉ. रतन और उनकी टीम कदमतला जेटी पहुंची और जारवा जनजाति के इलाकों में से एक लखरालुंगटा तक एक छोटी नाव से पहुंचे। उन्होंने कहा, मैं जारवा जनजाति के लोगों के लिए उपहार के रूप में नारियल और केले ले गया था। मैंने एक समूह को समुद्र तट पर खड़ा देखा, जो हमें देख रहा था। उनमें से कुछ धनुष और तीर से लैस थे और तैरकर नाव के करीब आ गए। मैं नाव से उतरा और धीरे-धीरे उनकी ओर चलने लगा।
उन्होंने कहा कि मैं डरा हुआ था, चिंतित था, लेकिन उत्साहित था। मैंने एक झोपड़ी देखी और उसमें से धुआं निकल रहा था। जैसे ही मैं झोपड़ी की ओर धीरे-धीरे चल रहा था, बाकी जारवा मेरे पीछे-पीछे चलने लगे। मैंने झोपड़ियों में से एक में प्रवेश किया और एक घायल जारवा को देखा। जंगली सूअर का शिकार करने के दौरान वह घायल हो गया। मैंने कुछ दवाई लगाई और मरहम-पट्टी की और फिर हम कदमतला आ गए।
जारवा समुदाय के दोस्त बन गए डॉ. रतन
डॉ. रतन ने बताया कि अगले दिन जब वह अपनी टीम के साथ लखरालुंगटा गए तो उन्होंने उनके व्यवहार में बदलाव देखा। उन्होंने कहा कि जनजाति समुदाय के लोग उनका स्वागत करना चाहते थे, क्योंकि जिस घायल जारवा का उन्होंने इलाज किया था, दवा ने उस पर बहुत असर हुआ था। बच्चों ने भी उन्हें गले लगाया था। इसके बाद से जारवा समुदाय के लोगों ने उन्हें और उनकी टीम के चार अन्य सदस्यों को दोस्त की तरह मानना शुरू कर दिया।
उन्होंने कहा कि हमने जारवा समुदाय के गंभीर मरीजों को कदमताला स्वास्थ्य केंद्रों में शिफ्ट किया, जबकि बाकी लोगों का इलाज लखरालुंगटा में किया गया। उन दिनों डॉ. रतन ने चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में कड़ी मेहनत की और जारवा सामुदाय के लोगों को बचाना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें जारवा सामुदाय को 1998-99 में खसरा प्रकोप से विलुप्त होने की कगार से बचाने का श्रेय दिया जाता है।