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AMU Minority Status: संसद की ओर से संशोधित अधिनियम कैसे स्वीकार नहीं कर सकती सरकार? कोर्ट का 'सुप्रीम' सवाल

Wed, 24 Jan 2024 06:52 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: निर्मल कांत Updated Wed, 24 Jan 2024 06:52 PM IST
सार

AMU Minority Status: एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि वह केंद्र सरकार को यह कहते हुए नहीं सुन सकती कि संसद ने जो संशोधन किया है, वह उससे सहमत नहीं है। सरकार को उसके साथ खड़ा रहना होगा।

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AMU minority status: How can Centre not accept 1981 amendment by Parliament, asks SC
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के अल्पसंख्यक दर्जे के मामले पर बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हुई। शीर्ष अदालत ने केंद्र के रुख पर हैरानी जताई और कहा कि संसद ने कानून में जो बदलाव किया है, सरकार को उसके साथ खड़ा होना होगा। 

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मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात न्यायाधीशों की पीठ ने मामले पर सुनवाई की। मामले पर दलीलों को सुनने के बाद पीठ ने कहा कि संविधान के अनुसार संसद एक ऐसा निकाय है, जो 'शाश्वत' (स्थायी), 'अविभाज्य' (जिसको बंटवारा नहीं  हो सकता), 'अविनाशी' (जिसको नष्ट न किया जा सके) है। 

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केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। सीजेआई ने उनसे पूछा, आप संसद द्वारा किए गए एक बदलाव (1981 के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन) को कैसे अस्वीकार कर सकते हैं? 

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न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने आगे कहा, 'सॉलिसिटर महोदय, यह संसद भारतीय संघ के तहत एक शाश्वत और अविनाशी निकाय है। भारत संघ के मामले का चाहे कोई भी सरकार प्रतिनिधित्व करती हो, लेकिन संसद शाश्वत, अविभाज्य और अविनाशी है।' उन्होंने आगे कहा, 'हम भारत सरकार को यह कहते हुए नहीं सुन सकते कि संसद ने जो संशोधन किया है, वह उससे सहमत नहीं है। आपको इसके साथ खड़ा रहना होगा।' 

संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जेबी  पारदीवाला, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा शामिल थे। मेहता ने उच्च न्यायालय के एक फैसले का हवाला दिया और कहा कि 1981 के संशोधित कानून को निरस्त को किया गया था। इसलिए, यह अब कानून की किताब में नहीं है। उन्होंने कहा, सरकार ने एक हलफनामा दाखिल किया है। 

वहीं, एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल पेश हुए। उन्होंने जिक्र किया कि कैसे अटॉर्नी जनरल ने आपातकाल के प्रावधान का बचाव किया था। उन्होंने कहा, मैं उस समय अदालत में ही बैठा था, जब अटॉर्नी जनरल नीरेन डे  यहा खड़े थे और बहस कर रहे थे कि जो किया जा रहा है वह सही है। मैंने आपातकाल के प्रवाधान का बचाव किया था। क्यों? क्योंकि वह अन्यथा नहीं कहते थे। 
  

इसके बाद मेहता ने कहा, अंतर यह है कि तत्कालीन अटॉर्नी जनरल ऐसी स्थिति में नहीं थे। जिसमें उच्च न्यायालय ने इसे (1981 के संशोधन) रद्द कर दिया हो और कानून की किताब में यह प्रावधान मौजूद न हो। इस मामले में दलीलें अधूरी रहीं। अगली सुनवाई तीस जनवरी को होगी। 

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