{"_id":"63be4eed14ff5d60c164e6d1","slug":"amar-ujala-foundation-interview-with-unicef-india-climate-change-expert-nirma-bora","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Interview: जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ ने कहा- अब ज्यादा वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद, इसे युवाओं तक पहुंचाने की जरूरत","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Interview: जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ ने कहा- अब ज्यादा वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद, इसे युवाओं तक पहुंचाने की जरूरत
Wed, 11 Jan 2023 11:32 AM IST
शिवेंद्र तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Wed, 11 Jan 2023 11:32 AM IST
सार
UNICEF-AUF Interview: जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ और यूनिसेफ इंडिया की सलाहकार निरमा बोरा बता रही हैं कि जलवायु परिवर्तन पर अभी क्या स्थिति है और आगे इस चुनौती का सामना करने के लिए क्या करने की जरूरत है...
विज्ञापन
निरमा बोरा, युनिसेफ
- फोटो : Amar Ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
जलवायु परिवर्तन एक ऐसा मुद्दा है, जिसके बारे में विशेषज्ञ समय-समय पर चिंता तो जाहिर करते हैं, लेकिन ज्यादातर आबादी इसकी चुनौतियों और इससे उपजे खतरों को लेकर अनभिज्ञ रहती है। इसी चुनौती को देखते हुए यूनिसेफ इंडिया विशेषकर युवाओं, बच्चों और महिलाओं के बीच काम करता है ताकि जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरों के प्रति जागरुकता फैलाई जा सकती है। इस इंटरव्यू में जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ और यूनिसेफ इंडिया की सलाहकार निरमा बोरा इसी मुद्दे पर प्रकाश डाल रही हैं। पढ़ें उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...
विज्ञापन
1. जलवायु परिवर्तन और इससे जुड़े विषय आज के समय में खासे महत्वपूर्ण हो गए हैं। इन पर सरकारों द्वारा किए जा रहे कार्यों को आप किस तरह से देखती हैं?
निरमा बोरा: 'वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को लेकर भारत की प्रतिबद्धता इन बातों से स्पष्ट होती है कि भारत औपचारिक रूप से 1993 में UNFCCC में शामिल हुआ। 2008 में भारत सरकार ने जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी) शुरू की, जिसके बाद राज्यों ने जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्य योजना (एसएपीसीसी) शुरू की। भारत क्योटो प्रोटोकॉल की पहली और दूसरी प्रतिबद्धता अवधि का पक्षकार बन गया, लेकिन संबद्ध देश न होने के नाते उसके सामने लक्ष्य नहीं थे। प्रोटोकॉल का अनुमोदन करने के बाद भारत ने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई है।'
'भारत ने 2015 में COP 21 (पेरिस समझौते) में प्रस्तुत राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) के माध्यम से 2030 तक की प्रतिबद्धताएं बताई थीं। 2022 में भारत ने इसे अपडेट किया था।'
'यह स्वीकार करते हुए कि जलवायु परिवर्तन में जीवन शैली की एक बड़ी भूमिका है, भारत के प्रधानमंत्री ने COP26 में वैश्विक समुदाय के सामने LiFE या लाइफस्टाइल फॉर एनवायरमेंट को प्रस्तावित किया है। LiFE एक अभियान है, जो सात श्रेणियों में 75 व्यक्तिगत LiFE कार्यों की पहचान करता है। मिशन LiFE भारत के NDCs में भी शामिल है। यह 2070 तक नेट-जीरो तक पहुंचने के भारत के दीर्घकालिक लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक कदम है। भारत ने आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।'
निरमा बोरा: 'वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को लेकर भारत की प्रतिबद्धता इन बातों से स्पष्ट होती है कि भारत औपचारिक रूप से 1993 में UNFCCC में शामिल हुआ। 2008 में भारत सरकार ने जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी) शुरू की, जिसके बाद राज्यों ने जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्य योजना (एसएपीसीसी) शुरू की। भारत क्योटो प्रोटोकॉल की पहली और दूसरी प्रतिबद्धता अवधि का पक्षकार बन गया, लेकिन संबद्ध देश न होने के नाते उसके सामने लक्ष्य नहीं थे। प्रोटोकॉल का अनुमोदन करने के बाद भारत ने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई है।'
'भारत ने 2015 में COP 21 (पेरिस समझौते) में प्रस्तुत राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) के माध्यम से 2030 तक की प्रतिबद्धताएं बताई थीं। 2022 में भारत ने इसे अपडेट किया था।'
'यह स्वीकार करते हुए कि जलवायु परिवर्तन में जीवन शैली की एक बड़ी भूमिका है, भारत के प्रधानमंत्री ने COP26 में वैश्विक समुदाय के सामने LiFE या लाइफस्टाइल फॉर एनवायरमेंट को प्रस्तावित किया है। LiFE एक अभियान है, जो सात श्रेणियों में 75 व्यक्तिगत LiFE कार्यों की पहचान करता है। मिशन LiFE भारत के NDCs में भी शामिल है। यह 2070 तक नेट-जीरो तक पहुंचने के भारत के दीर्घकालिक लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक कदम है। भारत ने आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।'
विज्ञापन
विज्ञापन
2. ये ऐसे मुद्दे हैं, जो किसी एक देश के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए अहमियत रखते हैं। यूनिसेफ समाधान की दिशा में क्या भूमिका निभा रहा है?
'यूनिसेफ अलग-अलग तरीकों से क्लाइमेट एक्शन को समर्थन देने और आगे ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसमें पहला है- जलवायु और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ और आपदा जोखिम को कम करने वाले उपायों को शामिल करना। इनमें जल जीवन मिशन (JJM) और स्वच्छ भारत मिशन (SBM) जैसे प्रमुख कार्यक्रम और कायाकल्प, स्वच्छ विद्यालय पुरस्कार (SVP) जैसी पहल शामिल है। टिकाऊ जल आपूर्ति, ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन, मल कीचड़ प्रबंधन पर सरकारी अधिकारियों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम भी चलाए जाते हैं। यूनिसेफ केंद्रीय और राज्य बोर्डों के लिए स्कूल पाठ्यक्रम, शिक्षकों और छात्रों के लिए प्रशिक्षण मॉड्यूल भी तैयार करता है।'
'जलवायु के मुद्दे पर यूनिसेफ WASH यानी वाटर, सेनिटेशन एंड हाइजीन प्रोग्राम चलाता है। इसमें सोलर रन वाटर सप्लाई, ग्रे वाटर सोक पिट्स, घरेलू ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, संस्थानों में जलवायु अनुकूल और पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ स्कूल और आंगनवाड़ी को बढ़ावा देना शामिल है। यूनिसेफ बच्चों को भी जलवायु शिक्षा देने के मकसद से जलवायु-पर्यावरण पाठ्यक्रम, कॉमिक बुक्स और वाटर बजट प्रशिक्षण मॉड्यूल बनाता है।'
'स्वास्थ्य के मुद्दे की बात करें तो यूनिसेफ चयनित राज्यों में स्वास्थ्य सुविधाओं (एचसीएफ) के सोलराइजेशन पर पायलट प्रोजेक्ट चलाता है। स्वच्छ और हरित स्वास्थ्य सुविधाओं पर दिशा-निर्देश विकसित करता है और प्रसारित करता है, जिसमें क्षमता निर्माण, योजना, पायलटिंग मॉडल ग्रीन और क्लीन एचसीएफ शामिल हैं।'
'यूनिसेफ इंडिया ने अन्य भागीदारों के साथ पानी, सफाई, स्वच्छता (WASH) पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर काम कर रहे दो युवा आधारित नेटवर्क का गठन किया है। ये हैं यूथ4वाटर और महा यूथ फॉर क्लाइमेट एक्शन (MYCA)। यूथ4वाटर नेटवर्क पहले से ही 5 लाख युवाओं तक पहुंच चुका है। अब इंटरैक्टिव प्रशिक्षण, उद्यमिता समर्थन, नवाचार चुनौती और सलाह-मशविरे के माध्यम से 10 लाख युवाओं से जुड़ना चाहता है। MYCA के साथ, यूनिसेफ क्लाइमेट एक्शन प्लानिंग, रिपोर्टिंग और एडवोकेसी पर प्रत्यक्ष और ऑनलाइन माध्यम से 350 युवाओं तक पहुंच गया है।'
'यूनिसेफ अलग-अलग तरीकों से क्लाइमेट एक्शन को समर्थन देने और आगे ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसमें पहला है- जलवायु और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ और आपदा जोखिम को कम करने वाले उपायों को शामिल करना। इनमें जल जीवन मिशन (JJM) और स्वच्छ भारत मिशन (SBM) जैसे प्रमुख कार्यक्रम और कायाकल्प, स्वच्छ विद्यालय पुरस्कार (SVP) जैसी पहल शामिल है। टिकाऊ जल आपूर्ति, ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन, मल कीचड़ प्रबंधन पर सरकारी अधिकारियों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम भी चलाए जाते हैं। यूनिसेफ केंद्रीय और राज्य बोर्डों के लिए स्कूल पाठ्यक्रम, शिक्षकों और छात्रों के लिए प्रशिक्षण मॉड्यूल भी तैयार करता है।'
'जलवायु के मुद्दे पर यूनिसेफ WASH यानी वाटर, सेनिटेशन एंड हाइजीन प्रोग्राम चलाता है। इसमें सोलर रन वाटर सप्लाई, ग्रे वाटर सोक पिट्स, घरेलू ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, संस्थानों में जलवायु अनुकूल और पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ स्कूल और आंगनवाड़ी को बढ़ावा देना शामिल है। यूनिसेफ बच्चों को भी जलवायु शिक्षा देने के मकसद से जलवायु-पर्यावरण पाठ्यक्रम, कॉमिक बुक्स और वाटर बजट प्रशिक्षण मॉड्यूल बनाता है।'
'स्वास्थ्य के मुद्दे की बात करें तो यूनिसेफ चयनित राज्यों में स्वास्थ्य सुविधाओं (एचसीएफ) के सोलराइजेशन पर पायलट प्रोजेक्ट चलाता है। स्वच्छ और हरित स्वास्थ्य सुविधाओं पर दिशा-निर्देश विकसित करता है और प्रसारित करता है, जिसमें क्षमता निर्माण, योजना, पायलटिंग मॉडल ग्रीन और क्लीन एचसीएफ शामिल हैं।'
'यूनिसेफ इंडिया ने अन्य भागीदारों के साथ पानी, सफाई, स्वच्छता (WASH) पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर काम कर रहे दो युवा आधारित नेटवर्क का गठन किया है। ये हैं यूथ4वाटर और महा यूथ फॉर क्लाइमेट एक्शन (MYCA)। यूथ4वाटर नेटवर्क पहले से ही 5 लाख युवाओं तक पहुंच चुका है। अब इंटरैक्टिव प्रशिक्षण, उद्यमिता समर्थन, नवाचार चुनौती और सलाह-मशविरे के माध्यम से 10 लाख युवाओं से जुड़ना चाहता है। MYCA के साथ, यूनिसेफ क्लाइमेट एक्शन प्लानिंग, रिपोर्टिंग और एडवोकेसी पर प्रत्यक्ष और ऑनलाइन माध्यम से 350 युवाओं तक पहुंच गया है।'
3. भारत में जलवायु परिवर्तन के क्या प्रमाण हैं? जलवायु परिवर्तन के प्रति भारत कितना संवेदनशील है?
'जलवायु परिवर्तन के प्रमाणों की बात करें तो दुनिया 1850-1900 की तुलना में पिछले दशक (2011-2020) में 1 डिग्री सेल्सियस (डीसी) ज्यादा गर्म हुई है। यानी सतह के तापमान में वृद्धि हुई है। भारत 1901-2018 के बीच 0.7 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हुआ है। तापमान में वृद्धि ने हिमनदों के पीछे हटने, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और तीव्र मौसम की घटनाओं में तेजी लाई है। गंगोत्री ग्लेशियर 1935 से 2000 तक लगभग 20 मीटर/वर्ष के औसत से तेजी से पीछे हटता दिखा रहा था। उत्तर हिंद महासागर में 1993-2017 तक समुद्र के स्तर में 3.3 मिमी/वर्ष की वृद्धि देखी गई है।'
'तीव्र मौसम की घटनाओं के मामले में भारत अतिसंवेदनशील क्षेत्र में आता है। यहां 2019 में लगभग 2,200 लोगों की मृत्यु हुई थी और यह सातवां सबसे अधिक प्रभावित देश था। इसके अलावा, सीईईडब्ल्यू द्वारा 2021 के एक अध्ययन में पाया गया कि भारत में 20 में से 17 लोगों के सामने अत्यधिक हाइड्रोमेट आपदाओं का जोखिम है। हाल के शोध से पता चलता है कि तापमान में प्रत्येक 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के बाद E-Coli से संबंधित डायरिया में 8 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है। बदलते मौसम में वायुजनित एलर्जी बढ़ जाती है। वायु की गुणवत्ता में कमी के कारण श्वसन संबंधी समस्याएं और एलर्जी होती है, जिससे बच्चे प्रभावित होते हैं।'
'जलवायु परिवर्तन के प्रमाणों की बात करें तो दुनिया 1850-1900 की तुलना में पिछले दशक (2011-2020) में 1 डिग्री सेल्सियस (डीसी) ज्यादा गर्म हुई है। यानी सतह के तापमान में वृद्धि हुई है। भारत 1901-2018 के बीच 0.7 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हुआ है। तापमान में वृद्धि ने हिमनदों के पीछे हटने, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और तीव्र मौसम की घटनाओं में तेजी लाई है। गंगोत्री ग्लेशियर 1935 से 2000 तक लगभग 20 मीटर/वर्ष के औसत से तेजी से पीछे हटता दिखा रहा था। उत्तर हिंद महासागर में 1993-2017 तक समुद्र के स्तर में 3.3 मिमी/वर्ष की वृद्धि देखी गई है।'
'तीव्र मौसम की घटनाओं के मामले में भारत अतिसंवेदनशील क्षेत्र में आता है। यहां 2019 में लगभग 2,200 लोगों की मृत्यु हुई थी और यह सातवां सबसे अधिक प्रभावित देश था। इसके अलावा, सीईईडब्ल्यू द्वारा 2021 के एक अध्ययन में पाया गया कि भारत में 20 में से 17 लोगों के सामने अत्यधिक हाइड्रोमेट आपदाओं का जोखिम है। हाल के शोध से पता चलता है कि तापमान में प्रत्येक 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के बाद E-Coli से संबंधित डायरिया में 8 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है। बदलते मौसम में वायुजनित एलर्जी बढ़ जाती है। वायु की गुणवत्ता में कमी के कारण श्वसन संबंधी समस्याएं और एलर्जी होती है, जिससे बच्चे प्रभावित होते हैं।'
4. क्या आपको लगता है कि लोग इन मुद्दों को गंभीरता से नहीं लेते? क्या जागरूकता की कमी इसकी वजह है?
'वैज्ञानिक प्रमाणों, नुकसान के अनुमानों और साक्ष्यों के प्रसार के साथ-साथ व्यापक समाधान के संदर्भ में जलवायु परिवर्तन एक उभरता हुआ विषय है। ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीनहाउस प्रभाव पर वर्ष 1988 में सार्वजनिक बहस शुरू हुई थी। 1994 में जब यूएनएफसीसीसी 'ग्रीनहाउस गैस सांद्रता को स्थिर करने' के लिए प्रभाव में आया, तब कम वैज्ञानिक सबूत थे, लेकिन अब काफी प्रमाण मौजूद हैं।'
'आईपीसीसी एआर1 पहली बार 1991 में प्रकाशित हुआ था, तब जलवायु परिवर्तन के समय, परिणाम और क्षेत्रीय पैटर्न को लेकर अनुमानों में कई तरह की अनिश्चितताएं थीं। 2021 में जब AR6 प्रकाशित हुआ, तब तक IPCC स्पष्ट रूप से कह चुका था कि मानव प्रभाव ने वातावरण को गर्म कर दिया है। इसलिए अब अधिक से अधिक लोग यह महसूस कर रहे हैं और स्वीकार कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन वास्तविक है और यह असंख्य तरीकों से जीवन को प्रभावित कर रहा है। जैसा कि अब वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं, इससे जुड़ी जानकारी को बच्चों, युवाओं, महिलाओं और पुरुषों को आसान तरीके से समझाने की जरूरत है। यही मिशन LiFE का भी उद्देश्य है।'
'2020 में हुआ यूनिसेफ सर्वेक्षण कहता है कि 65% भारतीय युवाओं ने स्कूल में जलवायु परिवर्तन के बारे में सीखा था। 64% भारतीय युवा जलवायु परिवर्तन की व्याख्या नहीं कर सके और 70% युवाओं ने संकेत दिया कि वे जलवायु परिवर्तन और भविष्य के लिए इसके मायनों के बारे में चिंतित हैं। 29% लोगों का मानना था कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर ध्यान देने के लिए बच्चों को आगे आना चाहिए। इससे साफ तौर पर पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन के बारे में बोलने और इसके समाधान का सक्रिय हिस्सा बनने के लिए ज्ञान और विश्वास के बीच की खाई को पाटने की आवश्यकता है। आने वाले वर्षों में यूनिसेफ का यही लक्ष्य है।'
'वैज्ञानिक प्रमाणों, नुकसान के अनुमानों और साक्ष्यों के प्रसार के साथ-साथ व्यापक समाधान के संदर्भ में जलवायु परिवर्तन एक उभरता हुआ विषय है। ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीनहाउस प्रभाव पर वर्ष 1988 में सार्वजनिक बहस शुरू हुई थी। 1994 में जब यूएनएफसीसीसी 'ग्रीनहाउस गैस सांद्रता को स्थिर करने' के लिए प्रभाव में आया, तब कम वैज्ञानिक सबूत थे, लेकिन अब काफी प्रमाण मौजूद हैं।'
'आईपीसीसी एआर1 पहली बार 1991 में प्रकाशित हुआ था, तब जलवायु परिवर्तन के समय, परिणाम और क्षेत्रीय पैटर्न को लेकर अनुमानों में कई तरह की अनिश्चितताएं थीं। 2021 में जब AR6 प्रकाशित हुआ, तब तक IPCC स्पष्ट रूप से कह चुका था कि मानव प्रभाव ने वातावरण को गर्म कर दिया है। इसलिए अब अधिक से अधिक लोग यह महसूस कर रहे हैं और स्वीकार कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन वास्तविक है और यह असंख्य तरीकों से जीवन को प्रभावित कर रहा है। जैसा कि अब वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं, इससे जुड़ी जानकारी को बच्चों, युवाओं, महिलाओं और पुरुषों को आसान तरीके से समझाने की जरूरत है। यही मिशन LiFE का भी उद्देश्य है।'
'2020 में हुआ यूनिसेफ सर्वेक्षण कहता है कि 65% भारतीय युवाओं ने स्कूल में जलवायु परिवर्तन के बारे में सीखा था। 64% भारतीय युवा जलवायु परिवर्तन की व्याख्या नहीं कर सके और 70% युवाओं ने संकेत दिया कि वे जलवायु परिवर्तन और भविष्य के लिए इसके मायनों के बारे में चिंतित हैं। 29% लोगों का मानना था कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर ध्यान देने के लिए बच्चों को आगे आना चाहिए। इससे साफ तौर पर पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन के बारे में बोलने और इसके समाधान का सक्रिय हिस्सा बनने के लिए ज्ञान और विश्वास के बीच की खाई को पाटने की आवश्यकता है। आने वाले वर्षों में यूनिसेफ का यही लक्ष्य है।'