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Amar Ujala Batras: थिएटर से लिविंग रूम तक, OTT का ट्रेंड कैसे-कितना बदल रहा मनोरंजन का तरीका? देखें पॉडकास्ट
Sat, 11 Oct 2025 08:12 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 11 Oct 2025 08:12 PM IST
सार
एंकर और पत्रकार नंदिता कुदेशिया ने इस हफ्ते बतरस में इसी ओटीटी को लेकर दो विशेषज्ञों से बात की और जाना की आखिर यह सेवा है क्या और इसे लेकर जो बातें होती हैं, उनमें क्या सच्चाई और कितना झूठ।
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अमर उजाला बतरस
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
अमर उजाला बतरस एक और हफ्ते आम लोगों की जिंदगी से जुड़े अहम मुद्दे के साथ हाजिर है। इस हफ्ते पॉडकास्ट में चर्चा हुई डिजिटल होती दुनिया के एक ऐसे पहलू की, जिसे मौजूदा समय में लोग मनोरंजन के क्षेत्र में असीम संभावनाओं के साथ देखते हैं। हालांकि, एक और वर्ग है, जो इसे आशंका भरी नजरों से भी देखता है। यह विषय है- ओवर द टॉप यानी ओटीटी सेवाओं का। हालिया दिनों में ओटीटी का प्रचार-प्रसार जिस तरह से बढ़ा है, अब शायद ही कोई घर होगा जहां टीवी हो और ओटीटी न हो। हो सकता है कि टीवी भले ही न हो, लेकिन एक मोबाइल और उसमें ओटीटी की कोई न कोई एप जरूर हो। यानी आम व्यक्ति का जीवन अब मनोरंजन के इस साधन से किसी न किसी तरह जुड़ा है।
एंकर और पत्रकार नंदिता कुदेशिया ने इस हफ्ते बतरस में इसी ओटीटी को लेकर दो विशेषज्ञों से बात की और जाना की आखिर यह सेवा है क्या और इसे लेकर जो बातें होती हैं, उनमें क्या सच्चाई और कितना झूठ।
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एंकर और पत्रकार नंदिता कुदेशिया ने इस हफ्ते बतरस में इसी ओटीटी को लेकर दो विशेषज्ञों से बात की और जाना की आखिर यह सेवा है क्या और इसे लेकर जो बातें होती हैं, उनमें क्या सच्चाई और कितना झूठ।
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इस पूरे पॉडकास्ट को आप शनिवार रात आठ बजे अमर उजाला के सभी सोशल मीडिया हैंडल्स पर सुन सकते हैं।
नंदिता कुदेशिया ने अमर उजाला के स्टूडियो में जिन दो विशेषज्ञों से चर्चा की, उनमें फिल्म क्रिटिक और पत्रकार विष्णु शर्मा और मुक्ता आर्ट्स के संजय घई शामिल रहे। दोनों ही विशेषज्ञों ने कई अहम सवालों के जवाब दिए। मसलन- थिएटर की पाबंदी से आगे, ओटीटी की उड़ान कैसे संभव हुई? सिनेमा हॉल कैसे वेब सीरीज के साथ लीविंग रुम तक शिफ्ट हुआ? ओटीटी के ट्रेंड से क्या क्या बदल गया? और समय के साथ ओटीटी ट्रेंड के फायदे-नुकसान क्या हैं?
नंदिता कुदेशिया ने अमर उजाला के स्टूडियो में जिन दो विशेषज्ञों से चर्चा की, उनमें फिल्म क्रिटिक और पत्रकार विष्णु शर्मा और मुक्ता आर्ट्स के संजय घई शामिल रहे। दोनों ही विशेषज्ञों ने कई अहम सवालों के जवाब दिए। मसलन- थिएटर की पाबंदी से आगे, ओटीटी की उड़ान कैसे संभव हुई? सिनेमा हॉल कैसे वेब सीरीज के साथ लीविंग रुम तक शिफ्ट हुआ? ओटीटी के ट्रेंड से क्या क्या बदल गया? और समय के साथ ओटीटी ट्रेंड के फायदे-नुकसान क्या हैं?
बतरस में विशेषज्ञों ने न सिर्फ इन सवालों के जवाब दिए, बल्कि मौजूदा समय में ओटीटी में सेंसरशीप की कितनी जरूरत हो गई है इसकी भी जानकारी दी। इसके अलावा A रेटेड और UA रेटेड की लकीर को लेकर भी बात की। दोनों ने बताया कि सिनेमा हॉल में फिल्म देखने का क्रेज कितना बदला है और ओटीटी से फिल्मों की सफलता अब कैसे तय हो रही है
बातचीत के दौरान विशेषज्ञों ने दो अहम चीजों की भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ओटीटी ने फिल्म निर्देशन का पैटर्न कैसे बदल दिया है। साथ ही ओटीटी से 3 घंटे की फिल्म वाले ट्रेंड को कैसे बदलने पर मजबूर किया। ओटीटी से विश्व फिल्मी दुनिया सिमट सी गई है सही है या गलत और थिएटर-ओटीटी की डील कैसे की जाती है।
बातचीत के दौरान विशेषज्ञों ने दो अहम चीजों की भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ओटीटी ने फिल्म निर्देशन का पैटर्न कैसे बदल दिया है। साथ ही ओटीटी से 3 घंटे की फिल्म वाले ट्रेंड को कैसे बदलने पर मजबूर किया। ओटीटी से विश्व फिल्मी दुनिया सिमट सी गई है सही है या गलत और थिएटर-ओटीटी की डील कैसे की जाती है।
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