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Amar Ujala Batras: किस्सा कहने से अलग है 'दास्तानगोई', क्या है यह कला, इससे कैसे जुड़ सकते हैं लोग

Sat, 28 Jun 2025 08:00 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sat, 28 Jun 2025 08:00 PM IST
सार

मशहूर एंकर और पत्रकार ऋचा अनिरुद्ध ने इस हफ्ते दास्तानगोई की कला पर कुछ अनछुए पहलुओं पर चार विशेषज्ञों से चर्चा की। इस पॉडकास्ट को आप अमर उजाला के सोशल मीडिया हैंडल्स पर देख सकते हैं।

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Amar Ujala Batras Dastangoi know the Art form with Anchor Richa Anirudh Special news
अमर उजाला बतरस। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

अमर उजाला बतरस एक और हफ्ते नए एपिसोड के साथ हाजिर है। इस हफ्ते पॉडकास्ट पर चर्चा का विषय है- दास्तानगोई। कहा जाता है कि दास्तनागोई एक कला है। ऐसी कला जो आज से कई सौ साल पहले अरब दुनिया से शुरू हुई और देखते ही देखते पूरी दुनिया में प्रचलित हो गई। शौर्य और साहस के कार्यों के इर्द-गिर्द बुनी गईं ये कहानियां अलग-अलग परंपराओं तक फैलीं, हालांकि इन्हें असल लोकप्रियता मिली 19वीं सदी के भारत में। तब दास्तानगोई उर्दू भाषा से मिली और उत्तर भारत में खासा जानी पहचानी गईं। हालांकि, जैसे-जैसे आधुनिक काल पूरी दुनिया में फैला, वैसे-वैसे भारत में यह कला अपने खात्मे की तरफ बढ़ चली। 
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हालांकि, अब एक बार फिर उत्तर भारत में इस कला पर प्रमुखता से चर्चाएं होने लगी हैं। मशहूर एंकर और पत्रकार ऋचा अनिरुद्ध ने इस हफ्ते दास्तानगोई को लेकर कुछ अहम पहलुओं पर पॉडकास्ट में चार विशेषज्ञों से चर्चा की। दास्तानगोई की कला को आगे बढ़ाने वाले दास्तानगो- हिमांशु वाजपेयी, फौजिया, प्रज्ञा और रितेश ने ऋचा के सामने अपने विचार रखे।
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इस पूरे पॉडकास्ट को आप शनिवार रात आठ बजे अमर उजाला के सभी सोशल मीडिया हैंडल्स पर सुन सकते हैं।  

ऋचा अनिरुद्ध ने अमर उजाला के स्टूडियो में जिन तीन विशेषज्ञों से चर्चा की, उन्होंने कई अहम सवालों के जवाब दिए। मसलन- दास्तानगोई की कला क्या होती है? कब शुरू हुई दास्तानगोई और कितने साल पुरानी है ये कला? क्या दास्तानगोई को कमर्शियल आर्ट के रूप में देख सकते हैं? 2005 में 80 साल बाद जब ये फिर शुरू हुई तो लोगों की क्या प्रतिक्रिया थी? आप सब दास्तानगो इस कला से कैसे जुड़े? दास्तानगोई में कलाकार सफेद कपड़े क्यों पहनते हैं? कितने दास्तान आप सब एक बार में याद कर लेते हैं? क्या जिनको उर्दू नहीं आती वो आसानी से दास्तानगोई समझ सकते हैं? इत्यादि।

बतरस में विशेषज्ञों ने न सिर्फ इस कला की बारीकियां समझाई, बल्कि इससे जुड़े कुछ और सवालों के तर्कपूर्ण जवाब भी दिए। साथ ही यह भी बताया कि दास्तानगोई की यात्रा कहां तक पहुंची है और आगे कैसी संभावनाएं हैं और अगर नए लोग यदि इस कला से जुड़ना चाहें तो वो क्या करें? इसी के साथ पॉडकास्ट में मौजूद दास्तानगो ने वह किस्से भी बताए, जो उन्हें याद रह गए। 
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