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एयरसेल-मैक्सिस मामला : चिदंबरम को राहत, कार्ति की याचिका पर तुरंत सुनवाई से इनकार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 01 Nov 2018 10:13 AM IST
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कार्ति चिदंबरम
- फोटो : ANI
दिल्ली की एक अदालत ने गुरुवार को एयरसेल-मैक्सिस मामले में सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा दर्ज प्राथमिकियों में पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी. चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति चिदंबरम को गिरफ्तारी से मिली छूट की अवधि 26 नवंबर तक के लिए बढ़ा दी।
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सीबीआई और ईडी की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सीबीआई के विशेष न्यायाधीश ओ.पी.सैनी से कहा, ‘‘हमें एक समय-सीमा में काम पूरा करना है और वह (पी. चिदंबरम) सहयोग नहीं कर रहे हैं।’’
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उन्होंने अदालत से यह भी कहा कि अग्रिम जमानत के लिए पी. चिदंबरम की अर्जी पर सीबीआई अपना जवाब बृहस्पतिवार को दायर करेगी।
सुप्रीम कोर्ट का तुरंत सुनवाई से इनकार
वहीं दूसरी तरफ, उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम के पुत्र कार्ति चिदंबरम की विदेश जाने की अनुमति मांगने वाली याचिका पर तुरंत सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कार्ति के खिलाफ आईएनएक्स मीडिया मामले में आपराधिक मामला दर्ज है।
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प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति यू. यू. ललित और न्यायमूर्ति के. एम. जोसेफ की पीठ ने कहा कि कार्ति चिदंबरम का विदेश जाना कोई जरूरी मुद्दा नहीं है जिसकर तुरंत सुनवाई की जरूरत हो। पीठ ने कहा, ‘कार्ति चिदंबरम का विदेश जाना इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि उसे अन्य मामलों पर तरजीह दी जाए।’ तुरंत सुनवाई से इंकार करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायाधीशों के पास उनकी क्षमता से ज्यादा मामले हैं।
चिदंबरम इस मामले की जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं
प्रवर्तन निदेशालय ने बुधवार को अदालत से कहा था कि एयरसेल-मैक्सिस धन शोधन मामले में पूर्व केन्द्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम को हिरासत में लेकर उनसे पूछताछ करना जरूरी है ताकि सच सामने आ सके। चिदंबरम इस मामले की जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं।
कांग्रेस नेता की अग्रिम जमानत याचिका का विरोध करते हुए अपने जवाब में निदेशालय ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ता के आचरण से जांच एजेंसी निष्कर्ष पर पहुंची है कि हिरासत में लेकर पूछताछ किये बिना आरोपों की सच्चाई तक नहीं पहुंचा जा सकता क्योंकि याचिकाकर्ता का रुख टालमटोल वाला और असहयोगात्मक रहा है।’’
उसने कहा कि उच्चतम न्यायालय में वकालत कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता, राज्य सभा सदस्य और पूर्व केंद्रीय के रूप में चिदंबरम बेहद प्रभावशाली और पहुंच वाले शख्स हैं। इसलिये इस बात की गंभीर आशंका है कि आवेदक मौजूदा मामले में गवाहों को प्रभावित करने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ कर सकता है।
सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा दायर एयरसेल-मैक्सिस मामले में अदालत ने आठ अक्टूबर को चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति को राहत देते हुए गिरफ्तारी से एक नवंबर तक अंतरिम संरक्षण दिया था। चिदंबरम ने निदेशालय के मामले में गिरफ्तारी से बचने के लिये इस साल 30 मई को अदालत में याचिका दायर कर संरक्षण की मांग की थी जिसमें उन्हें समय-समय पर राहत मिलती रही है।
30 मई से लगातार बढ़ रही जमानत अवधि
चिदंबरम को इस मामले में पहली बार 30 मई को गिरफ्तारी से राहत दी गई थी, जिसे बाद में अदालत ने कई बार बढ़ाया है। ईडी ने 25 अक्तूबर को आरोप पत्र दाखिल किया था, जिसमें चिदंबरम पर एयरसेल-मैक्सिस मनी लांड्रिंग मामले में विदेशी निवेशकों से गठजोड़ करते हुए अवैध तरीके से उनकी एफडीआई को अनुमति देने का आरोप लगाया गया था।
एजेंसी ने इस मामले में नौ आरोपियों के नाम शामिल किये हैं जिनमें चिदंबरम, एस भास्कररमन (कार्ती के सीए), वी श्रीनिवासन (एयरसेल के पूर्व सीईओ) भी हैं। उनके खिलाफ आरोप है कि मार्च 2006 में पूर्व मंत्री द्वारा विदेशी निवेशक ग्लोबल कम्युनिकेशन एंड सर्विसेज होल्डिंग्स लिमिटेड, मॉरीशस को अवैध एफआईएफबी अनुमोदन दिए जाने के बदले 1.16 करोड़ रुपये का धनशोधन किया गया। आरोप है कि यह मंजूरी भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति से जुड़े विभिन्न नियमों का उल्लंघन कर दी गयी।
ईडी ने दूसरा पूरक आरोपपत्र दायर करते हुए कहा कि 2006 में भारत सरकार की एफडीआई नीति के नियमों के तहत तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम को 600 करोड़ रूपए तक के विदेशी निवेश के प्रस्ताव को मंजूरी देने का अधिकार था। ग्लोबल कम्युनिकेशन एंड सर्विसेज होल्डिंग्स लिमिटेड का निवेश प्रस्ताव आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीईए) को भेजा जाना था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया और ‘साजिश’ के तहत चिदंबरम द्वारा मंजूरी दे दी गयी।
इसमें कहा गया है कि आरोपपत्र पर्याप्त भौतिक सबूतों पर आधारित है जो ईमेल के रूप में हैं तथा कार्ती और उसके सहयोगियों के जब्त डिजिटल उपकरणों से प्राप्त किए गए हैं। इस मामले में पहला आरोपपत्र 13 जून को कार्ती के खिलाफ दायर किया गया था जिसमें दावा किया गया था कि एयरसेल-मैक्सिस धनशोधन मामले में रिश्वत के रूप में दो कंपनियों को कथित तौर पर 1.16 करोड़ रूपये मिले थे। आरोपपत्र के अनुसार इन कंपनियों पर कार्ती का नियंत्रण था। ईडी की ओर से वकील एन के मट्टा और नीतेश राणा अदालत में उपस्थित हुए।
चिदंबरम को इस मामले में पहली बार 30 मई को गिरफ्तारी से राहत दी गई थी, जिसे बाद में अदालत ने कई बार बढ़ाया है। ईडी ने 25 अक्तूबर को आरोप पत्र दाखिल किया था, जिसमें चिदंबरम पर एयरसेल-मैक्सिस मनी लांड्रिंग मामले में विदेशी निवेशकों से गठजोड़ करते हुए अवैध तरीके से उनकी एफडीआई को अनुमति देने का आरोप लगाया गया था।
एजेंसी ने इस मामले में नौ आरोपियों के नाम शामिल किये हैं जिनमें चिदंबरम, एस भास्कररमन (कार्ती के सीए), वी श्रीनिवासन (एयरसेल के पूर्व सीईओ) भी हैं। उनके खिलाफ आरोप है कि मार्च 2006 में पूर्व मंत्री द्वारा विदेशी निवेशक ग्लोबल कम्युनिकेशन एंड सर्विसेज होल्डिंग्स लिमिटेड, मॉरीशस को अवैध एफआईएफबी अनुमोदन दिए जाने के बदले 1.16 करोड़ रुपये का धनशोधन किया गया। आरोप है कि यह मंजूरी भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति से जुड़े विभिन्न नियमों का उल्लंघन कर दी गयी।
ईडी ने दूसरा पूरक आरोपपत्र दायर करते हुए कहा कि 2006 में भारत सरकार की एफडीआई नीति के नियमों के तहत तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम को 600 करोड़ रूपए तक के विदेशी निवेश के प्रस्ताव को मंजूरी देने का अधिकार था। ग्लोबल कम्युनिकेशन एंड सर्विसेज होल्डिंग्स लिमिटेड का निवेश प्रस्ताव आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीईए) को भेजा जाना था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया और ‘साजिश’ के तहत चिदंबरम द्वारा मंजूरी दे दी गयी।
इसमें कहा गया है कि आरोपपत्र पर्याप्त भौतिक सबूतों पर आधारित है जो ईमेल के रूप में हैं तथा कार्ती और उसके सहयोगियों के जब्त डिजिटल उपकरणों से प्राप्त किए गए हैं। इस मामले में पहला आरोपपत्र 13 जून को कार्ती के खिलाफ दायर किया गया था जिसमें दावा किया गया था कि एयरसेल-मैक्सिस धनशोधन मामले में रिश्वत के रूप में दो कंपनियों को कथित तौर पर 1.16 करोड़ रूपये मिले थे। आरोपपत्र के अनुसार इन कंपनियों पर कार्ती का नियंत्रण था। ईडी की ओर से वकील एन के मट्टा और नीतेश राणा अदालत में उपस्थित हुए।