लॉकडाउन का असर: दिल्ली में सबसे कम तो कोलकाता में सबसे ज्यादा साफ हुई हवा
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कोरोना वायरस महामारी के चलते देश में लागू लॉकडाउन के दौरान दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और बंगलूरू में 30 से 50 फीसदी तक वायु प्रदूषण कम हुआ। हालांकि कोलकाता सबसे ज्यादा और दिल्ली में हवा सबसे कम साफ हुई। नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनसीएपी) के क्रियान्वयन की निगरानी कर रहे एनसीएपी ट्रैक से मिले रुझानों के अध्ययन से यह खुलासा हुआ है। साथ ही इससे पता चला कि 74 दिन के लॉकडाउन ने क्लीन एयर प्रोग्राम के 2024 तक के लक्ष्य का 95 फीसदी हासिल कर लिया।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि वायु प्रदूषण के बेहतर प्रबंधन के लिए नगरों की कार्ययोजना को रणनीति और रवैये के हिसाब से और भी व्यापक तथा मजबूत बनाने की जरूरत है। रेस्पिाइरर लिविंग साइसेंज और कार्बन कॉपी के शोधकर्ताओं ने पाया कि लॉकडाउन में देश के प्रमुख शहरों में वायु प्रदूषण में खासी कमी आई। एनसीएपी ट्रैकर योजना के तहत दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बंगलूरू में पीएम 2.5 और पीएम 10, नाइट्रोजन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, ओजोन, बेंजीन की सांद्रता की भी अध्ययन की गई।
इसमें पाया गया कि 25 मार्च से 8 जून के लॉकडाउन के दौरान महानगरों में वायु गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है। शहरों में पीएम को 2024 तक 20 से 30 प्रतिशत कर हवा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए केंद्र सरकार ने एनसीएपी लागू किया था। पर्यावरण मंत्रालय ने एक साल के दौरान इस सूची 122 शहरों को जोड़ा था। इसमें से 102 शहरों के लिए वायु प्रदूषण को रोकने के लिए कार्ययोजना को भी विकसित और अनुमोदित किया गया।
चरणवार हुआ बदलाव
मुंबई में पीएम2.5 का स्तर लॉकडाउन के पहले चरण में 20, दूसरे में 19.5, तीसरे में 18.04 और चौथे में 14.4 रहा। कोलकाता में यह स्तर क्रमश: 37.27, 15.68, 17.57 और 15.01 रहा। दिल्ली में यह पहले चरण में 42.06, दूसरे में 46.65, तीसरे में 55.51 और चौथे में 54.02 रहा। वहीं बंगलूरू में 27.9, 23.46, 22.03 ओर 18.2 रहा। औसतन पीएम2.5 का स्तर 28.51 फीसदी रहा जबकि पीएम10 औसतन 67.49 फीसदी रहा।
35 प्रकार के प्रदूषणकारी तत्व दिल्ली की हवा को बनाते हैं जहरीला
हाल ही में कानपुर आईआईटी द्वारा किए शोध में खुलासा हुआ कि तीन तरफ से दिल्ली में 35 प्रकार के प्रदूषणकारी तत्व हवाओं को जहरीला बनाते हैं। हालांकि लॉकडाउन से मिले अनुभव ने साफ कर दिया कि बेहतर वायु प्रदूषण प्रबंधन से यदि हर शहर के लिए एक्शन प्लान बना दिया जाए तो वायु प्रदूषण पर काबू पाया जा सकता है।
2017 के स्तर को माना गया आधार
स्वच्छ वायु के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानक 10 है। वायु गुणवत्ता का आकलन करने वाले ट्रैकर ने भी प्रदूषण को कम करने के लिहाज से एनसीएपी की प्रभावशीलता को दिखाने के लिए 2017 के स्तर को आधार माना और 2019 तक इन चारों शहरों के पीएम2.5 और पीएम-10 के स्तरों का आकलन किया। इसमें पाया गया कि कोलकाता में जहां वर्ष 2018 के मुकाबले 2019 में दोनों पीएम स्तरों में करीब 24 फीसदी का सुधार किया, वहीं मुंबई ने औसतन 16 प्रतिशत और बंगलूरू ने 19.9 प्रतिशत और दिल्ली में सबसे कम 4.5 फीसदी का सुधार हुआ।
यह एनसीएपी के 2024 में निर्धारित लक्ष्य से काफी कम था। दिल्ली में 2019 में पीएम 2.5 का वार्षिक औसत का स्तर 109.2 था जबकि एनसीएपी के तहत इसी साल दिल्ली में पीएम2.5 का वार्षिक औसत का स्तर 70.9 तय था। इसका अर्थ यह है कि साल 2019 में दिल्ली को एनसीएपी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए राजधानी की वायु में से प्रदूषणकारी तत्वों में 35 फीसदी की कमी लानी थी।
इसी क्रम में मुंबई में पीएम2.5 वार्षिक औसत 36.1 था, जबकि एनसीएपी के तहत वार्षिक औसत स्तर 28 लक्ष्य निर्धारित था। इसी तरह से मुंबई भी 2019 में एनसीएपी के लिए निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने में 22.4 फीसदी पीछे रह गया था। इसी क्रम में कोलकाता 16 फीसदी और बंगलूरू 12.1 प्रतिशत पीछे रह गया।
लॉकडाउन ने पर्यावरण में इंसानी दखल से होने वाली गतिविधियों के कारण हो रहे वायु प्रदूषण के प्रभावों को समझने में मदद की। जिन चार शहरों में अध्ययन किया गया, वहां पाया गया कि उन सभी में एनसीएपी के तहत 2024 तक के लिए तयशुदा लक्ष्य की दिशा में करीब 30 फीसदी तक सुधार लाने में कामयाबी मिली। कोलकाता में यह 50 फीसदी तक रहा। दिल्ली में उतना कम नहीं हुआ जितना होना चाहिए था। इसकी वजह यहां चलने वाले कोयला आधारित बिजली घर रहे।
- रौनक सुतारिया, रेस्पिाइरर लिविंग साइसेंज के सीईओ
लॉकडाउन ने भारत में प्रदूषण के स्तरों की पृष्ठभूमि को समझने का मौका दिया। इस दौरान चारों शहरों में पीएम2.5 का स्तर 20-49 तक रहा जिसका अर्थ है कि यह सबसे अच्छी स्थिति है। इससे साफ जाहिर है कि हमें थोड़ी सी कवायद से बेहतर हालात मिल सकते हैं। लॉकडाउन के 74 दिनों में आए वायु प्रदूषण के स्तर में आई कमी बताती है कि देश में वायु प्रदूषण को प्रबंधन से जोड़कर स्वच्छ वायु से जुड़े लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।
- डॉ. सागिनक डे, आईआईटी दिल्ली के सीईआरसीए के समन्वयक
सभी आर्थिक गतिविधियों के रुकने से हवा की गुणवत्ता में सुधार हुआ। इसमें आए रिकॉर्ड सुधार ने साबित किया कि यदि ऐसा नहीं होता तो हमें लक्ष्य हासिल करने में पांच साल लग जाते। हवा की गुणवत्ता को प्रादेशिक मुद्दा मानकर काम किया जाए ताकि विकास और आर्थिक गतिविधियों के साथ आसमान साफ और हवा सांस लेने लायक बन सके।
- आरती खोसला, क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक