एक्सप्लेनर: क्या आईटी सेक्टर के लिए खतरे की घंटी है एआई, नौकरियों से लेकर कमाई तक कैसे बदल सकता है पूरा मॉडल?
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विस्तार
पिछले कुछ वर्षों में भारत के आईटी सेक्टर के लिए तस्वीर पहले जैसी आसान नहीं रही है। अब देश के आईटी सेक्टर के सामने एक नई अनिश्चितता खड़ी है। बीते कुछ वर्षों में देश के प्रमुख आईटी स्टॉक में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। ऐसे में एक बड़ी चिंता यह बनी हुई है कि कहीं तेजी से आगे बढ़ता एआई ट्रेडिशनल आईटी सर्विस के पुराने बिजनेस मॉडल को ही न बदल दे। हाल ही में अमेरिकी फिनटेक कंपनी Bluevine की भारतीय कस्टमर सर्विस टीम ने करीब 80 लोगों को कंपनी से बाहर निकाला है। कंपनी के एक कर्मचारी की मानें तो इससे पहले कंपनी ने कस्टमर कॉल्स और ईमेल्स संभालने के लिए एआई टूल्स लागू किए थे और इंसानी कॉल्स के वॉल्यूम में करीब 30 फीसदी की कमी आई थी।
पिछले कुछ महीनों की घटनाओं को एक साथ देखें तो आईटी सेक्टर में बदलाव की तस्वीर काफी स्पष्ट दिखाई देती है। जनवरी 2026 में अमेजन ने बड़े स्तर पर रीस्ट्रक्चरिंग करते हुए हजारों कर्मचारियों की छंटनी की। इसका असर भारत में उसके टेक और सपोर्ट ऑपरेशन पर भी देखने को मिला। इसके बाद मार्च और अप्रैल में ऑरेकल और डेल जैसी बड़ी कंपनियों ने भी लागत घटाने और अपने कामकाज को नए सिरे से व्यवस्थित करने के बीच कर्मचारियों की संख्या कम की। ऑरेकल में अलग-अलग चरणों में हजारों कर्मचारियों को नौकरी से निकाला।
जुलाई में यही दबाव भारतीय आईटी कंपनियों पर भी पहुंचा। इंफोसिस, टेक महिंद्रा और एचसीएल टेक जैसी कंपनियों ने बड़े पैमाने पर नए कर्मचारियों को रखने के बजाय केवल चुनिंदा स्किल्स पर फोकस किया। इसका अप्रत्यक्ष ढंग से असर एंट्री लेवल जॉब्स पर देखने को मिल रहा है। इन सवालों का जवाब सिर्फ लेऑफ के आंकड़ों में नहीं छिपा है। इसके लिए यह समझना होगा कि भारत की आईटी इंडस्ट्री अब तक पैसा कैसे कमाती थी, एआई उस मॉडल को कैसे बदल रहा है और अगले कुछ वर्षों में कंपनियों को किस तरह के कर्मचारियों की जरूरत होगी।
भारत के आईटी सेक्टर की शुरुआत कैसे हुई?
आज के समय भारत की आईटी इंडस्ट्री दुनिया में अपनी अलग पहचान रखती है। हालांकि, इसकी शुरुआत कैसे हुई उसे जानने के लिए आपको 60 और 70 के दशक में जाना होगा। 1960 और 1970 के दशक में भारत में कंप्यूटर बेहद महंगे और सीमित थे। उस दौरान कुछ कंपनियों ने कंप्यूटिंग और सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में काम शुरू किया। 1968 में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी टीसीएस की शुरुआत हुई। यह इस दौर की एक महत्वपूर्ण घटना थी। हालांकि, आपको इस बारे में पता होना चाहिए कि भारतीय आईटी सेक्टर को असली गति 1990 के दशक में मिली।
1991 के आर्थिक संकट के बाद भारत ने अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव किए, जिसकी वजह से विदेशी कंपनियों के लिए भारत में कारोबार करना आसान हुआ। 1991 में हुए आर्थिक बदलावों के बाद देश के निजी क्षेत्र के लिए भी नए अवसर खुले। इसी समय दुनिया में कंपनियां अपने तकनीकी काम का कुछ हिस्सा दूसरे देशों में करवाने लगी थीं। भारत के पास इस बदलाव के लिए कई जरूरी चीजें पहले से मौजूद थीं। यह वह समय था जब देश में हर साल बड़ी संख्या में इंजीनियर तैयार हो रहे थे। अंग्रेजी में काम करने वाली बड़ी आबादी के कारण अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों के साथ कम्यूनिकेशन करना आसान था। इसके अलावा भारतीय तकनीकी कर्मचारियों की लागत पश्चिमी देशों की तुलना में काफी कम भी थी। पश्चिमी कंपनियों को एक ऐसा देश मिल गया था, जहां उन्हें बड़ी संख्या में तकनीकी कर्मचारी अपेक्षाकृत कम खर्च में मिल सकते थे। इसके बाद आता है वाईटूके का दौर।
क्या था Y2K?
वाईटूके (Y2K) का मतलब है ईयर 2000। वाईटूके समस्या को आसान भाषा में ऐसे समझिए पुराने कंप्यूटरों में साल को अक्सर सिर्फ दो अंकों में लिखा जाता था। जैसे 1999 को 99, समस्या यह थी कि 2000 आते ही कंप्यूटर 00 को 2000 के बजाय 1900 न समझ लें। इसमें सबसे बड़ा डर था कि बैंकिंग सिस्टम, हवाई यात्रा, बिजली, अस्पताल, सरकारी रिकॉर्ड और कंपनियों के जरूरी रिकॉर्ड का कंप्यूटर गलत गणना करने लगेंगे। किसी सिस्टम को लग सकता था कि 2000 से पहले 1900 आया है, जिससे तारीखों और पैसों की कैलकुलेशन में गड़बड़ी हो सकती थी।
कंप्यूटर सिस्टम में तारीख से जुड़ी इस समस्या को ठीक करने के लिए दुनियाभर की कंपनियों को बड़ी संख्या में टेक एक्सपर्ट की जरूरत पड़ी। भारतीय आईटी कंपनियों ने इस काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे वैश्विक कंपनियों का भारत की तकनीकी क्षमता पर भरोसा और मजबूत हुआ। यही दौर भारतीय आईटी उद्योग के वैश्विक विस्तार की महत्वपूर्ण सीढ़ियों में से एक बना। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत का आईटी बूम किसी एक कारण का नतीजा नहीं था बल्कि प्रतिभा, कम लागत, अंग्रेजी, उदारीकरण, वाईटूके और ग्लोबल आउटसोर्सिंग ने मिलकर भारत की आईटी इंडस्ट्री की नींव मजबूत की।
भारत की पारंपरिक आईटी इंडस्ट्री का पूरा ढांचा एक खास मॉडल पर खड़ा हुआ था बड़ी संख्या में कुशल कर्मचारी और उनकी सेवाओं को दुनिया की कंपनियों तक पहुंचाना। अमेरिका और यूरोप की कंपनियां अपने सॉफ्टवेयर, तकनीकी सहायता, परीक्षण, रखरखाव और दूसरी प्रक्रियाओं का काम भारतीय कंपनियों को सौंपती थीं। भारतीय आईटी कंपनियां इसके लिए बड़ी-बड़ी टीमें तैयार करती थीं और कर्मचारियों के घंटों के हिसाब से ग्राहकों से शुल्क लेती थीं।
इस मॉडल की सबसे बड़ी ताकत थी भारत की विशाल और कम लागत वाली तकनीकी प्रतिभा। भारत में हर साल बड़ी संख्या में इंजीनियर और कंप्यूटर से जुड़े विशेषज्ञ तैयार होते थे। कंपनियां इन्हें प्रशिक्षित करके अलग-अलग कार्यों में लगाती थीं। ट्रेडिशनल भारतीय आईटी मॉडल में जितने ज्यादा कर्मचारी होते थे, उतने ज्यादा प्रोजेक्ट संभालने की क्षमता और उतना ज्यादा कारोबार। यह मॉडल कई दशकों तक भारत की ताकत बना रहा। हालांकि, एआई आने के बाद अब यह पूरा समीकरण बदल रहा है। अब एक कर्मचारी एआई की मदद से वह काम कर सकता है, जिसके लिए पहले कई लोगों की जरूरत पड़ती थी। यहीं से भारतीय आईटी उद्योग के सामने अगली बड़ी चुनौती खड़ी हो रही है।
क्या होगा आईटी सेक्टर का भविष्य?
एआई का असर सबसे पहले उन कामों पर पड़ रहा है जो बार-बार एक ही तरीके से किए जाते हैं और जिनके लिए पहले से तय नियम होते हैं। उदाहरण के लिए कोडिंग के कुछ हिस्से, सॉफ्टवेयर की जांच, दस्तावेज तैयार करना, सामान्य ग्राहक सहायता, डाटा को व्यवस्थित करना और उसका विश्लेषण करना आदि। इसका मतलब यह नहीं है कि इन कामों से जुड़ी सारी नौकरियां खत्म हो जाएंगी।
हालांकि, यहां एक बात समझने वाली यह है कि एआई कर्मचारियों की क्षमता बढ़ा सकता है। उदाहरण के लिए अगर किसी कंपनी को पहले एक प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए 100 जूनियर कर्मचारियों की जरूरत पड़ती थी अब एआई की मदद से वही काम 60-70 लोग कर सकते हैं, तो कंपनी अगली बार 100 नए लोगों को क्यों रखेगी? इसी को एक रिसर्च में हायरिंग स्लोडाउन के रूप में हाइलाइट किया गया है।
एक दूसरी रिसर्च के मुताबिक जनरेटिव एआई को आईटी सेक्टर के लिए सिर्फ एक नई तकनीक नहीं बल्कि बिजनेस मॉडल में बदलाव के खतरे के रूप में देखा जा रहा है।
अगर एक इंजीनियर एआई की मदद से पहले से ज्यादा काम करने लगे, तो कंपनियों को उतने लोगों की जरूरत नहीं होगी। इसका असर आईटी कंपनियों की कमाई पर भी पड़ सकता है। पारंपरिक आईटी मॉडल में कंपनियां काफी हद तक कर्मचारियों की संख्या और उनके काम के घंटों के आधार पर कमाई करती रही हैं। लेकिन एआई जब काम के लिए जरूरी मेहनत और समय घटा देगा, तो इस मॉडल पर दबाव आएगा। अनुमान है कि आने वाले वर्षों में ट्रेडिशनल आईटी सर्विस से होने वाली कमाई में हर साल करीब 2 से 3 प्रतिशत की कमी आ सकती है।
रिसर्च की मुताबिक शुरुआत में एआई से कंपनियों की काम करने की क्षमता तो बढ़ेगी। हालांकि, जरूरी नहीं कि उनकी कमाई भी इसी रफ्तार से बढ़े। कम कर्मचारियों में ज्यादा काम होने से लागत घटेगी। वहीं नई एआई सेवाओं से कमाई बनने में समय लग सकता है। इस कारण बदलाव के इस शुरुआती दौर में आईटी सेक्टर की कमाई पर असर पड़ सकता सकता है। वहीं बाद में एआई से जुड़े नए कारोबार बढ़ने पर तस्वीर बदल सकती है।
रिसर्च में इस बारे में कहा गया है कि भारत की आईटी इंडस्ट्री पहले भी कई बड़े तकनीकी बदलावों के दौर से गुजर चुकी है। ईआरपी से लेकर क्लाउड और डिजिटल तकनीक तक हर नई तकनीक ने शुरुआत में पुराने काम करने के तरीकों पर अपना असर डाला। हालांकि, जैसे-जैसे कंपनियों की जरूरत बदली, आईटी सेवाओं का बाजार भी नए रूप में आगे बढ़ने लगा। एआई का दौर भी कुछ ऐसा ही बदलाव हो सकता है। यह जरूरी नहीं कि एआई भारतीय आईटी कंपनियों के मौजूदा कारोबार को खत्म कर दे बल्कि संभव है कि वह कंपनियों को अपने काम करने और ग्राहकों को सेवाएं देने के तरीकों को बदलने के लिए मजबूर करे।
एआई से भारत की आईटी इंडस्ट्री पर दबाव जरूर बढ़ सकता है। कुछ काम कम समय और कम लोगों में पूरे होने से नई भर्तियों की जरूरत घट सकती है। हालांकि, इसका मतलब ये नहीं कि आईटी कंपनियों की भूमिका खत्म हो जाएगी। भारतीय आईटी कंपनियां जनरेटिव एआई का फायदा उठा सकती हैं। आने वाले समय में सफलता उन्हीं कंपनियों की ज्यादा होगी, जो एआई को अपनाने के साथ अपने कर्मचारियों को एआई से नए कौशल के लिए तैयार करेंगी।
भारत के आईटी सेक्टर पर एआई का असर दो चरणों में दिखाई दे सकता है। पहला चरण अभी चल रहा है, जहां ऑटोमेशन से कंपनियों की प्रोडक्टिविटी बढ़ रही है और कम समय में ज्यादा काम हो रहा है। इसका सीधा असर कर्मचारियों की जरूरत पर पड़ सकता है। कोडिंग, सॉफ्टवेयर की जांच और पुराने सिस्टम को संभालने जैसे कामों में कम मेहनत लगने से नई भर्तियों की रफ्तार धीमी हो रही है। नई कमाई बढ़ने से पहले लागत घटने का असर दिखाई दे सकता है।
रिसर्च के मुताबिक दूसरा चरण तब शुरू हो सकता है जब कंपनियां बड़े पैमाने पर एआई को अपने कारोबार में अपनाना शुरू करेंगी। इसके साथ एआई आधारित नई सेवाओं, टेक्नोलॉजिकल चेंज और डिजिटल योजनाओं पर खर्च बढ़ सकता है। यहां भारतीय आईटी कंपनियों के लिए नए अवसर बनेंगे। कंपनियों को एआई लागू करने, पुराने सिस्टम के साथ जोड़ने और उसकी देखरेख करने के लिए विशेषज्ञों की जरूरत होगी। इस दौर में नई और ज्यादा मूल्य वाली सेवाओं से कारोबार फिर तेजी पकड़ सकता है।