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SC: अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाला पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, डेफसिस मामले में CBI से जांच की स्थिति मांगी

Tue, 16 Dec 2025 10:52 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पवन पांडेय Updated Tue, 16 Dec 2025 10:52 PM IST
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AgustaWestland scam: SC seeks CBI's status on probe against pvt Indian defence manufacturer firm; Updates
सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : पीटीआई
सुप्रीम कोर्ट ने अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले से जुड़े एक मामले में सीबीआई से यह बताने को कहा है कि एक निजी भारतीय रक्षा आपूर्ति कंपनी के खिलाफ उसकी जांच किस स्थिति में है। अदालत ने जून 2025 में कंपनी के निलंबन से लेकर दिसंबर 2025 तक सीबीआई के पास मौजूद सभी सामग्री पेश करने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ केंद्र सरकार की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें डेफसिस सॉल्यूशन लिमिटेड के खिलाफ निलंबन आदेश रद्द कर दिए गए थे।
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केंद्र का पक्ष और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने कहा कि कंपनी के खिलाफ जांच जारी है और निलंबन आदेश जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर जारी किए गए थे। उन्होंने यह भी दलील दी कि रक्षा से जुड़े मामलों में अदालतों को आम तौर पर दखल नहीं देना चाहिए। इस पर पीठ ने कहा कि देश की रक्षा से कोई समझौता नहीं हो सकता, लेकिन जांच एजेंसी को बाद में अपने मामले को बेहतर बनाने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट के सामने कंपनी के खिलाफ रिश्वत या धन के लेन-देन से जुड़ा कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया था, सिर्फ एजेंसी का संदेह ही निलंबन का आधार था।
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मुख्य न्यायाधीश ने हाई कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि सीबीआई के पत्र में सिर्फ यह आशंका जताई गई थी कि कंपनी, अगस्ता वेस्टलैंड की सीबीआई दी गई कथित रिश्वत की रकम के मनी ट्रेल में एक कड़ी हो सकती है। फिलहाल, यह सिर्फ संदेह है कि कंपनी मुख्य आरोपी अगस्ता वेस्टलैंड के लिए माध्यम (कंड्युट) बनी।
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अन्य सवाल और निर्देश
न्यायमूर्ति बागची ने यह भी सवाल किया कि जब हाई कोर्ट में यह बताया गया था कि अगस्ता वेस्टलैंड पर लगा निलंबन वापस ले लिया गया है, तो फिर इस भारतीय कंपनी पर निलंबन क्यों जारी रखा जाए। एएसडी ने इस पर सीबीआई से निर्देश लेकर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने के लिए समय मांगा। पीठ ने सीबीआई को निर्देश दिया कि अब तक की जांच में जो भी सामग्री जुटाई गई है, वह अदालत के सामने रखी जाए।
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क्लिनिकल संस्थानों के लिए केरल हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट
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दो न्यायिक अधिकारियों को हाईकोर्ट जज बनाने की मंजूरी
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने दो न्यायिक अधिकारियों को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का जज बनाने की मंजूरी दी है। चीफ जस्टिस सूयकांत की अगुवाई वाले कॉलेजियम ने रमेश चंदर डिमरी और नीरजा कुलवंत कलसों को हाईकोर्ट जज नियुक्त करने का अपना फैसला आगे की कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार को भेज दिया है।

ट्रेनिंग के दौरान दिव्यांग हुए सैन्य अधिकारियों के पुनर्वास पर सरकार को सुप्रीम कोर्ट से मिली 6 सप्ताह की मोहलत
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार को उन अधिकारी कैडेटों के पुनर्वास से जुड़ी सिफारिशें अंतिम रूप देने के लिए छह सप्ताह का समय दिया, जिन्हें सैन्य प्रशिक्षण के दौरान दिव्यांग होने के कारण बाहर कर दिया गया था। यह मामला सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ा है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि तीनों सेनाओं ने इस मुद्दे पर सकारात्मक सिफारिशें दी हैं, जिन पर रक्षा मंत्रालय विचार कर रहा है। इसके बाद इन पर वित्त मंत्रालय की मंजूरी भी जरूरी होगी। इसी कारण अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी तय की है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लेकर शुरू किया था।

अदालत की मदद के लिए नियुक्त न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) वरिष्ठ वकील रेखा पल्ली ने मेडिकल सहायता, आर्थिक मदद, शिक्षा, पुनर्वास और बीमा से जुड़े सुझाव दिए थे। केंद्र सरकार पहले ही भरोसा दिला चुकी है कि प्रशिक्षण के दौरान दिव्यांग हुए कैडेटों को अब पूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना के तहत इलाज की सुविधा मिलेगी। अगस्त 2025 से ऐसे सभी कैडेट इस योजना में शामिल कर लिए गए हैं और उनसे एकमुश्त शुल्क भी नहीं लिया जा रहा है। अदालत ने यह भी कहा कि मौजूदा एकमुश्त आर्थिक मदद और बीमा राशि महंगाई के हिसाब से कम है, इसलिए इसमें बढ़ोतरी पर विचार होना चाहिए। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 1985 से अब तक करीब 500 अधिकारी कैडेट इस स्थिति का सामना कर चुके हैं, जिनकी आर्थिक और चिकित्सा परेशानियां लगातार बढ़ रही हैं।

दिव्यांगों को राज्य बार काउंसिल में मिले जगह- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) से राज्य बार काउंसिलों में सह-चुनाव के माध्यम से दिव्यांग सदस्यों को शामिल करने की संभावना तलाशने को कहा है। अदालत ने समावेशी और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की बात कहते हुए यह निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने बीसीआई से इस संबंध में एक प्रस्ताव अदालत के समक्ष रखने को कहा। पीठ ने सुझाव दिया कि इस पहल को तमिलनाडु से एक पायलट परियोजना के रूप में शुरू किया जा सकता है, जहां अभी चुनाव घोषित नहीं हुए हैं। बीसीआई के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने इस याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि अधिनियम में दिव्यांग व्यक्तियों (पी डब्ल्यू डी) के लिए कोई आरक्षण नहीं है और सीमित संख्या वाली परिषदों में उनके लिए सीट आरक्षित करना अव्यावहारिक होगा। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि एक प्रतिनिधि के होने से संस्था मजबूत होगी और उसकी समावेशिता बढ़ेगी। पीठ ने कहा कि कानून में संशोधन के बजाय परिषदें सीटें बढ़ा सकती हैं और सह चुनाव के माध्यम से दिव्यांग सदस्य को शामिल कर सकती हैं। इससे पहले 8 दिसंबर को शीर्ष अदालत ने महिला वकीलों के लिए भी राज्य बार काउंसिलों में 30 प्रतिशत सीटें आरक्षित रखने का आदेश दिया था, जिनमें से 10 प्रतिशत सीटों को सह-चुनाव की ओर से भरने का निर्देश दिया गया था।

बैंक ऋण घोटाले में डीएचएफएल के वाधवान बंधुओं को जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विचाराधीन कैदी को अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जाना चाहिए। इस टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने करोड़ों के बैंक ऋण घोटाले में डीएचएफएल के पूर्व प्रमोटर कपिल वाधवान और उनके भाई धीरज वधावन को जमानत दे दी। जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि बिना मुकदमे के उनकी लंबी कैद अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। पीठ ने कहा कि भारतीय कानून के तहत, जमानत नियम है और जेल अपवाद है। इसमें कहा गया है कि मुकदमे से पहले की कैद को बिना फैसले के सजा में तब्दील नहीं होने दिया जा सकता, और जहां लंबी हिरासत अनुचित, मनमानी या अत्यधिक हो जाती है, वहां अदालतों का संवैधानिक दायित्व है कि वे हस्तक्षेप करें। गवाहों की संख्या और अदालतों से पारित आदेशों को देखते हुए, ऐसा प्रतीत होता है कि यदि मामले की सुनवाई प्रतिदिन के आधार पर की जाए, तो दो से तीन वर्षों में भी निष्कर्ष संभव नहीं है। इसलिए यह अदालत समझती है कि दोनों आरोपियों को जमानत दी जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि दोनों आरोपी अपनी रिहाई के एक सप्ताह के भीतर संबंधित क्षेत्राधिकार वाले ट्रायल कोर्ट और उस पुलिस स्टेशन को अपना निवास स्थान और संपर्क नंबर बताएं जहां वे रहेंगे। वे महीने में एक बार संबंधित पुलिस स्टेशन में हाजिर होंगे और आरोप तय होने के बाद निर्धारित तिथियों पर ट्रायल अदालत के समक्ष उपस्थित होंगे। अपीलकर्ता हाईकोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना देश की सीमा से बाहर नहीं जाएंगे और अपनी रिहाई के दो दिनों के भीतर अपने पासपोर्ट संबंधित ट्रायल कोर्ट में जमा करा देंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं की ओर से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गवाहों को प्रभावित करने या धमकाने का कोई भी प्रयास अभियोजन पक्ष के आवेदन पर जमानत रद्द करने का कारण बनेगा।
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