Agnipath Scheme: 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद अर्धसैनिक बलों में आए थे 'अग्निवीर', लेकिन इस मुद्दे पर हुआ था जबरदस्त टकराव
केंद्रीय अर्धसैनिक बल के पूर्व अधिकारी जेपी सयाल, बताते हैं, 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान सेना में इमरजेंसी कमीशन ऑफिसर यानी 'ईसीओ' की भर्ती की गई थी। चार-पांच साल बाद इन्हें केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में भेजा जाने लगा। करीब पांच सौ 'ईसीओ' बीएसएफ में आए थे...
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केंद्र सरकार द्वारा सेना भर्ती के लिए शुरू की गई 'अग्निपथ' योजना पर विपक्ष द्वारा सवाल उठाए जा रहे हैं। दूसरी तरफ केंद्र सरकार एवं सैन्य अधिकारी, युवाओं को अग्निवीर बनने के फायदे गिनाने में लगे हैं। देश में 60 के दशक में ऐसा प्रयोग हो चुका है। भारत-चीन युद्ध के बाद इमरजेंसी कमीशन ऑफिसर (ईसीओ) को सेना से केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में 'अग्निवीर' की तर्ज पर भेजा गया था। वरिष्ठता को लेकर ईसीओ और कैडर अफसरों के बीच जोरदार तकरार शुरू हो गई। मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा। कभी तो सेना से आए ईसीओ सर्वोच्च अदालत में जा रहे थे, तो कभी डायरेक्ट एंट्री वाले अर्धसैनिक बलों के कैडर अधिकारी कोर्ट पहुंच गए। लगभग एक दशक बाद मामले का निपटारा हो सका। हालांकि इस वजह से अर्धसैनिक बलों के कैडर अधिकारियों को पदोन्नति में देरी का दंश झेलना पड़ा था।
तब हुई थी इमरजेंसी कमीशन ऑफिसर की भर्ती
केंद्रीय अर्धसैनिक बल के पूर्व अधिकारी जेपी सयाल, जिन्होंने सत्तर के दशक की शुरुआत में बीएसएफ ज्वाइन की थी, वे बताते हैं, 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान सेना में इमरजेंसी कमीशन ऑफिसर यानी 'ईसीओ' की भर्ती की गई थी। चार-पांच साल बाद इन्हें केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में भेजा जाने लगा। करीब पांच सौ 'ईसीओ' बीएसएफ में आए थे। इतने ही 'ईसीओ' सीआरपीएफ में आए थे। कुछ अधिकारी आईटीबीपी में भी भेजे गए। इन बलों में आने के बाद 'ईसीओ', वरिष्ठता का दावा करने लगे। कुछ दिन बाद उन्हें वरिष्ठता का लाभ और दूसरे भत्ते मिल गए। उस वक्त शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत अधिकारी नहीं आते थे। 'ईसीओ' के आने से केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के डायरेक्ट एंट्री वाले कैडर अफसरों को नुकसान हुआ। भले ही वे बल में पहले से कार्यरत थे, लेकिन 'ईसीओ' उनसे वरिष्ठ बन गए। उनकी पदोन्नति अटक गई। नतीजा, सीआरपीएफ व बीएसएफ अफसर कोर्ट पहुंच गए।
आखिर में सीएपीएफ कैडर की हुई थी जीत
बतौर सयाल, मैंने भी उस केस में अपना योगदान दिया था। अदालत को बताया गया कि जब देश को आपातकाल में अफसरों की जरूरत थी तो उन्हें भर्ती किया गया। उस वक्त देश को सुरक्षित बनाने के लिए वह आवश्यक था। बाद में जब शॉर्ट सर्विस कमीशन वाले अफसरों ने केस किया तो अदालत में कहा गया कि वे अफसर जानते हैं, पांच साल के लिए आए हैं। कोर्ट ने कहा था, ये भी इमरजेंसी वाले अफसरों की तरह हैं। हालांकि अब शॉर्ट सर्विस कमीशन वाले अफसरों की सेवा शर्तें पहले से ही तय कर दी गई हैं। उनके लिए भर्ती व पदोन्नति में पद आरक्षित रहते हैं। ईसीओ को उस वक्त वरिष्ठता का फायदा नहीं मिलता था, केवल पे प्रोटेक्शन होता था। चार-पांच वेतन वृद्धि का लाभ मिल जाता था। उनकी वरिष्ठता नई ज्वाइनिंग से तय होती थी। 1986 में ईसीओ व डायरेक्ट एंट्री वाले अफसरों के केस में कैडर अधिकारी हार गए थे। बाद में जब शॉर्ट सर्विस कमीशन वाले अफसरों ने अदालत में वरिष्ठता को लेकर केस किया तो उन्हें हार का सामना करना पड़ा। बाद में दोनों तरह के मामलों में कैडर अधिकारियों की जीत हुई। 1966 में बीएसएफ में सीधी भर्ती वाले अफसरों का पहला बैच निकला था।
1972 में आए 'ईसीओ', 71 के कैडर अफसर से वरिष्ठ हो गए
सीआरपीएफ के पूर्व एडीजी डीसी डे का कहना है कि उस वक्त ईसीओ का कहना था कि उन्हें वरिष्ठता का लाभ मिलेगा। उनकी सेवा शर्तों में ऐसा लिखा है। दिसंबर 1971 में बल ज्वाइन करने वाले डे ने कहा, सेना से 1972 में आए 'ईसीओ' हमसे सीनियर हो गए। ऐसे मामलों में सेवा शर्तों में ही यह जानकारी अंकित होनी चाहिए कि दूसरे बल से आने वालों को वरिष्ठता का लाभ मिलेगा या नहीं। सत्तर के दशक में जो ईसीओ, अर्धसैनिक बलों में आए थे, वे कंपनी कमांडर के पद पर लगते थे। आज इस पद को सहायक कमांडेंट कहा जाता है। मौजूदा समय में सेना से जो 'अग्निवीर' केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में आएंगे, हो सकता है कि वे अपनी सेना की वरिष्ठता देने के लिए कहें। अभी इस बाबत पूरा नोटिफिकेशन नहीं आया है।
बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद का कहना है कि तब बीएसएफ में 500 ईसीओ आए थे। सभी को कंपनी कमांडर लगाया गया। बीएसएफ तो 1965 में खड़ी हुई थी। 66 में कैडर अफसरों के पहले बैच की एंट्री हुई। जैसे-जैसे वे आते आ गए, उन्हें वरिष्ठता मिलती गई। अदालत के समक्ष कहा गया कि ईसीओ की इन बलों में नियुक्ति वाले दिन से वरिष्ठता मिले। रवि पॉल व कंवर मेहर चंद ने सेना की वरिष्ठता के लिए केस किया था। 90 में भी दोबारा से केस किया गया। बाद में शॉर्ट सर्विस वाले भी वरिष्ठता मांगने लगे, लेकिन इन्हें नहीं दी गई। ये अधिकारी भी दोबारा से अदालत में हार गए। अग्निवीरों के मामले में सरकार को सारी शर्तें स्पष्ट करनी होंगी। ऐसा न हो कि अग्न्विीरों के आने से सीएपीएफ के जवानों की वरिष्ठता पर असर पड़ जाए।