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हार के बाद जानिए इन दिनों क्या कर रहे हैं अखिलेश यादव?

Wed, 05 Apr 2017 11:09 AM IST
प्रदीप कुमार / बीबीसी हिंदी.कॉम
प्रदीप कुमार / बीबीसी हिंदी.कॉम Updated Wed, 05 Apr 2017 11:09 AM IST
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After losing, know what are these days Akhilesh Yadav?
अप्रैल का शुरुआती सप्ताह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के लिए हमेशा खास रहा है। इस सप्ताह में वे अमूमन अपने बच्चों के साथ छुट्टियां बिताने विदेश जाते रहे हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो पाया है। अखिलेश इन दिनों यूपी विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार की समीक्षा में जुटे हैं।
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ये समीक्षा कभी समाजवादी पार्टी के कार्यालय में, तो कभी पार्टी आफिस के साथ बने जनेश्वर मिश्रा ट्रस्ट में उनके दफ्तर में हो रही है। लगातार बैठकों का दौर चल रहा है। पूरे राज्य से आए कार्यकर्ताओं की भीड़ सुबह से ही अखिलेश के दफ्तरों के बाहर जुट रही है।
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पार्टी के मुख्य प्रवक्ता और अखिलेश यादव के बेहद करीबी नेता राजेंद्र चौधरी बताते हैं, "पूरे उत्तर प्रदेश के अलग अलग जिलों के उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं के साथ समीक्षात्मक बैठक का दौर चल रहा है। राज्य में 75 जिले हैं तो इसमें वक्त लग रहा है। खास बात ये है कि अखिलेश यादव खुद इन बैठकों में हिस्सा ले रहे हैं और नोट्स पर नजर रख रहे हैं।"
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'वो जातिगत समीकरण बनाते रहे'

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उनके करीबी लोगों के मुताबिक अखिलेश बार बार अपने हारे हुए उम्मीदवारों के सामने एक बात दोहराते हैं। वो कहते हैं, 'हम लोग मेट्रो, एक्सप्रेस वे और समाजवादी पेंशन जैसे विकास के मुद्दों पर चुनाव लड़ते रहे और भारतीय जनता पार्टी जातिगत समीकरण बनाती रही।' समाजवादी पार्टी के एमएलसी उदयवीर सिंह कहते हैं, "समाजवादी पार्टी की सरकार ने दलितों और पिछड़ों के लिए काफी काम किया था, लेकिन बीजेपी खास धर्म और जाति के प्रति नफरत की राजनीति करके लोगों को बहकाने में कामयाब रही।


हम आम लोगों के बीच जमीनी स्तर पर जाने की तैयारी कर रहे हैं।" समाजवादी रूझान वाली पत्रिका सोशलिस्ट फैक्टर के संपादक फ्रैंक हूजुर कहते हैं, "अखिलेश को समाजवादी राजनीति में विकास के मुद्दे के साथ सामाजिक न्याय की राजनीति पर भी बराबर ध्यान देना होगा। तभी जाकर बीजेपी की राजनीति के सामने पार्टी वापसी कर सकती है।" समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अब तक 51 सदस्य होते हैं, यूपी के नतीजे आने के बाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में इन सदस्यों को बढ़ाने पर आम सहमति बनी है।

माना जा रहा है कि इसमें दलितों और अति पिछड़ों की भागीदारी बढ़ाई जाएगी। 30 सितंबर तक पार्टी अपने संगठन का पुनर्गठन करने की योजना पर काम कर रही है। राजेंद्र चौधरी बताते हैं, "राष्ट्रीय कार्यकारिणी ही नहीं बल्कि जिलों और विभिन्न राज्य के संगठनों का पुनर्गठन भी किया जा रहा है। पार्टी से संबंधित विभिन्न संगठनों की बैठक भी बुलाई जा रही है।"

'2019 का चुनाव दूर नहीं'

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इतना ही नहीं 15 अप्रैल से 15 जून तक पूरे राज्य में समाजवादी पार्टी अपना सदस्यता अभियान चलाने जा रही है। अखिलेश यादव अपनी बैठकों में कार्यकर्ताओं और पार्टी के नेताओं को लगातार इस बात का ध्यान दिला रहे हैं कि '2019 का लोकसभा चुनाव बहुत दूर नहीं है, तैयारी में जुटना होगा।' राजेंद्र चौधरी कहते हैं, "2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ही आने वाले दिनों में गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं।

हम लोग उसकी तैयार कर रहे हैं। उसके बाद नगर निगमों के चुनाव होंगे। हम लोग इन सब चुनावों में बीजेपी को जवाब देने की तैयारी कर रहे हैं।" राजेंद्र चौधरी ये दावा भी करते हैं कि जल्दी ही उत्तर प्रदेश के आम लोगों को समाजवादी सरकार और योगी आदित्यनाथ की सरकार के अंतर का पता चल जाएगा।

उदयवीर सिंह कहते हैं, "अखिलेश सरकार की सबसे ज्यादा आलोचना कानून और प्रशासन के मुद्दे पर की जाती रही है, लेकिन योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद क्या राज्य में अपराध कम हो गया है? 15 दिनों में इतने मामले दर्ज हो चुके हैं, समाज का एक पूरा तबका खौफ में जी रहा है।" समाजवादी पार्टी का ध्यान अपने संगठन को मजबूत करने के साथ साथ योगी आदित्यनाथ की सरकार के सामने मजबूत विपक्ष के तौर पर अपनी भूमिका निभाने की है।

परिवार के अंदर ही चुनौती?

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लेकिन क्या ये सब अखिलेश यादव की राह की सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। या फिर इससे बड़ा संकट उनके सामने परिवार के अंदर ही है? जिस तरह से पार्टी की हार के बाद मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश पर निशाना साधा है, परिवार की छोटी बहू अपर्णा यादव के योगी आदित्यनाथ से नजदीकी बढ़ाने की कोशिशों की खबरें आ रही हैं और शिवपाल यादव के नेतृत्व में समाजवादी कार्यकर्ताओं का गुट काम कर रहा है, उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि अखिलेश की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही है।

हालांकि पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के कई सदस्य कहते हैं कि चुनाव परिणाम के बाद एक दिन मुलायम जब पार्टी आफिस आए तो उन्हें पता चला कि अखिलेश जनेश्वर मिश्रा ट्रस्ट में बैठे हैं, तो वे वहां आ गए। इन सदस्यों के मुताबिक, "उन्होंने सबको आशीर्वाद दिया, लेकिन मैनपुरी में फिर से आलोचना कर दी। वे बड़े हैं, प्यार और नाराजगी जताने का उन्हें हक है।"

उदयवीर सिंह कहते हैं, "पार्टी ने जिन परिस्थितियों में चुनाव लड़ा है, उसे देखते हुए हमारे खराब प्रदर्शन को समझना मुश्किल नहीं है। लेकिन पार्टी के कार्यकर्ताओं का पूरा भरोसा अखिलेश यादव के नेतृत्व में नजर आ रहा है।" अखिलेश यादव अपनी बैठकों में कार्यकर्ताओं को ये भी भरोसा दिलाते हैं कि नेताजी थोड़े नाराज जरूर हुए हैं, लेकिन वे उन्हें मना लेंगे। अखिलेश अमूमन दोपहर ढाई बजे तक बाहर से आए कार्यकर्ताओं से मिलते हैं।

'राजनीति में नफरत की भाषा नहीं'

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उदयवीर सिंह के मुताबिक शाम के समय वे अपने आवास पर ही चुनिंदा लोगों से मिलते हैं। चुनावी अभियान में पार्टी के प्रचार अभियान में अहम भूमिका निभाने वाली उनकी पत्नी डिंपल यादव अभी तक सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई हैं। लेकिन परिवार के नजदीकी लोगों के मुताबिक अखिलेश समीक्षा बैठक की बातें डिंपल से शेयर कर रहे हैं और उनकी राय को अहमियत दे रहे हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स के लखनऊ एडिशन की एडिटर सुनीता एरॉन कहती हैं, "चुनाव में करारी हार के बाद भी अखिलेश को लोग उम्मीद से देख रहे हैं। इसकी वजह उनका अपना व्यक्तित्व है। वे सौम्य दिखते हैं और उनकी राजनीति में नफरत की भाषा नहीं है। ऐसे में भविष्य की राजनीति में उनकी जगह बनी रहेगी।

" उनके करीबी लोग बताते हैं कि अखिलेश यादव भी अपने मिलने जुलने वाले समाजवादी कार्यकर्ताओं से कहते हैं, 'राजनीति में ये टेंपरॉरी फेज है, ऐसी घटनाएं हो जाती हैं। नई लड़ाई के लिए तैयार रहिए।' जहां तक बच्चों को छुट्टियों पर विदेश घुमाने की बात है, उसके बारे में फ्रैंक हूजुर कहते हैं, "अखिलेश को परिवार और राजनीति में संतुलन साधना आता है। समीक्षाओं का दौर पूरा होते ही वे बच्चों की फरमाइश का ख्याल जरूर रखेंगे।"

 
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