कश्मीर घाटी में मोबाइल इंटरनेट पर लगी रोक से टूटा मुखबिर तंत्र, एजेंसियों को नहीं मिल पा रहे इनपुट
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इनपुट की संख्या में लगातार कमी
अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने से पहले जब मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बिना किसी बाधा के चल रही थीं, तो सैन्य बलों को अपने मुखबिरों से लगातार इनपुट भी मिल रहे थे। अब इनपुट की संख्या में लगातार कमी आ रही है। पहले किसी एक इलाके के मुखबिरों को आतंकियों की फोटो भेजकर सूचनाएं जुटाई जाती थीं। मुखबिर भी मोबाइल इंटरनेट के जरिए सैन्य बलों या इंटेलिजेंस एजेंसियां को कुछ फोटो भेजते रहते थे, अब मुखबिरों की सेवाएं काफी हद तक बाधित हो चुकी हैं।
अपने स्टाफ की करनी पड़ रही है तैनाती
कश्मीर में तैनात लोकल पुलिस, इंटेलिजेंस एजेंसियां और सीआरपीएफ के अधिकारियों से हुई बातचीत में यह निष्कर्ष निकला है कि अब मुखबिरों की ओर से 20 फीसदी सूचनाएं भी नहीं मिल पा रही हैं। अगस्त माह से पहले ऐसी सूचनाओं का आदान-प्रदान बिना किसी बाधा के होता था। इसका भरपूर फायदा सुरक्षा बलों को मिला। पहले छह माह में सुरक्षा बलों ने करीब 132 आतंकियों को मार गिराया। जून माह की बात करें, तो 27 से ज्यादा आतंकी मारे गए थे। इसके बाद जब वहां मोबाइल इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगी, तो मुखबिरों से मिलने वाली सूचनाएं भी बंद हो गईं।
नहीं पता कहां छिपे हैं आतंकी
नतीजा, सुरक्षा बलों को यह जानकारी तो मिल रही है कि घाटी में 89 से ज्यादा आतंकी प्रवेश कर चुके हैं, लेकिन यह नहीं पता चल पा रह है कि वे कहां छिपे हैं। उनकी सही लोकेशन क्या है। इंटरनेट बंद होने के कारण मुखबिर न तो अलर्ट भेज पा रहे हैं और न ही कोई फोटो या वीडियो। पहले यह होता था कि मुखबिर अपने इलाके में जैसे ही किसी बाहरी व्यक्ति या संदिग्ध को देखते थे, तो वे तुरंत वह सूचना खुफिया एजेंसी या लोकल पुलिस की इंटेलीजेंस यूनिट तक पहुंचा देते थे। अब इंटेलीजेंस एजेंसी ने हर जगह पर अपना स्टाफ तैनात किया है। आर्मी, लोकल पुलिस, सीआरपीएफ, रॉ और एनआईए जैसी एजेंसियों को खुफिया सूचनाएं लेने के लिए खुद का स्टाफ तैनात करना पड़ रहा है।
नहीं चला पा रहे तलाशी अभियान
सुरक्षा बलों के एक अधिकारी मानते हैं कि मुखबिरों की पुख्ता सूचनाएं न मिलने से हमें तलाशी अभियान या आतंकियों के खिलाफ बड़े ऑपरेशन शुरु करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। पहले जो भी तलाशी अभियान चलता था, उससे पहले मुखबिर की तरफ से दी गई और इंटेलिजेंस एजेंसियां की सूचना का मिलान किया जाता था। इसके बाद जम्मू कश्मीर पुलिस की इंटेलिजेंस यूनिट भी उस सूचना की गहराई नापती थी। इन सब एजेंसियों की हरी झंडी मिलने के बाद कोई बड़ा ऑपरेशन किया जाता था।
ऐसे कई मौके आए हैं, जब मुखबिर की ठोस सूचना पर बिल्कुल आखिर में ऑपरेशन रोक दिया गया। पहले गांवों से बड़े पैमाने पर आतंकी अलर्ट मिलते थे, अब उनमें भारी कमी आ रही है। रोड ट्रांसपोर्ट, वन विभाग और शिक्षण संस्थानों से अहम अलर्ट मिलते थे। बंदिशों के बीच सुरक्षा बलों की ओर से यह मांग आई थी कि घाटी के आधा दर्जन इलाके, जहां सुरक्षा बलों और मुखबिरों के बीच अच्छी समझ रही है, वहां छोटे-छोटे अंतराल पर मोबाइल सेवा शुरु कर दी जाए।
जारी रह सकती है पाबंदी
पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर की स्थिति को लेकर गृह मंत्रालय में हुई एक बैठक में आईबी की ओर से यह बताया गया था कि कश्मीर एवं घाटी के दूसरे इलाकों में बंदिशों को कम किया जा सकता है, लेकिन उन्हें पूरी तरह हटाना अभी ठीक नहीं होगा। मोबाइल नेटवर्क में जब भी पूर्ण ढील दी गई, तो उसके नतीजे अच्छे नहीं मिले। पाकिस्तानी सीमा में बैठे आतंकी संगठनों के मैसेज और तोड़फोड़ वाले दूसरे संदेश पकड़े गए हैं। इस बात की पूरी आशंका है कि यदि घाटी से सारी बंदिशें हटाई जाती हैं और नजरबंद किए गए नेताओं को छोड़ा जाता है, तो वहां हालात बिगड़ सकते हैं।
दूसरा, पाकिस्तान की ओर से आतंकियों को भारतीय सीमा में घुसपैठ कराने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है। घाटी में मौजूद आतंकियों का सफाया अभी तक नहीं हो सका है। इनके अलावा आतंकियों के स्लीपर सेल, जिनकी बड़े पैमाने पर घाटी में मौजूदगी बताई जा रही है, अभी उनकी तलाश जारी है। ऐसे में हर जगह मोबाइल इंटरनेट की छूट सैन्य बलों को नुकसान पहुंचा सकती है।