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AFSPA: असम सरकार ने आठ जिलों में अफ्स्पा छह महीने के लिए बढ़ाया, पश्चिम कार्बी आंगलोंग जिले से हटाया

Thu, 20 Oct 2022 05:44 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी Published by: Amit Mandal Updated Thu, 20 Oct 2022 05:44 PM IST
सार

 यह अधिनियम नवंबर 1990 में असम में लागू किया गया था और तब से राज्य सरकार द्वारा स्थिति की समीक्षा के बाद इसे हर छह महीने में बढ़ा दिया गया है।

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AFSPA extended in 8 districts, 1 sub-division of Assam
अफस्पा कानून सेना को विशेष शक्तियां देता है। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

असम सरकार ने गुरुवार को कहा कि उसने कानून और व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा के बाद आठ जिलों और एक उप-मंडल में सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, 1958 (AFSPA) को छह महीने के लिए बढ़ा दिया है। हालांकि, सरकार ने पश्चिम कार्बी आंगलोंग जिले से विवादास्पद कानून वापस ले लिया क्योंकि यहां की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। गृह एवं राजनीतिक विभाग के प्रधान सचिव नीरज वर्मा ने एक आदेश में कहा कि अफ्स्पा का छह महीने का विस्तार एक अक्टूबर से प्रभावी है। 15 अक्टूबर को लिखे और गुरुवार को जारी किए गए आदेश में कहा गया है कि राज्य के बाकी हिस्सों से कानून वापस लेने के बाद आठ जिलों और एक उप-मंडल को 1 अप्रैल से अशांत क्षेत्र के रूप में रखा गया है।

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पश्चिम कार्बी आंगलोंग जिले से हटाया कानून 
आदेश में कहा गया है, हाल के दिनों में असम में कानून और व्यवस्था और सुरक्षा परिदृश्य की समीक्षा से संकेत मिलता है कि राज्य के पश्चिम कार्बी आंगलोंग जिले में स्थिति में काफी सुधार हुआ है। असम के राज्यपाल पश्चिम कार्बी आंगलोंग से 01.10.2022 से प्रभावी 'अशांत क्षेत्र' की घोषणा को वापस ले रहे हैं। बराक घाटी में कछार के लखीपुर उप-मंडल के अलावा तिनसुकिया, डिब्रूगढ़, चराईदेव, शिवसागर, जोरहाट, गोलाघाट, कार्बी आंगलोंग और दीमा हसाओ जिले अभी भी अशांत क्षेत्र हैं।
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यह अधिनियम नवंबर 1990 में असम में लागू किया गया था और तब से राज्य सरकार द्वारा स्थिति की समीक्षा के बाद इसे हर छह महीने में बढ़ा दिया गया है। अफ्स्पा (AFSPA) सुरक्षा बलों को बिना किसी पूर्व वारंट के कहीं भी अभियान चलाने और किसी को भी गिरफ्तार करने की अनुमति देता है। यह किसी ऑपरेशन के गलत होने की स्थिति में सुरक्षा बलों को एक निश्चित स्तर की प्रतिरक्षा भी देता है। 
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नागरिक समाज समूह और अधिकार कार्यकर्ता सशस्त्र बलों द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन का दावा करते हुए पूरे उत्तर पूर्व से इस कठोर कानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। 4 दिसंबर, 2021 को नागालैंड के मोन जिले में उग्रवाद विरोधी अभियान और जवाबी हिंसा में सुरक्षा बलों द्वारा की गई गोलीबारी में 14 नागरिकों की मौत के बाद अधिनियम को निरस्त करने की मांग तेज हो गई है।

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