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अफगानिस्तान: कौन उतारेगा चीन और पाकिस्तान की आंखों से चर्बी, कई देशों की सीक्रेट एजेंसियां हुईं सक्रिय

Wed, 08 Sep 2021 07:29 PM IST
सुरेंद्र जोशी जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली 
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली  Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Wed, 08 Sep 2021 07:29 PM IST
सार

तालिबानी सरकार से चीन व पाकिस्तान की नजदीकियां व उसके होने वाले दूरगामी असर को लेकर कई देश खुद का असहज पा रहे हैं। उन्होंने अपनी रणनीति बनाना शुरू कर दिया है। सीक्रेट एजेंसियां भी इस काम में जुट गई हैं। एनएसए डोभाल व रूसी समकक्ष पेत्रुशेव की मुलाकात भी इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है। 
 

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Afghanistan: Who will open the eyes of China and Pakistan, secret agencies of many countries became active
अजित डोभाल अपने रूसी समकक्ष निकोलाई पेत्रुशेव के साथ - फोटो : ANI

विस्तार

अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनते ही चीन और पाकिस्तान को अपने लिए 'स्ट्रैटेजिक डेप्थ' नजर आने लगी है। जिस तरह से तालिबान सरकार के प्रतिनिधियों ने चीन के राजदूत से मुलाकात की है, उससे कई देश खुद को असहज महसूस कर रहे हैं। पाकिस्तान के आईएसआई चीफ लेफ्टिनेंट जनरल हमीद की मुल्ला बरादर से हुई मुलाकात के बाद कई देशों की टॉप 'सीक्रेट' एजेंसियां एक्टिव हो गई हैं। अफगानिस्तान को लेकर चीन और पाकिस्तान की आंखों पर जो चर्बी छा गई है, उसे उतारना जरूरी है। 

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बुधवार को भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और रूसी समकक्ष निकोलाई पेत्रुशेव की मुलाकात को इसी कड़ी का हिस्सा बताया जा रहा है। दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन का यह कहना कि अभी देखिए और इंतजार कीजिए। चीन, रूस, पाकिस्तान और ईरान क्या करते हैं, ये देखना होगा, दिलचस्प होगा। बाइडन के इस बयान को भी उसी कड़ी से जोड़ा जा रहा है। 
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पूर्व राजनयिक अशोक सज्जनहार के अनुसार, पहले पाकिस्तान यहां पर 'स्ट्रैटेजिक डेप्थ' लेने के चक्कर में था, अब चीन भी उस दौड़ में शामिल हो गया है। आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान को अगर जड़ की संज्ञा दी जाए तो वह गलत नहीं होगा। तालिबान या उसके सहयोगी समूह तो इस पेड़ की पत्तियां मात्र हैं। चीन और पाकिस्तान जैसे देश तालिबान से करीबी संबंध बनाने में जुटे हैं। चीन की ओर से पहले ही तालिबान को आर्थिक मदद देने का एलान कर दिया गया है। तालिबान ने चीन को अपना महत्वपूर्ण साथी बताया है। इससे पहले तालिबान, पाकिस्तान को अपना दूसरा घर बता चुका हैं। 'स्ट्रैटेजिक डेप्थ' हासिल करने की इस चाल ने कई देशों को परेशान कर दिया है। अफगानिस्तान से निकलने के बाद अमेरिका ने तालिबान पर कुछ प्रतिबंध लगाए थे। बाद में चीन और पाकिस्तान जैसे देश उन प्रतिबंधों का फायदा उठाकर तालिबान के ज्यादा करीब पहुंच गए। 

पंजशीर में पाक अफसर दिखे तो चौंक गए अमेरिका, ब्रिटेन व भारत

पंजशीर में जब पाकिस्तानी सेना और इसके अफसर दिखाई पड़े तो अमेरिका, भारत, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों की चिंता बढ़ गई। इन देशों की सीक्रेट एजेंसियां दोबारा से अफगानिस्तान में सक्रिय हो उठीं। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन ने कतर का दौरा किया। इस्रायल के विदेशी मंत्री से बात की। उन्होंने दोहा के ट्रांजिट कैंप का दौरा किया, जहां से हजारों लोगों को बाहर ले जाया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने कहा, 'उन्हें मालूम था कि हमारे जाने के बाद चीन, तालिबान के साथ बात करने की कोशिश करेगा। चीन को तालिबान से काफी दिक्कत है, इसलिए वह अभी से ही उससे संबंध स्थापित करना चाहता है। चीन ही नहीं बल्कि रूस, पाकिस्तान और ईरान भी इसी राह पर हैं। 
 

पीएम मोदी ने की पुतिन से बात
भारत के पीएम नरेंद्र मोदी ने 24 अगस्त को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ फोन पर बात की थी। अफगानिस्तान के मसले को लेकर इन दोनों नेताओं की बातचीत को बहुत अहम माना गया था। वजह, रूस का तालिबान के साथ लगातार संपर्क में रहना है। तालिबान सरकार ने अपने समारोह में चीन, पाकिस्तान और ईरान के अलावा रूस को भी आमंत्रित किया है। पीएम मोदी और व्लादिमीर पुतिन की बातचीत के बाद ही रूसी एनएसए निकोलाई पेशत्रेव भारत के दौरे पर पहुंचे हैं। दोनों देशों की सीक्रेट एजेंसियों के प्रमुख, एनएसए की बैठक में शामिल हुए हैं। सूत्रों का कहना है, दोनों देशों की सीक्रेट एजेंसियों ने सिक्योरिटी को लेकर कई तरह के अलर्ट और संभावनाओं को लेकर बातचीत की है। 

सीआईए के प्रमुख बर्न्स आएंगे भारत

अगले कुछ दिनों में अमेरिकी सीक्रेट एजेंसी 'सीआईए' के प्रमुख विलियम बर्न्स भारत आ सकते हैं। उनके साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत दोभाल बातचीत करेंगे। अफगानिस्तान की तालिबान सरकार में कई ऐसे लोगों को शामिल किया है, जो किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन या देशों की सूची में आतंकी रहे हैं। 

भारत के खिलाफ तालिबान के इस्तेमाल की मंशा
पूर्व राजनयिक अशोक सज्जनहार ने एक टीवी चर्चा में कहा, पाकिस्तान की मंशा है कि अब वह अफगानिस्तान के जरिए भारत को परेशान करे। पड़ोसी देश यही रणनीति बना रहा है कि किसी भी तरह तालिबानी सरकार का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया जाए। अभी कुछ दिनों तक तालिबान की सरकार कमजोर रहेगी। पाकिस्तान और चीन, इसी स्थिति का फायदा उठाना चाहते हैं। अमेरिका ने पाकिस्तान को 34 बिलियन डॉलर की सहायता दी थी। पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने साफतौर पर कह दिया था कि पाकिस्तान ने इस राशि का इस्तेमाल आतंकियों को मदद पहुंचाने में किया है। अब उसका प्रयास है कि तालिबान की सरकार इतनी कमजोर हो कि वह उसके अंगूठे के नीचे रहे। चीन भी पाकिस्तान के साथ आ गया है। उसकी भी वैसी ही मंशा है। वह भी अफगानिस्तान में खुद का 'स्ट्रैटेजिक डेप्थ' चाहता है। 

10 लाख उइगरों को चीन ने घेरा रखा है

चीन ने उइगर मुस्लिमों के साथ अमानवीय व्यहार किया है। इस बाबत वह कभी चर्चा नहीं करता। उसने एक मिलियन लोगों को घेर कर जबरदस्ती कैंपों में रोक रखा है। दुनिया की नजरों से अपनी हरकतों को छिपाने के लिए चीन ने झिंजियांग प्रांत में 'इस्लामिक चरमपंथी संगठनों' की उपस्थिति की खबर फैला दी है। इससे चीन को यह कहने में आसानी रहती है कि उसके नियंत्रण वाले झिंजियांग प्रांत में आतंकी समूह सक्रिय हैं। 

लिथियम खजाने पर भी चीन की नजर
अफगानिस्तान में लिथियम के खजाने पर भी चीन की नजर है। वखजीर दर्रे के साथ चीन और अफगानिस्तान की 80 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है। चीन चाहता है कि यह व्यापार के लिए खुल जाए। रणनीतिक कॉरिडोर 'बेल्ट-एंड-रोड इनिशिएटिव' और 'चीन-पाकिस्तान-अफगानिस्तान कॉरिडोर', इन बड़ी योजनाओं को अफगानिस्तान की मदद से जल्द पूरा किया जा सकता है।

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