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अफगान संकट: डोभाल-पत्रुशेव ने वार्ता में अफगानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका पर चिंता जताई

Thu, 09 Sep 2021 03:19 AM IST
सुरेंद्र जोशी शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Thu, 09 Sep 2021 03:19 AM IST
सार

भारत का पूरा जोर अमेरिका और रूस के साथ संतुलन बनाने पर है। रूस के एनएसए से आपसी चिंता पर चर्चा हुई। कतर से काबुल तक संबंध बनाने की कवायद जारी हैं। 
 

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Afghan crisis: PM Modi, Doval and Jaishankar are leaving no stone unturned to serve Indias interests
तालिबानी संकट - फोटो : ANI

विस्तार

अमेरिका से अफगानिस्तान की सेना वापसी ने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्थिति को झकझोर कर रख दिया है। इस बदले माहौल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, एनएसए अजीत डोभाल, विदेश मंत्री एस जयशंकर और विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रृंगला लगातार भारतीय हित साधने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय हितों को देखते हुए कई उच्चस्तरीय बैठकें की है। 

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भारत इस मसले पर लगातार अमेरिका के विदेश मंत्री और सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी तथा बाइडन प्रशासन के संपर्क में है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से तो खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 24 अगस्त को चर्चा की थी। विदेश मंत्री एस जयशंकर अपने अमेरिका और रूस के समकक्षों के संपर्क में हैं। 
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अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के प्रमुख विलियम बर्न्स भारत आए। उनसे चर्चा हुई और इसके ठीक बाद रूस की सिक्योरिटी काउंसिल के प्रमुख जनरल निकोलाई पेत्रुशेव ने बुधवार को एनएसए डोभाल से भेंट की। वह दो दिन के दौरे पर आए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, एनएसए अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर से भेंट की और भारत तथा रूस ने आपसी चिंताओं का साझा किया। 
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सूत्रों के मुताबिक, दोनों नेताओं की बातचीत के दौरान रूस ने अफगानिस्तान में उथल-पुथल के चलते मध्य एशिया में भी इस्लामिक कट्टरपंथी खतरा उभरने का डर जताया। वहीं भारत ने भी अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार में पाकिस्तान की भूमिका और उसमें कट्टरपंथियों को शामिल करने का जिक्र किया। दोनों देशों ने अफगानिस्तान में मजबूत पैठ रखने वाले लश्कर-ए-ताइबा और जैश-ए-मोहम्मद समेत कई आतंकी संगठनों को मध्य एशिया, रूस और भारत के लिए खतरा मानते हुए आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ाने, तालिबान को उसके वादों पर कायम रखने और आतंकी संगठन द्वारा अफगानिस्तान की जमीन का आतंकवाद के लिए इस्तेमाल न होने देने पर सहमति जताई। साथ ही, आतंकी समूहों को हथियारों की आपूर्ति और मादक पदार्थों की तस्करी जैसे मसलों पर भी चर्चा की।

निकोलाई पेत्रुशेव की यात्रा को काफी अहम माना जा रहा है। उनकी यह यात्रा सीआईए प्रमुख बर्न्स की यात्रा से ठीक बाद में हुई है। बर्न्स पिछले महीने भी भारत की यात्रा पर थे। उनके अलावा ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी के प्रमुख रिचर्ड मूर ने भी भारत की यात्रा की थी। एशिया और खासकर दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका काफी अहम है। इसलिए अमेरिका और रूस विश्व की दोनों महाशक्तियां भारत को साथ लेकर चलने में विश्वास रखती हैं। भारत एससीओ का भी सदस्य देश है और दोनों ही देशों से सामरिक, रणनीतिक साझेदारी सम्मानजनक स्थिति में है।

आतंकवाद असहनीय

एनएसए डोभाल और रूसी एनएसए पेत्रुशेव की चर्चा का मुख्य बिंदु क्षेत्रीय सुरक्षा ही था। समझा जा रहा है कि इस बैठक में देश के प्रमुख सुरक्षा अधिकारी भी शामिल थे। चर्चा में अफगानिस्तान के बदल रहे हालात का असर भारत पर पड़ने, पाकिस्तान के आतंकी संगठनों की सक्रियता बढ़ने, जम्मू-कश्मीर की नियंत्रण रेखा पर आतंकी घुसपैठ बढ़ने के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। रूस के एनएसए ने भी अपने दृष्टिकोण से अवगत कराया।

बागची बोले- धीरे-धीरे धुंध छंटेगी
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि रूस के खुफिया और सुरक्षा प्रमुख भारत आए हैं। इनसे चर्चा हुई है। भारत ने द्विपक्षीय, क्षेत्रीय अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और स्थिति को लेकर अपना पक्ष रखा है। रूस के सुरक्षा प्रमुख ने अपनी बात रखी है। अफगानिस्तान को लेकर भी चर्चा हुई है। बागची कहते हैं कि अभी स्पष्ट तौर पर कुछ कहना मुश्किल है। मेरे विचार में कुछ समय इंतजार करना चाहिए। धीरे-धीरे धुंध हटती जाएगी। स्थिति साफ होती जाएगी।  

दो अलग धाराओं में चल रहे हैं अमेरिका और रूस

अमेरिका ने जहां अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाया है, काबुल में दूतावास को बंद किया है, वहीं रूस, चीन के दूतावास काबुल में यथावत अपना काम कर रहे हैं। चीन, रूस, तुर्की, पाकिस्तान को तालिबान प्रशासन के साथ काम करने में न तो दिक्कत है और न ही मान्यता देने में कोई हिचक जैसी स्थिति। इसके समानांतर पश्चिमी देशों और भारत ने भी अपने काबुल स्थित दूतावास का काम कतर की राजधानी दोहा में शिफ्ट कर दिया है। अमेरिका के सामने भी दक्षिण एशिया और एशिया में अपने हितों के रक्षा की चुनौती खड़ी है। इसे साधने के लिए अमेरिकी प्रशासन के अधिकारियों ने भारत के साथ पाकिस्तान के दौरे बढ़ा दिए हैं। भारतीय रणनीतिकारों का कहना है कि अफगानिस्तान और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर रूस और अमेरिका की दिशा फिर अलग-अलग चल रही है। इसके समानांतर 'न काहू से दोस्ती और न काहू से बैर' की रणनीति पर चलकर भारत की चुनौती नीतिगत संतुलन बनाकर आगे बढ़ना है। 

भारत शांतिपूर्ण, स्थायी अफगानिस्तान का पक्षधर

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने अफगानिस्तान को लेकर भारत की नीति को कई बार स्पष्ट किया है। बागची के अनुसार भारत शांतिपूर्ण, स्थायी अफगानिस्तान चाहता है। गौरतलब है कि अमेरिका के अफगानिस्तान में सेना उतारने के बाद भी भारत की यही नीति थी। भारत ने वहां बांध, स्कूल, सड़क, संसद बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। 

दोहा में भारतीय राजदूत दीपक मित्तल से भेंट के दौरान भी तालिबान के नेता ने भारत से इस सहयोग को जारी रखने की अपील की थी। विदेश नीति के जानकार कहते हैं कि तालिबान की सरकार के साथ किसी तरह का कटुता का सवाल नहीं है। किसी भी तरह के दोस्ताना संबंध के बारे में सोचना और कहना दोनों अनुचित है। ऐसा माना जा रहा है कि भारत अभी मित्र देशों के माध्यम से और कूटनीति, रणनीति के जरिए तटस्थ संबंध बनाए रखने का पक्षधर है।

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