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अन्नदाता के सड़क पर आने की आशंका से सरकार को छूट रहा पसीना
शशिधर पाठक, अमर उजाला
Updated Fri, 01 Jun 2018 06:26 PM IST
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farmers protest
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मध्यप्रदेश के दौरे से लौटे केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने शरीर का पसीना भी नहीं पोछा था तब तक किसानों के आंदोलन की खबर ने उनकी, केन्द्र की और राज्य सरकार की नींद उड़ा कर रख दी है। केंद्रीय गृहमंत्रालय म.प्र. में हो रहे किसान आंदोलन से जुड़ी हर घटना का जहां अपडेट लेने में जुटा है, वहीं केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने भी सतर्कता बढ़ा दी है। सूत्र बताते हैं कि म.प्र. की शिवराज सिंह सरकार राज्य में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए हर जरूरी कदम उठा रही है।
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क्यों कर रहे हैं किसान आंदोलन
भारतीय किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष पुष्पेन्द्र सिंह का कहना है कि किसान कर्ज के बोझ से दबा है जिसकी वजह से वह भारी तनाव में है। किसानों के बीज का दाम तक नहीं मिल पा रहा है। आलू, टमाटर, प्याज का भाव भी नहीं मिल रहा है। यहां तक की गेंहू, धान आदि फसलों में लागत का आधा दाम भी वह नहीं निकाल पाए हैं। ऊपर से परिवहन लागत इतनी बढ़ गई है कि उनका जीना तक दूभर हो गया है। पुष्पेन्द्र सिंह ने बताया कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की है, लेकिन उस भाव से किसान के अनाज आदि की खरीद नहीं हो पा रही है। सरकार ने किसान को उसकी लागत का डेढ़ गुना देने के लिए कहा था। रबी की चार और खरीफ की चार फसलें चली गई। अभी तक सरकार ने इसकी घोषणा ही नहीं की है। बजट सत्र के दौरान सरकार ने जोर शोर से दावे किए थे और अब सुनने में आ रहा है कि रबी की फसल से किसानों को लागत का डेढ़ गुणा दिया जाए। गन्ना किसान अलग परेशान है। सरकार किसानों की दशा से बेखबर है।
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किसान नेता का कहना है कि ऐसे में किसान क्या करे? लोकतंत्र में उसके हाथ में आंदोलन ही है तो वह इस रास्ते को अपना रहा है।
मंदसौर के बाद क्यों सो गई सरकार
किसानों की स्थिति पर पुष्पेन्द्र कहते हैं कि जब पिछले साल जून में किसानों ने मंदसौर में आंदोलन किया था, गोलीबारी में कुछ किसानों की मौत हो गई थी लेकिन सरकार ने इसके बाद भी कुछ नहीं किया? उ.प्र. सरकार ने किसानों का कर्ज माफ करने के नाम पर क्या किया? पुष्पेन्द्र कहते हैं कि किसान आंदोलन की आग भले ही म.प्र. में दिखाई दे रही है, लेकिन इसकी लपट पूरे देश में दिखेगी। पिछले ही साल तमिलनाडु के किसान जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन करके लौटे हैं। किसान नेता का मानना है कि यह किसान आंदोलन म.प्र. ही नहीं महाराष्ट्र, उ.प्र., पंजाब, राजस्थान, समेत देश के कई राज्यों में भड़क सकता है। क्योंकि किसान बेहद परेशान और नाराज है।
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सरकार सतर्क
म.प्र. में चल रहे किसानों के आंदोलन को काबू में करने के लिए उच्च स्तर पर सतर्कता बरती जा रही है। व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया की निगरानी बढ़ा दी गई है। राज्य के 18 जिले बेहद संवेदनशील हैं। करीब 35 जिलों में कहीं से भी आंदोलन के भड़कने की आशंका व्यक्त की जा रही है। इसे देखते हुए राज्य सरकार विशेष पुलिस दल की 87 कंपनियों को तैनात कर रहा है। जबकि 5000 के करीब अतिरिक्त पुलिस बल को तैयार रहने को कहा गया है। राज्य सरकार को आशंका है करीब 150 किसान संगठन मिलकर म.प्र. में सरकार की परेशानी बढ़ा सकते हैं। इसके साथ-साथ आंदोलन को पनपने से रोकने के लिए म.प्र. राज्य सरकार सामाजिक स्तर से भी पहल करने की योजना बना रही है।
कहां- कहां भड़क सकता है आंदोलन
म.प्र. में इसी साल विधानसभा के चुनाव होने हैं। शिवराज सरकार चौथी बार सत्ता में आने के लिए यह चुनाव लड़ेगी। ऐसे में म.प्र. के मांडवा, खंडवा, खरगेन, मंदसौर, रतलाम, ग्वालियर, आगर, छिंदवाड़ा, देवास, नीमच, बालाघाट, भोपाल, मुरैना, हौशंगाबाद, सिहोर, हरदा समेत तमाम जिले किसान आंदोलन के लिए काफी व्याकुल दिखाई दे रहे हैं। उ.प्र.,गुजरात से सटे जिलों में आंदोलन के उग्र रूप लेने की भी आशंका है। माना जा रहा है कि यहां किसान आंदोलन की चिंगारी भडक़ने पर यह गुजरात, महाराष्ट्र, उ.प्र., पंजाब समेत अन्य राज्यों में फैल सकती है। इसलिए केन्द्र और राज्य सरकार हालात पर सीधी नजर बनाए हुए है।
आरोप और प्रत्यारोप भी
भारत जैसे लोकतंत्र में मुद्दा चाहे जैसा हो, लेकिन राजनीति और आरोप-प्रत्यारोप लगना आम है। भारतीय जनता पार्टी और म.प्र. की सरकार किसान आंदोलन को पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित बता रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इसको लेकर सफाई दे रहे हैं। जबकि कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि भाजपा के राज में किसानों की दुर्दशा बढ़ रही है। सरकार किसानों से केवल वादा करती है, उसे पूरा नहीं करती। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता आरपीएन सिंह का कहना है कि भाजपा ऐसा कुछ भी कहने के पहले अपने आईने में झांक कर देख लेना चाहिए।
राहुल गांधी तैयार हैं
चाहे यूपीए सरकार के समय में भट्टा पारसौल के किसानों का आंदोलन रहा हो या पिछले साल मंदसौर के किसानों का आंदोलन कांग्रेस के नेता राहुल गांधी पीठ नहीं दिखाते। भूमि अधिग्रहण को लेकर यूपीए सरकार के समय में लाए गए अध्यादेश को उन्होंने सार्वजनिक रूप से फाड़कर अपना प्रतिरोध जताया था। वह भट्ठा पारसौल भी गए थे। पिछले साल मंदसौर भी गए थे। कांग्रेस पार्टी के नेताओं के अनुसार राहुल गांधी किसानों की आवाज बनकर 6 जून को म.प्र. के मंदसौर फिर जाएंगे। वह किसानों के साथ उनकी मांगो को लेकर खड़े होंगे और किसानों का कर्जा माफ किए जाने की आवाज को बुलंद करेंगे।