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समुद्र के खारे पानी में छिपा लिथियम का खजाना: भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजी नई राह, तकनीक से कितनी होगी रिकवरी?
Tue, 20 Oct 2026 03:19 PM IST
डॉ. संजय पांडेय
अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क
Published by: डॉ. संजय पांडेय
Updated Tue, 20 Oct 2026 03:19 PM IST
सार
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) के वैज्ञानिकों ने समुद्री पानी से लिथियम निकालने की रासायनिक तकनीक विकसित की है, जिससे करीब 90 प्रतिशत लिथियम रिकवरी हासिल हुई। इस प्रक्रिया में मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे अवांछित तत्वों का 99 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हटाया गया। शोध के नतीजे वैज्ञानिक पत्रिका टैलंटा में प्रकाशित हुए हैं। कम विलायक के इस्तेमाल और उसके पुनः उपयोग की संभावना इस तकनीक को उपयोगी बनाती है।
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समुद्र के खारे पानी में छिपा लिथियम का खजाना
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर मोबाइल फोन और अक्षय ऊर्जा के भंडारण तक, लिथियम आधुनिक तकनीक की सबसे अहम जरूरतों में शामिल हो गया है। इसकी बढ़ती मांग के बीच भारतीय वैज्ञानिकों ने समुद्र के खारे पानी से इस कीमती धातु को निकालने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) के शोधकर्ताओं ने ऐसी रासायनिक तकनीक विकसित की है, जिससे समुद्री पानी में मौजूद लिथियम का करीब 90 प्रतिशत तक हासिल किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में लिथियम को अलग करने में बाधा बनने वाले मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे तत्वों का 99 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हटाने में सफलता मिली है। शोध के नतीजे वैज्ञानिक पत्रिका टैलंटा में प्रकाशित हुए हैं।
समुद्र में लिथियम की कुल मात्रा बहुत बड़ी मानी जाती है, लेकिन इसे हासिल करना आसान नहीं है। समुद्री पानी में इसकी सांद्रता बेहद कम होती है, जबकि मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे दूसरे तत्व कहीं अधिक मात्रा में मौजूद रहते हैं। इन तत्वों की मौजूदगी लिथियम को अलग करने की प्रक्रिया को जटिल बनाती है। ऐसे में ऐसी तकनीक विकसित करना जरूरी है, जो दूसरे तत्वों को हटाते हुए लिथियम को अधिकतम मात्रा में बचाए रख सके।बीएआरसी के वैज्ञानिकों ने इस चुनौती से निपटने के लिए पहले समुद्री पानी का रासायनिक उपचार किया। इसमें सोडियम हाइड्रॉक्साइड और सोडियम कार्बोनेट का इस्तेमाल कर पानी का पीएच स्तर बढ़ाया गया। इससे मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे अवांछित तत्वों को अलग करने में मदद मिली, जबकि लिथियम को घोल में बनाए रखा गया।
कम विलायक में बेहतर परिणाम
इसके बाद शोधकर्ताओं ने डाइबेंजोइलमीथेन नामक कार्बनिक पदार्थ और मिथाइल आइसोब्यूटाइल कीटोन (एमआईबीके) नामक विलायक की मदद से लिथियम को अलग किया। इस प्रक्रिया में ऑर्गेनिक और जलीय घोल का अनुपात 0.1 रखा गया। इसका अर्थ है कि एक लीटर उपचारित पानी के लिए लगभग 100 मिलीलीटर कार्बनिक विलायक इस्तेमाल हुआ।विलायक की कम खपत इस तकनीक की अहम विशेषता है। इससे भविष्य में रसायनों की जरूरत, परिचालन लागत और रासायनिक कचरे को कम करने की संभावना बन सकती है। हालांकि, वास्तविक बचत का आकलन औद्योगिक स्तर पर परीक्षण के बाद ही किया जा सकेगा।
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पांच चक्रों के बाद भी 90 फीसदी रिकवरी
लिथियम को विलायक से अलग करने के लिए पतले नाइट्रिक एसिड का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद विलायक को दोबारा उपयोग के लिए तैयार किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने पांच चक्रों तक परीक्षण किए, जिनमें लिथियम रिकवरी करीब 90 प्रतिशत बनी रही। हालांकि, हर चक्र में विलायक की लगभग 10 प्रतिशत मात्रा के भौतिक नुकसान की आशंका भी सामने आई, जिसकी भरपाई जरूरी हो सकती है।
व्यावसायिक इस्तेमाल से पहले और परीक्षण जरूरी
यह तकनीक लिथियम के संभावित नए स्रोत के रूप में उम्मीद जगाती है। यदि इसे बड़े पैमाने पर किफायती तरीके से अपनाया जा सका, तो इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के लिए जरूरी कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। इससे पारंपरिक खनन पर निर्भरता कम करने की संभावनाएं भी खुलेंगी।
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समुद्र में लिथियम की कुल मात्रा बहुत बड़ी मानी जाती है, लेकिन इसे हासिल करना आसान नहीं है। समुद्री पानी में इसकी सांद्रता बेहद कम होती है, जबकि मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे दूसरे तत्व कहीं अधिक मात्रा में मौजूद रहते हैं। इन तत्वों की मौजूदगी लिथियम को अलग करने की प्रक्रिया को जटिल बनाती है। ऐसे में ऐसी तकनीक विकसित करना जरूरी है, जो दूसरे तत्वों को हटाते हुए लिथियम को अधिकतम मात्रा में बचाए रख सके।बीएआरसी के वैज्ञानिकों ने इस चुनौती से निपटने के लिए पहले समुद्री पानी का रासायनिक उपचार किया। इसमें सोडियम हाइड्रॉक्साइड और सोडियम कार्बोनेट का इस्तेमाल कर पानी का पीएच स्तर बढ़ाया गया। इससे मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे अवांछित तत्वों को अलग करने में मदद मिली, जबकि लिथियम को घोल में बनाए रखा गया।
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कम विलायक में बेहतर परिणाम
इसके बाद शोधकर्ताओं ने डाइबेंजोइलमीथेन नामक कार्बनिक पदार्थ और मिथाइल आइसोब्यूटाइल कीटोन (एमआईबीके) नामक विलायक की मदद से लिथियम को अलग किया। इस प्रक्रिया में ऑर्गेनिक और जलीय घोल का अनुपात 0.1 रखा गया। इसका अर्थ है कि एक लीटर उपचारित पानी के लिए लगभग 100 मिलीलीटर कार्बनिक विलायक इस्तेमाल हुआ।विलायक की कम खपत इस तकनीक की अहम विशेषता है। इससे भविष्य में रसायनों की जरूरत, परिचालन लागत और रासायनिक कचरे को कम करने की संभावना बन सकती है। हालांकि, वास्तविक बचत का आकलन औद्योगिक स्तर पर परीक्षण के बाद ही किया जा सकेगा।
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पांच चक्रों के बाद भी 90 फीसदी रिकवरी
लिथियम को विलायक से अलग करने के लिए पतले नाइट्रिक एसिड का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद विलायक को दोबारा उपयोग के लिए तैयार किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने पांच चक्रों तक परीक्षण किए, जिनमें लिथियम रिकवरी करीब 90 प्रतिशत बनी रही। हालांकि, हर चक्र में विलायक की लगभग 10 प्रतिशत मात्रा के भौतिक नुकसान की आशंका भी सामने आई, जिसकी भरपाई जरूरी हो सकती है।
व्यावसायिक इस्तेमाल से पहले और परीक्षण जरूरी
यह तकनीक लिथियम के संभावित नए स्रोत के रूप में उम्मीद जगाती है। यदि इसे बड़े पैमाने पर किफायती तरीके से अपनाया जा सका, तो इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के लिए जरूरी कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। इससे पारंपरिक खनन पर निर्भरता कम करने की संभावनाएं भी खुलेंगी।