84 फीसदी लोगों को नहीं पता ये कानून, रोजाना खो रहीं कीमती जिंदगी
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अच्छा समरिटिन (नेक नागरिक या मददगार) कानून-2016 सड़क दुर्घटना में पीड़ित लोगों को मदद पहुंचाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। अच्छा समरिटिन कानून नागरिकों को पुलिस और एजेंसी के उत्पीड़न के डर के बिना पीड़ितों को प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध कराने के लिए प्रेरित करता है। लेकिन लागू होने के दो साल बाद भी 84 फीसदी लोगों को इस बारे में कुछ भी पता नहीं है।
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सेवलाइफ फाउंडेशन द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर किए गए अध्ययन से पता चलता है कि इस कानून का पालन अस्पताल और पुलिस का काम करने वाले भी नहीं करते, जबकि ये लोग इस कानून के बारे में जानते हैं।
चलिए जानते हैं कि क्या कहते हैं आंकड़े-
- भारत में हर साल सड़क दुर्घटनाओं के कारण 1.5 लाख लोगों की मौत होती है।
- लॉ कमीशन ऑफ इंडिया के मुताबिक अगर समय पर सहायता प्रदान की जाती तो इनमें से 50 फीसदी लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
- पीड़ितों की जान बचाने के लिए आसपास खड़े लोग एक अच्छे समरिटिन की भूमिका बखूबी निभा सकते हैं। इससे पीड़ितों की जान बचाई जा सकती है।
- भारत में अच्छा नागरिक कानून (गुड समरिटिन कानून) साल 2016 से है।
- इसके तहत सड़क दुर्घटना की जानकारी देने के लिए अगर कोई पुलिस कंट्रोल रूम (पीसीआर) को फोन करता है तो उससे उसकी पहचान नहीं पूछी जाएगी।
- ऐसे व्यक्ति को गवाह बनने के लिए भी मजबूर नहीं किया जाएगा। अगर वह खुद गवाही देना चाहे तो ही उसकी गवाही ली जाएगी। अगर इस दौरान पीड़ित घायल हो या फिर उसकी मौत हो जाए तो फोन कर जानकारी देने वाले के खिलाफ कोई भी आपराधिक या सिविल मामला दर्ज नहीं किया जाएगा।
- उसे पीड़ित के इलाज के लिए पैसे देने को भी नहीं कहा जा सकता।
- 84 फीसदी लोग इस कानून के बारे में नहीं जानते। जो 16 फीसदी लोग जानते भी हैं, उनमें से भी 88 फीसदी ही पीड़ित की सहायता करने के इच्छुक होते हैं।
- लेकिन इनमें से आधे से ज्यादा को पता ही नहीं होता कि मदद किस प्रकार करनी है।
- आसपास खड़े लोगों में से 33 फीसदी को पुलिस द्वारा प्रताड़ित होने का डर सताता है और 29 फीसदी को कानूनी कार्यवाही का डर रहता है।
- इनका डर भी गलत नहीं है। 59 फीसदी अच्छे समरिटिन को पुलिस उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। उन्हें तुरंत घटनास्थल से जाने भी नहीं जाता।
- 57 फीसदी से अस्पताल उनकी जानकारी मांगता है।
- 22 फीसदी को अस्पताल ही हिरासत में ले लेता है।
- 64 फीसदी पुलिस अधिकारियों ने ये बात स्वीकार की है कि वह अच्छे समरिटिन से उनकी निजी जानकारी मांगते हैं।
- 58 फीसदी पुलिस अधिकारियों का मानना है कि वह अच्छे समरिटिन की जानकारियां रिकॉर्ड करते हैं।
- 57 फीसदी अस्पतालों ने माना है कि वह अच्छे समरिटिन की निजी जानकारियां लेते हैं।
इन आंकड़ों से साफ है कि कानून को लेकर लोगों में जागरुकता की बेहद कमी है। साथ ही इसे प्रभावी तरीके से लागू भी नहीं किया गया है। अगर सरकार सड़क पर लोगों का कीमती जीवन बचाना चाहती है तो उसे पुलिस और अस्पताल दोनों को अच्छा समरिटिन कानून-2016 की जानकारी देने की जरूरत है।
सोर्स: नेशनल स्टडी ऑन इम्पैक्ट ऑफ गुड समिरिटन लॉ, 2018।