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Report: तीन दशक में पक्षियों की 60 फीसदी प्रजातियों की घटी आबादी, कबूतर-मोर और कोयल की स्थिति ठीक
Fri, 25 Aug 2023 07:15 PM IST
Jeet Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Jeet Kumar
Updated Fri, 25 Aug 2023 07:15 PM IST
सार
भारत में पिछले 30 वर्षों में 338 प्रजातियों के पक्षियों की संख्या में बदलावों पर अध्ययन किया गया, जिनमें से 60 फीसदी प्रजातियों की तादाद में गिरावट देखी गई।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
देश में तीन दशक में पक्षियों की करीब 60 फीसदी प्रजातियां घट गई है। सात वर्ष में 359 प्रजातियों पर किए अध्ययन में पता चला है कि 142 प्रजातियों की आबादी में भारी कमी आई है। देशभर के 30,000 से ज्यादा पक्षी प्रेमियों ने पिछले 30 वर्षों में संख्या में बदलाव के लिहाज से 338 प्रजातियों का अध्ययन किया है। भारत के पक्षियों की स्थिति शीर्षक से रिपोर्ट प्रकाशित हुई है।
अध्ययन में गिरावट की दीर्घकालिक प्रवृत्ति (30 वर्षों में), वर्तमान प्रवृत्ति (पिछले सात वर्षों में) और वितरण सीमा का मूल्यांकन किया गया है। देश में 942 पक्षी प्रजातियों में से 338 प्रजातियों के दीर्घकालिक रुझानों का अध्ययन किया गया। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी, भारतीय वन्यजीव संस्थान, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण सहित 13 सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों के एक समूह की तरफ से प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से 204 प्रजातियां घट गई हैं, 98 स्थिर हैं और 36 बढ़ गई हैं।
178 प्रजातियों का उच्च संरक्षण जरूरी
359 प्रजातियों के अध्ययन में सामने आया कि 64 प्रजातियों की संख्या में तेजी से कमी आई है। 189 स्थिर हैं और 28 में वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में नॉर्दर्न शॉवेलर, नॉर्दर्न पिंटेल, कॉमन टील, टफ्टेड डक, ग्रेटर फ्लेमिंगो, सारस क्रेन, इंडियन कौरसर और अंडमान सर्पेंट ईगल सहित 178 प्रजातियों को संवेदनशील बताते हुए इन्हें विलुप्त होने से बचाने के लिए उच्च संरक्षण प्राथमिकता क्षेत्र में रखने का सुझाव दिया गया है। वहीं, इंडियन रोलर, कॉमन टील, नॉर्दर्न शॉवेलर और कॉमन सैंडपाइपर सहित चौदह प्रजातियों की संख्या में 30 फीसदी या उससे अधिक की गिरावट आई है।
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पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरे का संकेत
नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक एम आनंद कुमार कहा, रिपोर्ट का मकसद यह बताना है कि कई स्थानिक प्रजातियां संकट का सामना कर रही हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र के लिहाज से चिंताजनक बात है, क्योंकि उनका अस्तित्व पूरी तरह से हमारे हाथों में है। वहीं, वेटलैंड्स इंटरनेशनल के दक्षिण एशिया क्षेत्र के निदेशक रितेश कुमार ने कहते हैं कि बत्तख और शोरबर्ड सहित कई वेटलैंड पक्षियों की स्थिति चिंताजनक है।
शहरीकरण ने छीना घर
रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले कुछ दशकों में शहरीकरण, मोनोकल्चर और बुनियादी ढांचे के विकास के पक्षियों के आवास को नुकसान पहुंचा है, जिससे पक्षियों की विविधता और संख्या दोनों प्रभावित हो रही हैं।
फल खाने वाले पक्षियों पर संकट गहराया...
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ई-बर्ड पर अपलोड डाटा का उपयोग करके तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार, बाया वीवर और पाइड बुशचैट जैसी अन्य सामान्य प्रजातियां अपेक्षाकृत स्थिर हैं। आहार के मामले में, मांसाहारी, कीटभक्षी और दानेदार जानवरों की संख्या सर्वाहारी या फल खाने वालों की तुलना में अधिक तेजी से घट रही है।
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अध्ययन में गिरावट की दीर्घकालिक प्रवृत्ति (30 वर्षों में), वर्तमान प्रवृत्ति (पिछले सात वर्षों में) और वितरण सीमा का मूल्यांकन किया गया है। देश में 942 पक्षी प्रजातियों में से 338 प्रजातियों के दीर्घकालिक रुझानों का अध्ययन किया गया। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी, भारतीय वन्यजीव संस्थान, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण सहित 13 सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों के एक समूह की तरफ से प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से 204 प्रजातियां घट गई हैं, 98 स्थिर हैं और 36 बढ़ गई हैं।
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178 प्रजातियों का उच्च संरक्षण जरूरी
359 प्रजातियों के अध्ययन में सामने आया कि 64 प्रजातियों की संख्या में तेजी से कमी आई है। 189 स्थिर हैं और 28 में वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में नॉर्दर्न शॉवेलर, नॉर्दर्न पिंटेल, कॉमन टील, टफ्टेड डक, ग्रेटर फ्लेमिंगो, सारस क्रेन, इंडियन कौरसर और अंडमान सर्पेंट ईगल सहित 178 प्रजातियों को संवेदनशील बताते हुए इन्हें विलुप्त होने से बचाने के लिए उच्च संरक्षण प्राथमिकता क्षेत्र में रखने का सुझाव दिया गया है। वहीं, इंडियन रोलर, कॉमन टील, नॉर्दर्न शॉवेलर और कॉमन सैंडपाइपर सहित चौदह प्रजातियों की संख्या में 30 फीसदी या उससे अधिक की गिरावट आई है।
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पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरे का संकेत
नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक एम आनंद कुमार कहा, रिपोर्ट का मकसद यह बताना है कि कई स्थानिक प्रजातियां संकट का सामना कर रही हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र के लिहाज से चिंताजनक बात है, क्योंकि उनका अस्तित्व पूरी तरह से हमारे हाथों में है। वहीं, वेटलैंड्स इंटरनेशनल के दक्षिण एशिया क्षेत्र के निदेशक रितेश कुमार ने कहते हैं कि बत्तख और शोरबर्ड सहित कई वेटलैंड पक्षियों की स्थिति चिंताजनक है।
शहरीकरण ने छीना घर
रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले कुछ दशकों में शहरीकरण, मोनोकल्चर और बुनियादी ढांचे के विकास के पक्षियों के आवास को नुकसान पहुंचा है, जिससे पक्षियों की विविधता और संख्या दोनों प्रभावित हो रही हैं।
फल खाने वाले पक्षियों पर संकट गहराया...
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ई-बर्ड पर अपलोड डाटा का उपयोग करके तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार, बाया वीवर और पाइड बुशचैट जैसी अन्य सामान्य प्रजातियां अपेक्षाकृत स्थिर हैं। आहार के मामले में, मांसाहारी, कीटभक्षी और दानेदार जानवरों की संख्या सर्वाहारी या फल खाने वालों की तुलना में अधिक तेजी से घट रही है।