NLU: देश में 561 कैदी झेल रहे मौत की सजा, 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड के चार आरोपियों को किया बरी
सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड की अपील में चार कैदियों को रिहा कर दिया क्योंकि कोर्ट को सुनवाई के दौरान पता चला कि अपराध के समय दोनों आरोपी बच्चे थे। मृत्युदंड के दो मामलो को दोबारा ट्रायल और उच्च न्यायालय भेज दिया गया।
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विस्तार
देश में मृत्युदंड पाए कैदियों की संख्या 561 हो गई है। यह 20 साल में सर्वाधिक है। इसमें 2015 के मुकाबले 45.71 प्रतिशत इजाफा हुआ है। 2023 में निचली अदालतों ने 88 मामलों में 120 लोगों को मृत्युदंड सुनाया। राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय दिल्ली के प्रोजेक्ट 39ए की रिपोर्ट ‘भारत में मौत की सजा : सालाना आंकड़े’ ने यह दावा किया है। यह भी बताया कि अपीलीय अदालतों ने केवल 1 मामले में सजा बनाए रखी, यह 20 साल में सबसे कम है। लगातार दूसरे साल सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी निस्तारित मामले में मौत की सजा बरकरार नहीं रखी। वहीं भारत की राष्ट्रपति ने मार्च 2023 में एक दया याचिका खारिज की। इसमें अपराधी ने 2008 में एक नाबालिग का अपहरण कर दुष्कर्म किया था और फिर उसकी हत्या कर दी थी। रिपोर्ट ने बताया कि 2022 में 541 और 2021 में 490 कैदी मृत्युदंड का इंतजार कर रहे थे। इन दोनों वर्षों में क्रमश: 167 व 146 लोगों को यह सजा सुनाई गई थी।
दुष्कर्म-हत्या पीड़ित : 75 प्रतिशत 12 साल से छोटे
दुष्कर्म व हत्या में मृत्युदंड पाने वाले अपराधियों के 75 प्रतिशत पीड़ित 12 साल से भी कम उम्र के थे। वहीं 15.4 प्रतिशत की उम्र 12 से 18 साल और 5.8 प्रतिशत की 18 से अधिक थी।
इन अपराधों में मिली सजा
2023 में निचली अदालतों से मृत्युदंड पाने वाले 120 लोगों में से 64 ने दुष्कर्म व हत्या की थी, 42 ने हत्या और 4 ने अपहरण व हत्या। वहीं 10 आतंकी भी थे। रिपोर्ट के अनुसार ट्रायल कोर्ट में 86.96 प्रतिशत मामलों में आरोपी के बारे में जेल से जानकारियां लिए बिना निर्णय दिए। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश में जेल में आरोपियों के आचरण, समीक्षा अधिकारियों की रिपोर्ट और मनोचिकित्सकीय रिपोर्ट का मूल्यांकन करने को कहा है।
निष्कर्ष : इसलिए बरकरार नहीं रखी जा रही सजाएं
रिपोर्ट का दावा है कि पुलिस जांच में खामियों और निचली अदालतों में पेश साक्ष्यों के गुण-दोष परखने के तरीकों की वजह से सजा ए मौत के मामलों में रिहाई या मामले निचली अदालतों को लौटाने के हालात बन रहे हैं। विभिन्न हाईकोर्ट को निचली अदालत की सुनवाई में फॉरेंसिक साक्ष्यों पर बहस में अहम कमियां भी मिलीं। सजा सुनाने की प्रक्रिया में भी असावधानी बरती गई थी।
28 साल बाद पता चला आरोपी नाबालिग था
सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड पाए एक व्यक्ति को रिहा करते हुए कहा कि वह अपराध के समय बच्चा था। उस व्यक्ति को 25 साल पहले मृत्युदंड सुनाया गया था। वह 28 साल से ही जेल में था। कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक याचिका स्वीकार कर अपराधी के मृत्युदंड को उम्रकैद में बदला।
यूपी में सबसे ज्यादा सजा ए मौत
- यूपी 119
- झारखंड 39
- गुजरात 72
- हरियाणा 28
- मध्यप्रदेश 30
- बंगाल 21
- जम्मू कश्मीर 18
- दिल्ली 4
- पंजाब 12
- उत्तराखंड 23
- हिमाचल 3
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