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26/11: मुंबई हमले में लाडली को खोने वाले ITBP के आईजी को मिली थी कसाब की सुरक्षा की जिम्मेदारी, पढ़ें ये कहानी
Sun, 26 Nov 2023 01:01 PM IST
जितेंद्र भारद्वाज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: जितेंद्र भारद्वाज
Updated Sun, 26 Nov 2023 01:01 PM IST
सार
मुंबई हमले के बाद में कसाब की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उस अर्धसैनिक बल को मिली, जिसके ऑपरेशन की जिम्मेदारी जैसमीन के पिता और आईटीबीपी के तत्कालीन आईजी (ऑपरेशन) एमएस भुर्जी निभा रहे थे। उन्होंने अपनी बिटिया के हत्यारे को फांसी के फंदे पर लटकने तक उसकी सुरक्षा करने में कोई चूक नहीं होने दी।
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26/11 मुंबई हमला
- फोटो : AMAR UJALA
विस्तार
जिस पिता ने अपनी लाडली को गोद में खिलाया, उंगली पकड़ कर उसे चलना सिखाया। इसके बाद वह दिन भी आया, जब वह पिता अपनी बेटी के हाथ पीले करने की तैयारी करने लगा। उसे नहीं मालूम था कि लिखने वाले ने उसके लिए कुछ और ही लिख दिया था। मुंबई हमले में उसकी बेटी को आतंकी कसाब ने मार दिया। किस्मत का खेल देखिए, इसके बाद जेल में कसाब की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी आईटीबीपी को सौंपी गई। आईटीबीपी में आईजी रहे पिता के सामने, ड्यूटी व जज्बात, इनमें से किसी एक राह पर चलने की चुनौती थी। लेकिन बेटी जैसमीन को खो चुके पिता ने जज्बात पर काबू पाकर अपनी ड्यूटी की राह पकड़ ली।
मुंबई हमले के बाद में कसाब की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उस अर्धसैनिक बल को मिली, जिसके ऑपरेशन की जिम्मेदारी जैसमीन के पिता और आईटीबीपी के तत्कालीन आईजी (ऑपरेशन) एमएस भुर्जी निभा रहे थे। उन्होंने अपनी बिटिया के हत्यारे को फांसी के फंदे पर लटकने तक उसकी सुरक्षा करने में कोई चूक नहीं होने दी। भुर्जी 2017 में रिटायर हुए थे। मुंबई के 26/11 के हमले के दौरान होटल ओबरॉय ट्रायडेंट में आतंकवादियों की पहली गोली रिसेप्शन पर मौजूद जैसमीन को लगी थी। कसाब की फांसी के बाद उस पिता के दिल को थोड़ा सुकून मिला, जिसने उसकी लाडली जैसमीन को छीन लिया था। कई वर्ष पहले हुई बातचीत में एमएस भुर्जी का कहना था कि घाव अभी नहीं भरे। थोड़ा सुकून इसलिए है कि निर्दोष लोगों को मारने वाले कसाब की फांसी से वे देश सबक लेंगे, जो तोड़फोड़ की मंशा रखते हैं।
उन्होंने बताया था, होटल प्रबंधन की पढ़ाई करने के बाद जैसमीन, ताज मुंबई में ट्रेनिंग के लिए गई थी। हमें ही नहीं, बल्कि परिवार और रिश्तेदारों को भी वह खूब हंसाती थी। बेशक वह फोन पर बात करती, मगर ऐसा लगता था कि जैसे सामने बैठकर बोल रही है। ड्यूटी के दौरान भी उसका यह अंदाज नहीं बदला। मोहाली में अंतिम संस्कार के वक्त होटल प्रबंधन से आए अधिकारियों ने जब परिवार के साथ उसकी यादें सांझा की तो कोई अपने आंसू नहीं रोक पाया था। एमएस भुर्जी ने कहा, इस तरह के मामलों का निपटारा होने में दशक लग जाते हैं। कसाब के मामले में कानून की चुस्ती-फुर्ती काबिल-ए-तारीफ है। यह फैसला एक उदाहरण बनना चाहिए। हम बदले की भावना से काम नहीं करते। खासतौर से आतंकियों का समर्थन करने वाले देश अब यह सोचें कि भारत इस तरह का निर्णय भी ले सकता है।
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मुंबई की आर्थर रोड जेल में पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब की सुरक्षा पर आईटीबीपी के 34 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इस राशि का भुगतान होने में कई साल लग गए। लम्बे समय तक महाराष्ट्र सरकार और गृह मंत्रालय यही तय नहीं कर पाए कि इस राशि का भुगतान कौन करेगा। आईटीबीपी के दो सौ कमांडों कसाब की सुरक्षा में लगे थे। कसाब के मामले की सुनवाई के लिए जेल में जो खास सुरंग बनाई गई थी, उसे बमरोधी बनाने के लिए भी आईटीबीपी ने ही प्लान तैयार किया था। कुछ अफसरों का यह भी मानना था कि कसाब की सुरक्षा पर खर्च हुए करोड़ों रुपये प्रत्यक्ष तौर से व्यर्थ चले गए। भारत-चीन सीमा या नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में आईटीबीपी के जवान लगते तो उनका सार्थक नतीजा भी सामने आता। इतना ही नहीं, कसाब की सुरक्षा पर खर्च हुई राशि से 22600 एके-47 या फिर एक्स-95 जैसे अत्याधुनिक हथियार खरीदे जा सकते थे।
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मुंबई हमले के बाद में कसाब की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उस अर्धसैनिक बल को मिली, जिसके ऑपरेशन की जिम्मेदारी जैसमीन के पिता और आईटीबीपी के तत्कालीन आईजी (ऑपरेशन) एमएस भुर्जी निभा रहे थे। उन्होंने अपनी बिटिया के हत्यारे को फांसी के फंदे पर लटकने तक उसकी सुरक्षा करने में कोई चूक नहीं होने दी। भुर्जी 2017 में रिटायर हुए थे। मुंबई के 26/11 के हमले के दौरान होटल ओबरॉय ट्रायडेंट में आतंकवादियों की पहली गोली रिसेप्शन पर मौजूद जैसमीन को लगी थी। कसाब की फांसी के बाद उस पिता के दिल को थोड़ा सुकून मिला, जिसने उसकी लाडली जैसमीन को छीन लिया था। कई वर्ष पहले हुई बातचीत में एमएस भुर्जी का कहना था कि घाव अभी नहीं भरे। थोड़ा सुकून इसलिए है कि निर्दोष लोगों को मारने वाले कसाब की फांसी से वे देश सबक लेंगे, जो तोड़फोड़ की मंशा रखते हैं।
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उन्होंने बताया था, होटल प्रबंधन की पढ़ाई करने के बाद जैसमीन, ताज मुंबई में ट्रेनिंग के लिए गई थी। हमें ही नहीं, बल्कि परिवार और रिश्तेदारों को भी वह खूब हंसाती थी। बेशक वह फोन पर बात करती, मगर ऐसा लगता था कि जैसे सामने बैठकर बोल रही है। ड्यूटी के दौरान भी उसका यह अंदाज नहीं बदला। मोहाली में अंतिम संस्कार के वक्त होटल प्रबंधन से आए अधिकारियों ने जब परिवार के साथ उसकी यादें सांझा की तो कोई अपने आंसू नहीं रोक पाया था। एमएस भुर्जी ने कहा, इस तरह के मामलों का निपटारा होने में दशक लग जाते हैं। कसाब के मामले में कानून की चुस्ती-फुर्ती काबिल-ए-तारीफ है। यह फैसला एक उदाहरण बनना चाहिए। हम बदले की भावना से काम नहीं करते। खासतौर से आतंकियों का समर्थन करने वाले देश अब यह सोचें कि भारत इस तरह का निर्णय भी ले सकता है।
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मुंबई की आर्थर रोड जेल में पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब की सुरक्षा पर आईटीबीपी के 34 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इस राशि का भुगतान होने में कई साल लग गए। लम्बे समय तक महाराष्ट्र सरकार और गृह मंत्रालय यही तय नहीं कर पाए कि इस राशि का भुगतान कौन करेगा। आईटीबीपी के दो सौ कमांडों कसाब की सुरक्षा में लगे थे। कसाब के मामले की सुनवाई के लिए जेल में जो खास सुरंग बनाई गई थी, उसे बमरोधी बनाने के लिए भी आईटीबीपी ने ही प्लान तैयार किया था। कुछ अफसरों का यह भी मानना था कि कसाब की सुरक्षा पर खर्च हुए करोड़ों रुपये प्रत्यक्ष तौर से व्यर्थ चले गए। भारत-चीन सीमा या नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में आईटीबीपी के जवान लगते तो उनका सार्थक नतीजा भी सामने आता। इतना ही नहीं, कसाब की सुरक्षा पर खर्च हुई राशि से 22600 एके-47 या फिर एक्स-95 जैसे अत्याधुनिक हथियार खरीदे जा सकते थे।