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26/11 की चश्मदीद देविका ने कहा, हाफिज को भारत लाकर देनी चाहिए फांसी
संजय मिश्र/नई दिल्ली
Updated Sun, 26 Nov 2017 06:35 PM IST
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देविका
- फोटो : ANI
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26/11 के घटना की चश्मदीद गवाह देविका जिसके साहस के बदौलत आतंकी अजमल कसाब को फांसी मिल सकी। आज तंगी और बदहाली का जीवन जीने को मजबूर है। बावजूद उसके देविका के हौसले कमजोर नहीं पड़े हैं। देविका चाहती है कि 26/11 आतंकी हमले का मास्टरमाइंड हाफिज सईद पर यदि पाक कार्रवाई नहीं करता है तो उसे पकड़कर भारत लाया जाए।
अमर उजाला से बातचीत में देविका ने कहा कि हाफिज सरीखे आतंकी मास्टरमाइंड को जीने का अधिकार नहीं है। उसे भारत लाकर फांसी पर लटका देना चाहिए। पाक जेल से उसकी रिहाई का विरोध करते हुए देविका ने कहा कि इस मामले पर भारत सरकार को सख्त रवैया अपनाना चाहिए। पाकिस्तान को हाफिज की रिहाई नहीं करनी चाहिए थी। देविका ने भारत सरकार से मांग की है कि हाफिज सरीखे मामलों से सबक लेकर हमें आतंक और उसमें शामिल लोगों के खिलाफ कठोर कानून बनाना चाहिए। हाफिज को कैसे भी पकड़कर भारत में लाकर सबक देना चाहिए।
पढ़ें- 26/11 आतंकी हमला: 'मैंने भी देखा था वो खूनी मंजर'
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आतंकियों का खात्मा करने को आईपीएस बनने की चाह
26/11 घटना के दोषी आतंकी अजमल कसाब के खिलाफ गवाही देने वाली साहसी देविका को इन दिनों जीवन में काफी संकटों का सामना करना पड़ रहा है। बावजूद उसके देविका के हौसलों में कमी नहीं है। देविका ने कहा कि वे पढ़-लिखकर जीवन में आईपीएस अधिकारी बनना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि वे आतंकियों का खात्मा करना चाहती हैं। इसलिए आईपीएस अधिकारी बनने की चाह है।
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अमर उजाला से बातचीत में देविका ने कहा कि हाफिज सरीखे आतंकी मास्टरमाइंड को जीने का अधिकार नहीं है। उसे भारत लाकर फांसी पर लटका देना चाहिए। पाक जेल से उसकी रिहाई का विरोध करते हुए देविका ने कहा कि इस मामले पर भारत सरकार को सख्त रवैया अपनाना चाहिए। पाकिस्तान को हाफिज की रिहाई नहीं करनी चाहिए थी। देविका ने भारत सरकार से मांग की है कि हाफिज सरीखे मामलों से सबक लेकर हमें आतंक और उसमें शामिल लोगों के खिलाफ कठोर कानून बनाना चाहिए। हाफिज को कैसे भी पकड़कर भारत में लाकर सबक देना चाहिए।
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आतंकियों का खात्मा करने को आईपीएस बनने की चाह
26/11 घटना के दोषी आतंकी अजमल कसाब के खिलाफ गवाही देने वाली साहसी देविका को इन दिनों जीवन में काफी संकटों का सामना करना पड़ रहा है। बावजूद उसके देविका के हौसलों में कमी नहीं है। देविका ने कहा कि वे पढ़-लिखकर जीवन में आईपीएस अधिकारी बनना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि वे आतंकियों का खात्मा करना चाहती हैं। इसलिए आईपीएस अधिकारी बनने की चाह है।
देश के लिए खड़ी हूं-देविका
देविका
भारत की इस साहसी बेटी का कहना है कि जीवन में मुश्किलों का सामना करने के बावजूद भी वे देश के लिए खड़ी हैं। अपने दर्द की दास्तां बताते हुए उन्होंने अमर उजाला से कहा कि कभी-कभी लगता है कि मेरे साथ गलत हुआ। लेकिन आतंक के खिलाफ देश के लिए खड़ी हूं। इन दिनों वे टीबी की बीमारी से ग्रसित हैं, तो पिता की माली हालत ठीक न होने की वजह से मुंबई के झुग्गी-बस्ती में जीवन गुजारने को मजबूर हैं। कसाब के खिलाफ गवाही देकर आतंकवादियों के निशाने पर आने वाली देविका और उनके पिता नटवरलाल का बहिष्कार उनके अपनों ने भी किया हुआ है। उनके रिश्तेदारों को भय सता रहा है कि देविका से दुश्मनी के वजह से आतंकी उन्हें निशाना न बना लें। लेकिन देविका कहती हैं कि लोगों को बहिष्कार नहीं करना चाहिए। बल्कि चुनौतियों से मुकाबला करना चाहिए।
सरकार से चाहती हैं पढ़ाई में मदद
तमाम चुनौतियों का सामना कर रही देविका से जब पूछा गया कि वे सरकार से क्या मदद चाहती हैं। तो दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली देविका ने कहा कि वे सरकार से रहने का बंदोबस्त और पढ़ाई के खर्च का मदद चाहती हैं। ताकि आईपीएस बनकर आतंकियों का खात्मा करने का उनका मकसद पूरा हो सके।
सरकार से चाहती हैं पढ़ाई में मदद
तमाम चुनौतियों का सामना कर रही देविका से जब पूछा गया कि वे सरकार से क्या मदद चाहती हैं। तो दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली देविका ने कहा कि वे सरकार से रहने का बंदोबस्त और पढ़ाई के खर्च का मदद चाहती हैं। ताकि आईपीएस बनकर आतंकियों का खात्मा करने का उनका मकसद पूरा हो सके।
क्या है देविका की दास्तां
मुंबई अटैक
दरअसल 26/11 की घटना के वक्त देविका मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल रेलवे स्टेशन पर मौजूद थीं। उनके पैर में आतंकी के जरिए चलाई गोली भी लगी थी। जिसके वजह से वह कुछ वर्षों तक लंगड़ाती रहीं। कसाब के खिलाफ गवाही देते हुए उन्होंने जून 2011 में मुंबई की अदालत में हमलावर कसाब को पहचान लिया। देविका की गवाही के बदौलत की कसाब को फांसी हो सकी। लेकिन राजस्थान जिले के पाली निवासी नटवरलाल की इस बेटी को परिवार के संग देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में रहते हुए भी तंगी और बदहाली का सामना करना पड़ रहा है।
यह आलम तब है जब 26/11 की बरसी पर हर साल सरकार उसे सम्मानित करने को मंच पर बुलाती है। मगर उसकी और उसके परिवार की बदहाली की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। बावजूद उसके देविका के हौसले बुलंद हैं। देश-दुनिया से वे आतंक को मिटाने का सपना देख रही हैं।
यह आलम तब है जब 26/11 की बरसी पर हर साल सरकार उसे सम्मानित करने को मंच पर बुलाती है। मगर उसकी और उसके परिवार की बदहाली की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। बावजूद उसके देविका के हौसले बुलंद हैं। देश-दुनिया से वे आतंक को मिटाने का सपना देख रही हैं।