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उपलब्धि: मुंबई में झुग्गियों की दुर्दशा पीयूष को प्रेरणा! तकनीक को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम से मान्यता
Mon, 28 Sep 2026 10:00 AM IST
ज्योति भास्कर
एजेंसी, मधुबनी (बिहार)।
एजेंसी, मधुबनी (बिहार)।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 28 Sep 2026 10:00 AM IST
सार
मुंबई में झुग्गियों की दुर्दशा देखकर मिली प्रेरणा से बिहार के युवा ने कामयाबी की ऐसी स्वर्णिम तहरीर लिख डाली, जिसे संयुक्त राष्ट्र (यूएन) तक पहचान मिली। यूएन के विकास कार्यक्रम ने बिहार के युवा पीयूष की तकनीक को मान्यता दी है। जानिए सफलता की कहानी
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मधुबनी के पीयूष झा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली मान्यता
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट-एजेंसी
विस्तार
बिहार के मधुबनी के रहने वाले 20 वर्षीय पीयूष झा ने एक बेहद किफायती और अनोखा अपशिष्ट जल शोधन प्रणाली (वेस्टवाटर ट्रीटमेंट सिस्टम) विकसित किया है, जिसके लिए उन्हें संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा मान्यता और सम्मान मिला है। पीयूष का परिवार बेहतर जिंदगी की तलाश में बिहार के मधुबनी से मुंबई शिफ्ट हो गया था।
मुंबई की झुग्गियों में रहते हुए उन्होंने देखा कि चारों तरफ गंदा पानी जमा रहता है, जिससे डेंगू, मलेरिया और टाइफाइड जैसी बीमारियां फैलती हैं। वह खुद भी बचपन में इन बीमारियों का शिकार हुए थे। पीयूष के पास वाटर इंजीनियरिंग की कोई फॉर्मल डिग्री नहीं है। इस बीच उन्होंने अपने एक स्टार्टअप पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मुंबई के डीजी सांघवी कॉलेज से अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी।
सेकंड हैंड लैपटॉप से शुरुआत
कोरोना महामारी के दौरान पीयूष की मां ने जैसे-तैसे उनके लिए एक पुराना सेकेंड हैंड लैपटॉप अरेंज किया, जिससे पीयूष ने रिसर्च शुरू की और इस सिस्टम को डिजाइन किया।
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रोजाना के वेस्ट से सिर्फ 20 से 30% का ही हो पाता है शोधन
यह एक विकेंद्रीकृत और मॉड्यूलर सिस्टम है, जो बिना किसी हानिकारक केमिकल डोजिंग के पानी को साफ करता है। आमतौर पर छोटे और मध्यम उद्योगों को पानी साफ करने की पारंपरिक प्रणालियों पर करीब 20 लाख रुपये का खर्च आता है। पीयूष के समाधान ने इस खर्च को घटाकर सिर्फ 5 से 7 लाख कर दिया है। भारत में रोज निकलने वाले करीब 1800 करोड़ लीटर अपशिष्ट जल में से केवल 20-30% का ही शोधन हो पाता है।
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मुंबई की झुग्गियों में रहते हुए उन्होंने देखा कि चारों तरफ गंदा पानी जमा रहता है, जिससे डेंगू, मलेरिया और टाइफाइड जैसी बीमारियां फैलती हैं। वह खुद भी बचपन में इन बीमारियों का शिकार हुए थे। पीयूष के पास वाटर इंजीनियरिंग की कोई फॉर्मल डिग्री नहीं है। इस बीच उन्होंने अपने एक स्टार्टअप पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मुंबई के डीजी सांघवी कॉलेज से अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी।
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सेकंड हैंड लैपटॉप से शुरुआत
कोरोना महामारी के दौरान पीयूष की मां ने जैसे-तैसे उनके लिए एक पुराना सेकेंड हैंड लैपटॉप अरेंज किया, जिससे पीयूष ने रिसर्च शुरू की और इस सिस्टम को डिजाइन किया।
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रोजाना के वेस्ट से सिर्फ 20 से 30% का ही हो पाता है शोधन
यह एक विकेंद्रीकृत और मॉड्यूलर सिस्टम है, जो बिना किसी हानिकारक केमिकल डोजिंग के पानी को साफ करता है। आमतौर पर छोटे और मध्यम उद्योगों को पानी साफ करने की पारंपरिक प्रणालियों पर करीब 20 लाख रुपये का खर्च आता है। पीयूष के समाधान ने इस खर्च को घटाकर सिर्फ 5 से 7 लाख कर दिया है। भारत में रोज निकलने वाले करीब 1800 करोड़ लीटर अपशिष्ट जल में से केवल 20-30% का ही शोधन हो पाता है।