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...जब सबसे ज्यादा सीटें लाने के बाद भी विपक्ष में बैठे राजीव गांधी, प्रधानमंत्री बने वीपी सिंह

Sat, 04 May 2019 03:28 PM IST
ललित फुलारा चुनाव डेस्क, अमर उजाला
चुनाव डेस्क, अमर उजाला Published by: ललित फुलारा Updated Sat, 04 May 2019 03:28 PM IST
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1989 Lok sabha election history Rajiv Gandhi loses V.P. Singh become Prime Minister 
1989 का लोकसभा चुनाव

साल 1989 में देश में नौवां लोकसभा चुनाव संपन्न हुआ। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन, सरकार बनाने की जगह पार्टी ने विपक्ष में बैठने की ठानी। विश्वनाथ प्रताप सिंह भारत के दसवें प्रधानमंत्री बनें। ये ही भारत में गठबंधन सरकारों के दौर की शुरुआत थी। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में बैठे। बोफोर्स घोटाले से लेकर एलटीटीई और श्रीलंका सरकार के बीच गृह युद्ध तक कई मोर्च पर राजीव सरकार बुरी तरह से घिर चुकी थी। सरकार में वित्त मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय का कार्यभार संभालने वाले वीपी सिंह ही राजीव गांधी के कट्टर आलोचन बनकर उभरे। 1989 में दो चरण में लोकसभा चुनाव संपन्न हुए। लोकसभा की 525 सीटों के लिए 22 नवंबर और 26 नवंबर 1989 को मतदान हुआ।

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कांग्रेस को रोकने के लिए पहली बार लेफ्ट के साथ आई थी भाजपा
किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। इसी के साथ पहली बार देश में कांग्रेस का एकछत्र राज टूटा। राष्ट्रपति आर वेंकटरमण ने सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को सरकार बनाने के न्योता दिया। लेकिन कांग्रेस ने विपक्ष में बैठने का फैसला लिया। जनता दल और दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों की मदद से नेशनल फ्रंट की सरकार बनी। वी पी सिंह प्रधानमंत्री चुने गए। यह पहली बार था जब कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकने के लिए विचारों की विविधता के बावजूद भी दक्षिणपंथी पार्टी भाजपा और वामपंथी पार्टियां एक साथ आई थी। लेफ्ट और भाजपा ने नेशनल फ्रंट सरकार को बाहर से समर्थन दिया। इसी के साथ गठबंधन सरकारों का लंबा दौर शुरु हुआ जो कि साल 2014 में मोदी लहर की बदौलत टूटा।
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कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनीं लेकिन सत्ता में नहीं बैठी
राष्ट्रीय मोर्च के सबसे बड़े घटक जनता दल ने चुनाव में 143 सीटें जीतीं। कांग्रेस के खाते में 197 सीटें आईं। भारतीय जनता पार्टी ने 85 सीटें जीतीं। माकपा और भाकपा ने क्रमशः 33 और 12 सीटें जीतीं। निर्दलीय और दूसरे छोटे दलों ने 59 सीटें जीतीं। भारतीय सोशलिस्ट कांग्रेस के खाते में सिर्फ एक सीट आई। जनता पार्टी की जमानत जब्त हो गई। ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ने तीन सीटें जीतीं। वीपी सिंह प्रधानमंत्री और देवीलाल उपप्रधानमंत्री बनें। वीपी सिंह मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करके पिछड़े वर्गों के मसीहा बन गए।


इस चुनाव में कांग्रेस की तरफ से 502 प्रत्याशी मैदान में थे। जबकि जनता दल ने 241 उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा था। भारतीय जनता पार्टी ने 224 प्रत्याशियों को टिकट दिया था। सीपीएम ने 62 उम्मीदवार और सीपीआई ने 54 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था।

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भाजपा का भारतीय राजनीति में उभार था 1989 का चुनाव
30 साल पहले संपन्न हुआ नौवां लोकसभा चुनाव सही मायने में भारतीय राजनीती में भाजपा का उभार था। 1984 के लोकसभा चुनाव में जहां भाजपा सिर्फ 2 सीटों पर सिमट गई थी, वहीं इस चुनाव में पार्टी के खाते में 85 सीटें आईं थी। इस चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी ने पहली बार नई दिल्ली से चुनाव लड़ा और जीत भी दर्ज की । हालांकि, वीपी सिंह की सरकार ज्यादा लंबी नहीं चली और गठबंधन की राजनीति देश को स्थिर सरकार देने में नाकाम रहीं। 11 महीने में ही वीपी सिंह के नेतृत्व वाली नेशनल फ्रंट की मिलीजुली सरकार ने सदन में विश्वास मत खो दिया और वीपी सिंह को इस्तीफा देना पड़ा।

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