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Hindi News ›   India News ›   Nirbhay Case 16 December 2012 : 1656 cases with a judge in lower court, how long awaiting justice

#KabTakNirbhaya: न्याय का इंतजार कब तक, निचली अदालत में एक जज के पास 1656 केस

Mon, 16 Dec 2019 03:02 AM IST
आसिम खान न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आसिम खान Updated Mon, 16 Dec 2019 03:02 AM IST
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Nirbhay Case 16 December 2012 : 1656 cases with a judge in lower court, how long awaiting justice
प्रतीकात्मक तस्वीर

न्यायिक देरी के लिए चीफ जस्टिस से लेकर विधि मंत्री और आम नागरिक तक चिंता जता रहे हैं। कुछ तो हैदराबाद एनकाउंटर को भी वाजिब बताने से भी नहीं चूक रहे। दरअसल, लचर न्याय व्यवस्था को लेकर इस गुस्से के जड़ में है अदालतों में मुकदमों की भारी संख्या। सुप्रीम कोर्ट द्वारा विकसित केस इन्फॉर्मेशन सिस्टम (सीआईएस) के अनुसार निचली अदालतों में हर जज के सामने इस वक्त 1,656 मुकदमे हैं। 

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ऐसा संभव तो नहीं पर हम मान लें कि अगर एक जज एक दिन में ही केस को सुनकर उसे निपटाने लगे, तब भी लंबित मुकदमों को खत्म करने में कम से कम आठ वर्ष लग जाएंगे। लेकिन रुकिए, बात यहीं खत्म नहीं होगी। जिस तेजी से केस दर्ज हो रहे हैं, उस पर गौर करें तो हम पाएंगे कि इसी अवधि में करीब इतने ही और केस दर्ज हो चुके होंगे। यानी यह एक ऐसा धीरे-धीरे घूमने वाला चक्र बन चुका है, जिसे तेजी से घुमाने की कोशिश के बदले बदल देना ज्यादा आसान होगा।
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निचली अदालतें : 50 लाख आपराधिक मामले पांच साल से पुराने
निचली अदालतों में तीन करोड़ से अधिक मामले हैं। इनमें से करीब 72 प्रतिशत आपराधिक हैं। इनमें त्वरित न्याय तो बस एक सपने जैसा है। 50 लाख मामले तो पांच वर्ष से अधिक पुराने हैं। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा जजों का है। इन अदालतों में मात्र 19,138 जज काम कर रहे हैं, जो जरूरत से बेहद कम है।

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  • कुल जज : 19,138
  • मामले :  3.17  करोड़


हाईकोर्ट में हालात : 6300 केस आते हैं एक जज के हिस्से
हाईकोर्ट में 380 जजों के पद खाली हैं। मौजूदा जजों की संख्या और चल रहे मामलों का आकलन करें तो हर जज पर 6,303 केस हैं। पूरे पद भरने पर भी यह बोझ 4,116 केस प्रति जज रहता है, यानी यह भी बहुत ज्यादा है। ऐसे में यहां करीब पौने तीन लाख से अधिक मामलों के एक वर्ष से अधिक चलने पर आश्चर्य नहीं।

  • जजों के पद : 1,095
  • जज हैं : 715
  • कुल केस : 45,06,930
  • आपराधिक केस 12,78,545
  • महिलाओं द्वारा दर्ज केस 1,35,906

 


लंबित आपराधिक केस

  • तीन से पांच साल 1,39,265
  • पांच से 10 साल 2,24,826
  • 10 से 20 साल 2,02,332
  • 20 से 30 साल 28,623
  • 30 साल से अधिक 12,850


(एक साल से ज्यादा लंबित मामलों में बॉम्बे, दिल्ली, मध्यप्रदेश और कर्नाटक हाईकोर्ट के मामले नहीं, ये हाईकोर्ट अभी सीआईएस से नहीं जुड़े।)

एक साल से ज्यादा लंबित 2.31 करोड़ केस यानी 73.09 फीसदी

आपराधिक मामले

  • कुल 2.27 करोड़
  • एक साल से ज्यादा लंबित 1.67 करोड़ (73.54%)
  • पांच साल से ज्यादा लंबित 49.81 लाख

 

महिलाओं द्वारा दायर मामले

  • कुल 30,22,916
  • आपराधिक मामले 15,67,112

 

दुष्कर्म : 17 साल में दोगुने निर्भया कांड के बाद भी बढ़े

21वीं सदी के पहले साल यानी 2001 में देश में दुष्कर्म के 16,075 मामले दर्ज किए गए थे। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा 2017 के लिए जारी अंतिम आंकड़ों में यह संख्या 32,559 है। सबसे दुखद तथ्य यह है कि दिसंबर 2012 में हुई निर्भया कांड के बाद दुष्कर्म के मामलों में एक ही वर्ष में 35.24 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई।

वर्ष मामले

  • 2001 16,075
  • 2002 16,373
  • 2003 15,847
  • 2004 18,233
  • 2005 18,359
  • 2006 19,348
  • 2007 20,737
  • 2008 21,467
  • 2009 21,397


वर्ष मामले

  • 2010 22,172
  • 2011 24,206
  • 2012 24,923
  • 2013 33,707
  • 2014 36,735
  • 2015 34,651
  • 2016 38,997
  • 2017 32,559

 

कहां है त्वरित न्याय : सजा एक तिहाई में, लंबित रह जाते 90 प्रतिशत मामले

पुलिस और कोर्ट में दुष्कर्म और महिलाओं से हो रहे अपराधों पर तेजी से कार्रवाई न होना भी अपराधियों में डर खत्म कर रहा है। एनसीआरबी के अनुसार 2017 में पुलिस ने दुष्कर्म के 29.3 फीसदी मामलों में चार्जशीट ही दायर नहीं की। वहीं, अदालतों से भी मात्र 32.2 फीसदी आरोपियों को सजा हो सकी।

   केस                           दुष्कर्म             दुष्कर्म-हत्या           कुल अपराध
चार्जशीट की दर            86.6 फीसदी        95 फीसदी            78.3 फीसदी
पुलिस के पास लंबित      29.3 फीसदी       32.9 फीसदी         32.9 फीसदी
कोर्ट में सजा की दर       32.2 फीसदी       57.9 फीसदी         23.9 फीसदी
कोर्ट के पास लंबित        87.5 फीसदी       90.1 फीसदी         89.6 फीसदी

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