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मध्यप्रदेश के 16 लाख किसानों ने उठाया एमएसपी का लाभ, दिल्ली के केवल 6 किसानों को ही मिला न्यूनतम समर्थन मूल्य

Tue, 13 Oct 2020 05:40 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 13 Oct 2020 05:40 PM IST
सार

  • FCI के मुताबिक वर्ष 2020-21 में रबी फसलों की खरीद में 31 जुलाई तक 43.35 लाख किसानों ने लिया न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ,
  • कुल मिलाकर 389.77 लाख मिट्रिक टन अनाज की हुई खरीद
  • सबसे ज्यादा मध्यप्रदेश के 15 लाख 93 हजार 793 किसानों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ उठाया, पंजाब नंबर दो पर

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16 lakh farmers of Madhya Pradesh availed Minimum support Price, only 6 farmers of Delhi got minimum support price
Narela Mandi - फोटो : AmarUjala

विस्तार

किसानों को उनकी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाने के नाम पर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। लेकिन देश के लगभग 14 करोड़ किसान परिवारों में बहुत कम को ही इसका असली लाभ मिल पाता है। फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (Food Corporation Of India, FCI) के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2020-21 में रबी फसलों की खरीद के लिए अब तक 31 जुलाई तक देश के केवल 43 लाख 35 हजार 477 किसानों ने ही न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ उठाया है। सभी किसानों को मिलाकर 389.77 लाख मिट्रिक टन अनाज की खरीद की गई है। इसमें सबसे ज्यादा 15 लाख 93 हजार 793 मध्यप्रदेश के किसानों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ उठाया है।

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मध्यप्रदेश से पिछड़ा पंजाब

रबी फसलों में सबसे प्रमुख गेहूं के उत्पादन में पंजाब इस बार मध्यप्रदेश से पिछड़ गया। संभवतया यही कारण है कि इस साल न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ उठा पाने में इस बार पंजाब के किसान दूसरे नंबर पर पहुंच गए हैं। एफसीआई के आंकड़ों के मुताबिक पंजाब के 10 लाख 49 हजार 982 किसानों ने रबी की फसल के लिए एमएसपी का लाभ उठाया है। हरियाणा के 7 लाख 82 हजार 240, उत्तर प्रदेश के 6 लाख 63 हजार 810 और राजस्थान के 2 लाख 18 हजार 638 किसानों ने एफसीआई के जरिए अपनी फसलें बेचकर न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ उठाया है।

 

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दिल्ली में केवल 6 किसानों से खरीद क्यों

दिल्ली में केवल 6 किसानों ने ही रबी की फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ उठाया है। दिल्ली सरकार ने दावा किया था कि उसने 'मुख्यमंत्री किसान मित्र योजना' के जरिए किसानों को स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक उनकी लागत का डेढ़ गुना कीमत दिलाई है। सेंटर फॉर यूथ कल्चर, लॉ एंड एम्प्लॉयमेंट (CYCLE) के अध्यक्ष पारस त्यागी ने अमर उजाला को बताया कि दिल्ली के किसानों को लेकर केंद्र या दिल्ली सरकार की नीति स्पष्ट नहीं है। पूरे रबी सीजन की खरीद में केवल 6 किसानों को न्यनतम समर्थन मूल्य का लाभ मिलना बताता है कि दिल्ली के किसानों को लेकर सरकार की नीतियों में बड़े बदलाव की आवश्यकता है। दिल्ली के 357 में से लगभग 222 गांवों के कुछ हजार हेक्टेयर खेत में ही अब खेती होती है।

पारस त्यागी ने कहा कि सच्चाई यह है कि जब किसान नजफगढ़ और नरेला अनाज मंडी पर अनाज बेचने पहुंचते हैं, उनकी फसल की खरीदी नहीं की जाती है। किसानों को मजबूरन अपनी फसल खुले बाजार में बेचनी पड़ती है, जिससे उन्हें भारी घाटा होता है। इसलिए सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद सुनिश्चित करनी चाहिए।

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खुले बाजार में एमएसपी जरूरी क्यों

किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष चौधरी पुष्पेंद्र सिंह ने अमर उजाला को बताया कि देश में लगभग 30 करोड़ टन खाद्यान्न का उत्पादन प्रति वर्ष होता है। इसमें लगभग 15 करोड़ टन किसान परिवार स्वयं अपने उपभोग में इस्तेमाल करता है। बाकी 15 करोड़ टन में से 9 करोड़ टन से कुछ अधिक सरकार एपीएमसी मंडियों के जरिए खरीद करती है। कुल अनाज की खरीद में सरकारी खरीद का हिस्सा सबसे ज्यादा होता है, यही कारण है कि किसान चाहते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और एपीएमसी मंडियों वाली व्यवस्था बरकरार रहे। सरकार को इसके लिए किसान बिल में लिखित व्यवस्था कर देनी चाहिए।

लगभग 6 करोड़ टन अनाज किसानों को खुले बाजार में बेचना पड़ता है। वर्तमान में किसानों की मांग है कि अगर वह खुले बाजार में भी फसलों की खरीद व्यवस्था लागू करना चाहती है तो उसे यहां भी न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू करना चाहिए। अनुमान है कि इस बाकी फसल की खरीद में प्राइवेट खरीदारों को अधिकतम 30 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश करना पड़ेगा, जो बहुत बड़ी राशि नहीं होगी।

धान की खरीद पर कम मिल रही कीमत

प्रियंका गांधी ने यह मुद्दा उठाया है कि उत्तर प्रदेश में किसानों को धान फसलों को औने-पौने दामों पर बेचना पड़ रहा है। उन्हें अपनी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। इस पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता अभिमन्यु त्यागी कहते हैं कि सरकार ने फसलों का खरीद मूल्य 1868 रुपये प्रति क्विंटल और ए ग्रेड धान के फसलों की कीमत 1888 रुपये घोषित किया हुआ है। लेकिन सच्चाई यह है कि किसानों के फसलों की खरीद बहुत कम मात्रा में हो रही है। इसलिए मंडी तक पहुंच चुके किसान को मजबूरी में अपनी फसल 1200 रुपये प्रति क्विंटल तक में बेचना पड़ रहा है, जिससे उसे भारी घाटा हो रहा है।

किसान नेता अभिमन्यु त्यागी के मुताबिक सबसे ज्यादा बुरी स्थिति बासमती धान की फसलों को लेकर बनी हुई है। बासमती के 1121 वैरायटी की कीमत 2013 में 4400 रुपये के लगभग मिल जाती थी। इस समय खुले बाजार में किसानों को इसके लिए अधिकतम 3200 रुपये मूल्य मिल पा रहा है। इसी प्रकार बासमती के ही 1509 वैरायटी की कीमत 2900 रुपये के लगभग मिल जाती थी, जो अब घटकर केवल 1500 रुपये के लगभग रह गई है। इससे किसानों को भारी घाटा हो रहा है। सरकार को इस स्थिति पर ध्यान देना चाहिए।

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