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130वां संविधान संशोधन विधेयक 2025: 30 दिन जेल में रहे तो जाएगी कुर्सी, क्यों बिल के विरोध में उतरी कांग्रेस?
Sun, 05 Jul 2026 04:39 PM IST
प्रशांत तिवारी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Sun, 05 Jul 2026 04:39 PM IST
सार
कांग्रेस ने गंभीर आपराधिक मामलों में 30 दिन तक जेल में रहने पर मंत्रियों को स्वतः पद से हटाने वाले प्रस्तावित संविधान संशोधन बिल का कड़ा विरोध करने का ऐलान किया है। पार्टी का कहना है कि यह कानून राजनीतिक प्रतिशोध का माध्यम बन सकता है और सरकार के पास इसे पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत भी नहीं है।
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वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश (फाइल फोटो)
- फोटो : ANI Photos
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विस्तार
कांग्रेस ने रविवार को एलान किया कि वह संसद में उस संविधान संशोधन विधेयक का कड़ा विरोध करेगी, जिसमें गंभीर अपराधों के आरोप में 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहने वाले प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्रियों को पद से हटाने का प्रावधान किया गया है। पार्टी ने विश्वास जताया कि सरकार के पास इस विधेयक को पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं है।
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कब JPC रिपोर्ट को मिल सकती है मंजूरी?
विपक्षी पार्टी का यह बयान ऐसे समय आया है, जब सूत्रों के अनुसार आपराधिक मामलों में गिरफ्तार प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और अन्य मंत्रियों को पद से हटाने से जुड़े विधेयकों की जांच कर रही संसदीय संयुक्त समिति (JPC) 17 जुलाई को अपनी रिपोर्ट को मंजूरी दे सकती है। इसके बाद रिपोर्ट को संसद के मॉनसून सत्र में लोकसभा में पेश किए जाने की संभावना है। अगर केंद्र सरकार चाहे तो 20 जुलाई से शुरू होने वाले मॉनसून सत्र से पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल इन प्रस्तावित विधेयकों को भी मंजूरी दे सकता है।
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कांग्रेस ने बिल को क्यों बताया राजनीतिक प्रतिशोध का हथियार?
कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने रविवार को आरोप लगाया कि प्रस्तावित कानून का असली मकसद विपक्षी नेताओं को राजनीतिक रूप से परेशान करना है। गृह मंत्री अमित शाह महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को भी दो-तिहाई बहुमत से पारित नहीं करा पाएंगे। ऐसे में वह 130वां संविधान संशोधन विधेयक लाने की कोशिश करेंगे, जिसका हम पूरी ताकत से विरोध करेंगे। यह बेहद खतरनाक विधेयक है। इसे अगस्त 2025 में पेश किया गया था और बाद में संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज दिया गया, जिसका अधिकांश विपक्षी दलों ने बहिष्कार किया था।
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'दोष सिद्ध होने से पहले सजा कैसे?'
रमेश ने बताया कि प्रस्तावित कानून के अनुसार यदि कोई मंत्री ऐसे आपराधिक मामले में, जिसमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, लगातार 30 दिन तक जेल में रहता है, तो 31वें दिन उसे स्वतः पद से हटा दिया जाएगा। उन्होंने आगे कहा, 'यह बेहद अजीब व्यवस्था है। अदालत में मुकदमा अभी चल ही रहा होता है। भारत में जब तक कोई व्यक्ति दोषी साबित नहीं हो जाता, तब तक उसे निर्दोष माना जाता है। हम सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के शासन में जांच एजेंसियां कैसे काम कर रही हैं।' यह विधेयक "राजनीतिक प्रतिशोध" और "बदले की राजनीति" का उदाहरण है, जिसका उद्देश्य केवल विपक्ष को निशाना बनाना है।
परिसीमन विधेयक पर क्या कहा?
रमेश ने कहा कि यदि सरकार मॉनसून सत्र में इस विधेयक को दोबारा लाने की कोशिश करती है, तो कांग्रेस उसका भी विरोध करेगी। हम उस परिसीमन विधेयक का भी विरोध करेंगे, जिसे 16 अप्रैल के विशेष सत्र में पेश किया गया था। 17 अप्रैल को गृह मंत्री अमित शाह को उस समय भारी शर्मिंदगी उठानी पड़ी, जब उन्हें संविधान संशोधन के लिए आवश्यक 352 वोट नहीं मिले और केवल 298 सांसदों का समर्थन ही हासिल हुआ।
'विपक्षी दलों को तोड़ने में जुटी है भाजपा'
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि 17 अप्रैल के बाद से अमित शाह लगातार विभिन्न विपक्षी दलों में टूट कराने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (UBT) में विभाजन कराया। यह निश्चित रूप से हमारे लिए चुनौती है। शिवसेना (UBT) और TMC को झटका लगा है, लेकिन विपक्ष की एकजुटता कायम है।
तो क्या फिर नहीं मिलेगा बहुमत?
रमेश ने दावा किया कि यदि सरकार मंत्रियों को हटाने वाले 130वें संविधान संशोधन विधेयक और परिसीमन से जुड़े विधेयक को फिर से लाती है, तो उसे आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलेगा।
17 जुलाई को समिति की अहम बैठक
मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक पर गठित संयुक्त समिति की रिपोर्ट को 17 जुलाई की बैठक में मंजूरी मिलने की संभावना है। समिति की अध्यक्षता भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी कर रही हैं। समिति ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने से पहले संवैधानिक विशेषज्ञों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, वरिष्ठ वकीलों, बार एसोसिएशन के प्रतिनिधियों, सरकारी अधिकारियों और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं से व्यापक चर्चा की। इससे पहले सारंगी ने कहा था कि समिति की बैठकों में राजनीति को अपराध की श्रेणी से अलग रखने की आवश्यकता पर व्यापक सहमति बनी थी।
विपक्ष ने क्यों किया समिति का बहिष्कार?
कई विपक्षी दलों ने इस समिति से दूरी बनाई। उनका कहना है कि यह विधेयक भारतीय न्याय व्यवस्था के उस मूल सिद्धांत का उल्लंघन करता है, जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को दोष सिद्ध होने तक निर्दोष माना जाता है। विपक्ष का आरोप है कि यदि किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री को गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार होने के बाद एक महीने के भीतर जमानत नहीं मिलती, तो उसे स्वतः पद से हटाने का प्रावधान गैर-एनडीए सरकारों वाले राज्यों को अस्थिर करने का माध्यम बन सकता है।
समिति में विपक्ष बेहद कमजोर
भाजपा और उसके सहयोगी दलों के प्रभाव वाले 31 सदस्यीय पैनल में विपक्ष के केवल तीन सदस्य हैं—एनसीपी (एसपी) की सुप्रिया सुले, AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी और वाईएसआरसीपी के एस. निरंजन रेड्डी हैं।
कब पेश हुए थे तीन विधेयक?
पिछले वर्ष अगस्त में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में तीन विधेयक पेश किए थे, जिनका विपक्ष ने जोरदार विरोध किया। बाद में इन विधेयकों को विस्तृत जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज दिया गया।
कांग्रेस का आरोप- संविधान बदलने की कोशिश
पिछले महीने कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि भाजपा लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की कोशिश इसलिए कर रही है क्योंकि उसका अंतिम उद्देश्य संविधान में संशोधन कर आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करना है। रमेश ने दावा किया था कि सरकार पहले महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन लागू करना चाहती है और उसका अंतिम लक्ष्य आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करना है।
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कब गिरा था संविधान संशोधन विधेयक?
17 अप्रैल को लोकसभा और विधानसभाओं में 2029 से महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने तथा लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका। विधेयक के पक्ष में 298 सांसदों ने मतदान किया, जबकि 230 सांसद इसके विरोध में रहे। कुल 528 सदस्यों ने मतदान किया था और संविधान संशोधन के लिए आवश्यक 352 वोट नहीं मिलने के कारण विधेयक गिर गया।