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New Trend: नींद को भी परफेक्ट बनाने की कोशिश में Gen Z, क्या है Sleepmaxxing और कब बनता है खतरा?

Wed, 07 Oct 2026 05:33 PM IST
रिया दुबे न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Wed, 07 Oct 2026 05:33 PM IST
सार

नींद को बेहतर बनाने की कोशिश अब सिर्फ जल्दी सोने तक सीमित नहीं रही। Gen Z इसे ट्रैक करने से लेकर अलग-अलग गैजेट्स और सप्लीमेंट्स आजमा रहे हैं, लेकिन क्या नींद को परफेक्ट बनाने की यही कोशिश कहीं नई परेशानी की वजह तो नहीं बन रही? आइए जानते हैं इस ट्रेंड के बारे में। 

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Gen Z Is Trying to Perfect Its Sleep, What Is Sleepmaxxing, and When Can It Become a Risk?
जेन जी ट्रेंड - फोटो : Ai

विस्तार

कभी देर रात तक जागना मेहनत और काम के प्रति लगन की निशानी माना जाता था, लेकिन अब Gen Z के बीच अच्छी नींद को लेकर सोच बदल रही है। कितने घंटे सोए, नींद कितनी गहरी रही और सुबह उठने के बाद शरीर कितना तरोताजा महसूस कर रहा है, लोग इन चीजों पर भी ध्यान देने लगे हैं। सोशल मीडिया पर इसी बढ़ते चलन को Sleepmaxxing कहा जा रहा है।

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क्या है Sleepmaxxing?

Sleepmaxxing का मतलब है नींद को ज्यादा से ज्यादा बेहतर बनाने की कोशिश। सोशल मीडिया ने इसे एक वेलनेस ट्रेंड में बदल दिया है, जहां लोग अपनी नींद को ट्रैक और ऑप्टिमाइज करने के लिए अलग-अलग तरीके अपना रहे हैं। मैग्नीशियम सप्लीमेंट, माउथ टेप, स्मार्ट रिंग, रेड लाइट थेरेपी, कूलिंग पैड और स्लीप मास्क जैसे प्रोडक्ट्स अब इस ट्रेंड का हिस्सा बन गए हैं।

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नींद के लिए क्या-क्या इस्तेमाल हो रहा है?

  • सप्लीमेंट्स: मैग्नीशियम ग्लाइसिनेट, टार्ट चेरी एक्सट्रैक्ट और बेडटाइम गमीज जैसे प्रोडक्ट्स इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
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  • स्मार्ट गैजेट्स: स्मार्ट रिंग और स्मार्टवॉच से हार्ट रेट, स्लीप पैटर्न और अलग-अलग स्लीप स्टेज ट्रैक की जा रही हैं।
  • बेडरूम का माहौल: स्मार्ट लाइटिंग, व्हाइट नॉइज मशीन, ब्लैकआउट मास्क और कमरे के तापमान को नियंत्रित करने वाले डिवाइस भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
  • स्क्रीन से दूरी: ब्लू लाइट को कम करने के लिए ब्लू-लाइट ब्लॉकिंग ग्लासेज और दूसरे गैजेट्स का इस्तेमाल भी बढ़ा है।

Sleepmaxxing इतना पॉपुलर क्यों हो रहा है?

Gen Z और Millennials के बीच बर्नआउट और लगातार काम करने वाली लाइफस्टाइल ने रिकवरी और सेल्फ केयर को ज्यादा अहम बना दिया है। ऐसे में अच्छी नींद को लेकर जागरुकता बढ़ना स्वाभाविक है।

लेकिन यहां एक नया बदलाव दिख रहा है। लोग सिर्फ सोने के बजाय अपनी नींद को एक परफॉर्मेंस मेट्रिक की तरह देखने लगे हैं। कितने घंटे सोए? कितनी डीप स्लीप मिली? REM स्लीप कितनी रही? सुबह रिकवरी स्कोर कितना आया? ऐसे सवाल रात की नींद को भी एक तरह के टारगेट में बदल रहे हैं।

क्या नींद को ज्यादा ट्रैक करना भी परेशानी बन सकता है?

यहीं से Sleepmaxxing का दूसरा पहलू सामने आता है। अगर कोई व्यक्ति हर रात अपने स्लीप डेटा को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंतित रहने लगे, तो नींद बेहतर होने के बजाय तनाव बढ़ सकता है। इसी तरह की स्थिति को 'ऑर्थोसॉमनिया' कहा जाता है। इसमें व्यक्ति अच्छी नींद लेने और अपने स्लीप डेटा को परफेक्ट बनाने को लेकर इतना ज्यादा चिंतित हो जाता है कि यही चिंता उसकी नींद को प्रभावित करने लगती है। 

मान लीजिए आपको सुबह उठकर लगता है कि आपकी नींद अच्छी रही। लेकिन आपकी स्मार्टवॉच या रिंग बताती है कि डीप स्लीप कम रही। इसके बाद आप परेशान होकर अपनी डाइट, सप्लीमेंट या सोने का समय बदलने लगते हैं। यही लगातार निगरानी और चिंता समस्या बन सकती है।

Sleepmaxxing कब उल्टा पड़ सकता है?

जब नींद को बेहतर बनाने की कोशिश खुद तनाव का कारण बनने लगे, तब यह ट्रेंड उल्टा असर कर सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, कुछ लोग नींद को लेकर इतनी चिंता करने लगते हैं कि सप्लीमेंट्स और दूसरे उपायों पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो जाते हैं। कुछ मामलों में यह चिंता लंबे समय तक बनी रह सकती है और दवाओं पर निर्भरता का जोखिम भी बढ़ सकता है। नींद के लिए सिर्फ गैजेट या सप्लीमेंट पर निर्भर रहने के बजाय नियमित नींद का समय, सही खान-पान, एक्सरसाइज और बेहतर स्लीप हाइजीन पर ध्यान देना जरूरी है।

Sleepmaxxing सिर्फ सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं?

Sleepmaxxing की लोकप्रियता को उस लाइफस्टाइल से भी जोड़कर देखा जा सकता है, जिसमें काम, स्क्रीन और ऑनलाइन कनेक्टिविटी ने लोगों के आराम का समय कम किया है। अब लोग उसी थकान से निकलने के लिए नींद को बेहतर बनाने वाले गैजेट्स, सप्लीमेंट्स और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। यानी जिस तेज रफ्तार लाइफस्टाइल ने आराम को मुश्किल बनाया, उसी के आसपास नींद को बेहतर करने का एक बड़ा मार्केट भी तैयार हो रहा है।

Fortune Business Insights के मुताबिक, ग्लोबल स्लीप ट्रैकर मार्केट करीब 7.74 अरब डॉलर का है और 2034 तक इसके 25 अरब डॉलर से ज्यादा होने का अनुमान है। वहीं Mordor Intelligence के अनुसार, ग्लोबल मैग्नीशियम सप्लीमेंट मार्केट करीब 8.34 अरब डॉलर का है, जिसके 2031 तक 11.7 अरब डॉलर से ज्यादा होने का अनुमान है।

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