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अयोध्या के दीपोत्सव का सार्वभौमिक संदेश

Sun, 08 Nov 2026 04:56 PM IST
आलोक चंद्रा Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sun, 08 Nov 2026 04:56 PM IST
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Ayodhya Deepotsav Yogi Government Ram Mandir Diwali Celebration Opinion Article
अयोध्या में दीपोत्सव - फोटो : amar ujala
सनातन संस्कृति ने सदियों पहले 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' के रूप में जीवन के जिस परम सत्य का साक्षात्कार किया था, वह आज भी मानवता के लिए सबसे बड़ा पथ-प्रदर्शक है। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलने की प्रार्थना मनुष्य के भीतर व्याप्त अज्ञान, अहंकार, हिंसा, वैमनस्य और निराशा को मिटाकर विवेक, करुणा, प्रेम और सद्भाव का प्रकाश जगाने की कामना है। दीपोत्सव इसी शाश्वत भारतीय चेतना का उत्सव है। जब अयोध्या में सरयू के तट पर लाखों दीप एक साथ प्रज्वलित होते हैं, तो उनकी लौ केवल रामनगरी को आलोकित नहीं करती, बल्कि समूची मानवता को एक ऐसा संदेश देती है, जिसकी प्रासंगिकता देश, काल और परिस्थितियों की सीमाओं से परे है।
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अयोध्या के दीपोत्सव का सार्वभौमिक संदेश जानने से पहले इसकी पृष्ठभूमि पर आते हैं। यह त्रेतायुग की उस ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्मृति का पुनर्स्मरण है, जब चौदह वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम अपनी जन्मभूमि लौटे थे। कल्पना कर सकते हैं कि उनके आगमन पर अवधपुरी के नर-नारियों ने दीप जलाकर कितने आनंद और उल्लास की अभिव्यक्ति की होगी। यह केवल एक राजा के घर लौटने का उत्सव नहीं था, बल्कि सत्य की असत्य पर, धर्म की अधर्म पर और मर्यादा की अहंकार पर विजय का अभिनंदन था। तभी से दीपावली भारतीय जनमानस में आशा, आस्था और मंगल का प्रतीक बनी हुई है। अयोध्या का दीपोत्सव उसी परंपरा को समकालीन चेतना से जोड़ने का माध्यम है। इसका एक दशक पूरा होना सनातन गौरव की अभिव्यक्ति है।
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गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि प्रभु श्रीराम संपूर्ण चराचर जगत को प्रकाशित करने वाले परम प्रकाश हैं। राम किसी एक कालखंड, समाज अथवा भौगोलिक सीमा में सीमित नहीं हैं। वे मानवता के उन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनकी आवश्यकता हर युग और हर समाज को रहती है। पिता के वचन की रक्षा के लिए राजसुख का त्याग, वनवास में निषादराज और वनवासी समाज के प्रति आत्मीयता, शबरी के जूठे बेर स्वीकार करने की सहजता, मित्रता में निष्कपटता और सत्ता प्राप्त होने पर भी मर्यादा का पालन आदि...आदि। राम का जीवन मनुष्य को मनुष्यता का वास्तविक अर्थ समझाता है। बताता है कि महानता पद, प्रतिष्ठा अथवा शक्ति में नहीं, बल्कि अपने आचरण और दूसरों के प्रति संवेदना में निहित होती है।

रामकथा का एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग भरत का भी है। चौदह वर्षों तक उन्होंने राजसुख का उपभोग नहीं किया, बल्कि श्रीराम की चरण-पादुकाओं को सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर स्वयं सेवक और प्रतिनिधि के रूप में राज्य का संचालन किया। यह प्रसंग सत्ता और शासन के वास्तविक अर्थ को परिभाषित करता है। शासन क्या है? क्या अधिकारों का उपभोग? नहीं, यह लोककल्याण का दायित्व है। दीपोत्सव लोककल्याण की इसी भावना को सामने रखता है। जब समाज और शासन दोनों अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि रखते हैं, तभी रामराज्य की कल्पना साकार हो सकती है। रामराज्य का आशय ऐसे समाज से है, जहां न्याय हो, निर्बल को संरक्षण मिले, प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान और अवसर प्राप्त हो तथा विकास का प्रकाश अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन तक पहुंचे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में शासन की यही छवि उभरकर सामने आती है।
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अयोध्या के दीपोत्सव ने आस्था को सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकात्मता के व्यापक संदर्भ से जोड़ा है। भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव समावेशी रहा है। यहां उपासना की पद्धतियां भिन्न हो सकती हैं, भाषाएं और परंपराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन जीवन के मंगल की कामना सबको जोड़ती है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का उद्घोष इसी उदार चेतना की अभिव्यक्ति है। उपनिषदों की यह दृष्टि मनुष्य को संकीर्णताओं से ऊपर उठकर संपूर्ण विश्व को अपना परिवार मानने की प्रेरणा देती है। अयोध्या का दीपोत्सव जब देश के विभिन्न हिस्सों के साथ विदेशों के सांस्कृतिक प्रतिनिधियों और कलाकारों को भी अपने साथ जोड़ता है, तो यह भारतीय संस्कृति की वैश्विक आत्मीयता का ही परिचायक बनता है। रामकथा की परंपरा भारत से निकलकर दक्षिण-पूर्व एशिया और दुनिया के अनेक देशों तक पहुंची है। अलग-अलग देशों में राम के आख्यानों की अपनी सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां हैं, लेकिन उनमें सत्य, त्याग, शौर्य और मर्यादा के मूल्य समान रूप से प्रतिष्ठित हैं।

आज विश्व अनेक प्रकार के संघर्षों से गुजर रहा है। कहीं युद्ध की विभीषिका है, तो कहीं धार्मिक और नस्लीय विद्वेष। कहीं सत्ता और वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा है, तो कहीं आपसी अविश्वास और असहिष्णुता। ऐसे समय में अयोध्या का दीपोत्सव विश्व को यह स्मरण कराने का अवसर देता है कि स्थायी शांति का मार्ग परस्पर सम्मान, सह-अस्तित्व और मानवीय संवेदना से होकर गुजरता है। भारतीय दर्शन ने कभी केवल अपने सुख की कामना नहीं की। 'सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः' की प्रार्थना में समूची मानवता के कल्याण का भाव समाहित है। यही वह आध्यात्मिक दृष्टि है, जो दीपोत्सव को सार्वभौमिक बनाती है।
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इस महापर्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष सांस्कृतिक विरासत और आर्थिक स्वावलंबन का संगम भी है। दीपक की लौ जितनी छोटी दिखाई देती है, उसके पीछे श्रम और सृजन की उतनी ही बड़ी कहानी है। मिट्टी को आकार देने वाले कुम्हार के हाथ, उसे पकाने वाले परिवार का परिश्रम, फूलों की माला तैयार करने वाले श्रमिक, हस्तशिल्पी, नाविक, छोटे दुकानदार और स्थानीय उद्यमी, सभी इस उत्सव की जीवंत कड़ी हैं। जब राम की पैड़ी पर लाखों दीप प्रज्वलित होते हैं, तो उनके साथ हजारों श्रमशील परिवारों के घरों में भी उम्मीद का उजाला पहुंचता है। स्थानीय कारीगरों के उत्पादों को प्रोत्साहन देना, मिट्टी के दीयों को अपनाना और स्वदेशी शिल्प को सम्मान     देना इसी दिशा में सार्थक कदम हैं। अयोध्या में दीपोत्सव के विस्तार के साथ धार्मिक पर्यटन, स्थानीय व्यापार, होटल, परिवहन और हस्तशिल्प को भी नई संभावनाएं मिली हैं। यह बताता है कि संस्कृति वर्तमान की अर्थव्यवस्था और भविष्य की संभावनाओं का आधार भी बन सकती है।

अयोध्या का दीपोत्सव दसवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। वर्ष 2017 में सरयू तट पर प्रज्वलित हुई एक सांस्कृतिक पहल आज वैश्विक पहचान और व्यापक जनभागीदारी का उत्सव बन चुकी है। इस यात्रा का महत्व केवल दीपों की संख्या, भव्यता अथवा कीर्तिमानों में नहीं, बल्कि इस बात में है कि उसने भारतीय समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने और अपनी विरासत पर गर्व करने का अवसर दिया है। किसी भी सभ्यता का आत्मविश्वास उसकी परंपराओं के प्रति सम्मान और उन्हें समयानुकूल आगे बढ़ाने की क्षमता से निर्मित होता है। अयोध्या का दीपोत्सव इसी आत्मविश्वास का प्रतीक है।

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक आलोक चंद्रा, भारतीय प्रबंध संस्थान, कलकत्ता में पूर्व मुख्य प्रशासनिक अधिकारी हैं।)
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